अपनी बात

सोरघाटी का भू-वैज्ञानिक- प्रो. खड़ग सिंह वल्दिया

By CS Karki

प्रकृति, पहाड़, पत्थर और धूल से दोस्ती करते-करते औसत आदमी की उबड़-खाबड जिन्दगी से तालमेल बैठाने वाले असाधारण व्यक्तित्व जो घुप अंधेरे धरती के अंदर दबे पड़े रोशन चमक को आजीवन खोजते रहे, आम जीवन के कष्टों को भांपते हुए धरती के गर्भ की पड़ताल में दुनिया को चेताते रहे कि धरती संवेदनशील है। उससे छेड़छाड़ अवैज्ञानिक हो तो वह जीवन से बदला लेती है। प्रो. वल्दिया सीमान्त जिला पिथौरागढ़ के सोर घाटी से विश्व पटल पर अपने क्षेत्र में स्थान बनाने वाले पहाड़ के विभूतियों में एक थे, पहाड़ के परिचय थे। एक विज्ञानी, शिक्षक, प्रशासक, लेखक एवं सामाजिक कार्यकर्ता के साथ सरल उत्तराखण्डी थे।

२० मार्च 1937 को क्लों म्यांमार (वर्मा) में देब सिंह जी के घर जन्मे खडग़ सिंह वल्दिया के दादा जी लक्ष्मण सिंह 1911 में वर्मा आए। वहीं बस गए। वहां कारोबार किया। आजादी के वर्ष 1947 में अपने देश खैनालगाड़ (पिथौरागढ़) लौटे। अपने साथ नेता जी सुभाष चंद्र बोस का बुलंद नारा ‘जय हिन्द “की स्मृति लिए हुए जिसे वे जिंदगी भर जलसे,सभाओं, में उद््घोषित करते रहे। बचपन की स्मृति ‘जयहिन्द” हिन्दुस्तानी पहचान और उभरते भारत को महसूस करते हुए कलौंनगर वर्मा का माईल्स सिंह (वर्मा में नाम) सोरघाटी के सकूल में खडग़ सिंह वल्दिया के नाम से पढ़ाई करने लगा। पढ़ाई के दौरान ही अनेक कौमों, जातियों, वर्गों में बटे हिन्दुस्तान में असहज सा मात्र एक मानव जाति के समाज की आवश्यकता महसूस करने लगे।

कान सुनने की कमजोरी उनकी शिक्षा में बाधक नहीं बनी। श्रवण यन्त्रों की मदद से पूरी दक्षता से वे अपना मुकाम हासिल कर सके। पिथौरागढ़ से माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की। विद्यालयी शिक्षा में उन्हें जो अध्ययन साहित्य, समाज सेवा का पाठ गुरुजनों ने सिखाया वह उनके उज्जवल भविष्य का आधार बना। बालपन में ‘गांधी वाचन मन्दिर”संचालित करना तथा”बाल पुष्प “हस्त लिखित पत्रिका निकालना उनके पढऩे की जिजीविषा को दर्शाता है। पढ़ाई एवं अर्जित ज्ञान को समाज को संप्रेषित करना समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना प्रदर्शित करता है। अध्ययन को “विषयों के घेरे में मत रखो और जीवन को अपनी पसन्द की जंजीरों में मत जकड़ो “ऐसी सीख अपने गुरुजनों से प्राप्त करने वाले वल्दिया जी ने वास्तव में विस्तृत ज्ञान संभरण किया और जीवन को असीमित विस्तार दिया।

पिथौरागढ़ राजकीय इंटर कालेज से 1953 में इंटरमीडिएट करने के पश्चात वल्दिया जी लखनऊ विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा के लिए गए। अपना प्रिय विषय जियोलाजी में मास्टर्स करने के पश्चात 1957 में वही लेक्चरर हो गए तथा शोध कार्य करने लगे। सम्पूर्ण हिमालय का भू वैज्ञानिक सर्वेक्षण उनके शोध का विषय था। उन्होंने हिमालय की उत्पत्ति एवं विकास के गूढ़ रहस्यों का अध्ययन किया तथा मध्य हिमालय क्षेत्र की शंकाओं एवं समाधानों का इतिहास लिखा। 1963 में पीएचडी उपाधि प्राप्त भू वैज्ञानिक ने गंगोलीहाट में एक पत्थर जिसका नाम “गंगोलीहाट डोलामाइट “रखा, की खोज की जिसके आधार पर हिमालय की उम्र बताई तथा अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की। 1964 में अंतरराष्ट्रीय भूगर्भविज्ञान संगोष्ठी में तीन चर्चित शोध पत्र प्रस्तुत किए। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में उनके लेख प्रकाशित होते रहे जिनके माध्यम से सरल भाषा में आम जन तक भू विज्ञान के गूढ़ रहस्य तथा प्रकृति से छेड़छाड़ के अवैज्ञानिक तरीकों से होने वाले खतरों को वह पहुंचाते रहे।

अध्यापन एवं प्रशासनिक कार्यों का सफल निस्तारण राजस्थान विश्वविद्यालय, वाडिया संस्थान जवाहर लाल नेहरू सेंटर फॉर साइन्टफिक रिसर्च और कुमायूं विश्वविद्यालय तक चलता रहा। 1981 में कुमाऊ विश्वविद्यालय के कुलपति बने। हिमालय पर बीस से अधिक पुस्तकों के रचयिता वल्दिया जी को शान्ति स्वरूप भटनागर पुरस्कार (1976), नेशनल मिनरल अवार्ड आफ एक्सेलेंस (1997) पद्मश्री (2007), आत्माराम सम्मान (2008), जीएम मोदी अवार्ड (2012) और पद््म विभूषण (2015) से नवाजा गया।

हिमालय को पैदल नापते 20 हजार किमी से अधिक की खोज यात्रा पूरी कर विश्व को उत्कृष्ट शोध परिणाम दिए। 1958 से प्रारंभ पदयात्रा भाबर से लेकर हिमालय के पत्थरों का इतिहास, प्रकृति एवं प्रवृति जानने के साथ-साथ परिक्षेत्र के वाशिंदों की समस्याओं को भी महसूस करते रहे। क्योंकि पैदल यात्रा ही इस ज्ञान भण्डार के खोज के लिए उपलब्ध साधन था। अत: पैदल चलते चलते निर्जीव पहाड़ और उसका सौंदर्य, प्राकृतिक वनस्पतियां, जंगल, पशु पक्षी सभी को समझते हुए यह धारणा स्थापित कर दी कि मानव, पशु पक्षियों और वनस्पतियों का पहाड़ के साथ सह अस्तित्व आवश्यकीय है। उनका जंगली जीव जन्तुओं एवं प्रकृति के साथ आत्मीय संबंध ही था कि जब वे एक गुफा के मुहाने पर अपनी खोज डायरी लिख रहे थे, तो गुफा के अंदर बाघिन अपने दो बच्चों के साथ उन्हें निहार रही थी।

वे अपनी शोध यात्रा में विभिन्न सामाजिक सरोकारों के प्रति संवेदनशील रहे। सदैव पत्थरों के अध्ययन के साथ-साथ मानवीय जीवन एवं समस्याओं का अहसास करते रहे। पहाड़ में सर्वव्याप्त अति सूक्ष्म इच्छाओं की पूर्ति न कर पाने का दु:ख उन्हें शालता रहा। भूगर्भ में व्याप्त हलचलों के भान के साथ, मानव मन के उद्वेलनों को पढ़ लेना उन्हें आता था। वह सरल, व्यक्त्वि विशाल हिमालय के गर्भ को समझ सका, उसकी उत्पत्ति एवं विकास को जानकर उसके गोद में बसे पर्वतवासियों को असंख्य सूचनाएं एवं चेतावनी दे गया कि प्रकृति से अंधाधुध छेड़छाड़ बहुत क्षतिकारक साबित होती है। 83 वर्ष की उम्र में 29 सितम्बर 2020 को प्रो. खडग़ सिंह वल्दिया जी का बंगलौर में निधन हो गया। उनका इस धरा जाना हिमालय एवं देश के लिए अपूरणीय क्षति है।



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