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उत्तराखंड के पर्यटन मानचित्र पर जगह नहीं बना पाए रमणीक स्थल

Dr. Harish Chandra Andola

हिमालय में प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर कई ऐसे रमणीक स्थल हैं, जो पर्यटन मानचित्र पर जगह नहीं बना पाए हैं। इनमें से ही एक खूबसूरत स्थल है जहां पर प्रकृति ने सुंदरता की अनुपम छटा बिखेरी हुई है। यहां से हिमालय की रेंज और हरे-भरे बुग्याल के मैदान प्रकृति के अप्रतिम सौंदर्य पर चार-चांद लगाते हैं। पौराणिक काल में नाकुरी, पुंगराऊ और कमस्यार में नागों का निवास था। कालिय नाग, फेनिल नाग और धवल जैसे श्रेष्ठ नागों के मंदिर आज भी यहां मौजूद हैं। भद्रकाली में मंदिर के नीचे एक गुफा को नागों और नाग कन्याओं का उपासना स्थल माना जाता है। इस क्षेत्र में नागों को इष्ट देवता की तरह पूजा जाता है।

वर्तमान नाकुरी को मानस खंड में नागपुरी कहा गया है। कमेड़ी देवी के पास फेनिल नाग का मंदिर है, जिसे स्थानीय भाषा में फेणीनाग कहा जाता है। विजयपुर कांडा के समीप धवलनाग मंदिर को अब धौलीनाग कहा जाता है। मान्यता है कि नाग कन्याएं इसकी सेवा करती थी। तल्ला कमस्यार में कुलूर नदी के किनारे कालिय नाग के पुत्र भद्रनाग के रहने की मान्यता है। जिसने आदिकाल में वहां अपने लिए एक भद्रपुर की रचना की थी।

कालिय नाग का मंदिर सानी उडियार से बेरीनाग जाने वाली सड़क के पास है। भद्रकाली गांव में देवी भद्रवती मंदिर के नीचे एक विशाल गुफा है। मानस खंड में कहा गया है कि इस गुफा में नागों और नाग कन्याओं द्वारा भद्रवती देवी की पूजा की जाती थी। दुर्गा सप्तशती में वर्णित भद्रकाली को ही भद्रवती कहा जाता है। नाकुरी के पपोली गांव में हरिनाग का तथा खंतोली गांव में खर नाग का मंदिर विद्यमान है। बेरीनाग और बासुकी नाग के मंदिर पिथौरागढ़ जिले में हैं।

मानस खंड में यह भी उल्लेख है कि कालिय नाग, तक्षक नाग, इलावर्त नाग और कर्कोटक नाग के पुत्र, पौत्र तथा वंशज यहां स्थित कण्व पर्वत पर रहते थे। इसी क्षेत्र में पिंगल नाग और नौलिंग नाग भी स्थित है। स्थानीय लोगों का मानना है कि नाग देवता उन्हें संकट से उबारते हैं। गाय या भैंस का पहला दूध तथा हर फसल का पहला अनाज नाग देवता को चढ़ाया जाता है। हर साल नाग पंचमी के दिन नाग मंदिरों में मेले लगते हैं, खीर का भोग लगाया जाता है।

अक्तूबर की पंचमी को 22 हाथ लंबा चिराग जलाकर धौलीनाग मंदिर की परिक्रमा की जाती है। नागों के यह मंदिर प्राचीन काल के अन्य पाषाण मंदिरों की तरह ही थे। अब इनका आधुनिकीकरण हो चुका है किंतु नाग देवता के प्रति लोगों की आस्था आज भी कम नहीं हुई है। गणाईगंगोली (पिथौरागढ़)। इलाके का प्रमुख धार्मिक स्थल बासुकीनाग मंदिर तमाम प्रयासों के बाद भी सड़क सुविधा से नहीं जुड़ पाया है। इलाके के लोगों ने बासुकीनाग के लिए सड़क का निर्माण करने की मांग उठाई है। कहा कि बासुकीनाग मंदिर जाने के लिए गणाईगंगोली से 18 किमी दूर देवराड़ी पंत से 3 किमी खड़ी चढ़ाई चढ़नी पड़ती है। सड़क न होने से बुजुर्ग और शारीरिक रूप से अस्वस्थ लोग मंदिर नहीं जा पाते।

अभी तक पर्यटन मानचित्र में जगह नहीं बना पाए हैं। अपनी धार्मिक पर्यटन स्थलों की इस यात्रा में जब वह जनपद बागेश्वर के कमस्यार घाटी के विजयपुर की पहाड़ी में स्थित धौलीनाग मंदिर परिसर में पहुंचती है तो उसकी पहली स्वाभाविक प्रतिक्रिया यही होती है कि क्यों न यहीं बस जाया जाय। यानी ऐसा रमणीक व अपने में बांध देने वाला स्थल जहां से जाने का मन न करे, लेकिन दुर्भाग्य से यह स्थल उत्तराखण्ड के पर्यटन मानचित्र में स्थान नहीं बना पाया।

न ही देशी-विदेशी पर्यटक ऐसे रमणीक स्थलों का दीदार कर पा रहे हैं। ये स्थल न सिर्फ धार्मिक आस्था के केंद्र हैं, बल्कि कई ऐतिहासिकताओं को भी अपने में समेटे हुए हैं। प्राकृतिक संपदा से भरपूर प्रकृति व धर्म आधारित पर्यटन की यहां व्यापक संभावनाएं हैं बशर्ते इन्हें विकसित कर यहां तक पर्यटकों की आवाजाही सुनिश्चित की जाए।

जनपद बागेश्वर के विजयपुर की पहाड़ी में स्थित धौलीनाग मंदिर जिसे धवलनाग, नागाधिराज एवं सफेदनाग के नाम से भी जाना जाता है। यह बड़ा ही रमणीक स्थल है, यहां नाग पंचमी के दिन प्रसिद्ध मेला लगता है। इस दिन स्थानीय धपोला, चंदोला, भूल जाति के लोग 22 हाथ लंबी चीड़ के छिलके की जलती मशाल के साथ मंदिर परिसर में पहुंचते हैं।

धौलीनाग का यह मंदिर पोखरी, धपोलासेरा, मिथनकोट, नाग कन्याल, खंतोली, भंडारीसेरा, ढपटी, कांडा, हथरसिया सहित 22 गावों में निवास करने वाले धपोला, चंदोला, धमी, राणा, पंत, पाण्डे, काण्डपाल, कन्याल आदि जाति के लोगों की आस्था का केंद्र रहा है। पहाड़ी पर स्थित यह स्थल इतना रमणीक है कि यहां से लौटने का मन न करे। यहां नाग देवता की पूजा होती है। पूरा गंगावली क्षेत्र गुफाओं के लिए प्रसिद्ध है। कई गुफाएं अस्तित्व में हैं तो कई गुफाएं अभी सामने नहीं आई। समय-समय पर खुदाई व सड़क निर्माण के दौरान गुफाएं निकल आती हैं।

इन गुफाओं की संरचना अद्भुत होती है। गुफाओं में तमाम तरह की आकृत्तियां कौतूहल का विषय बनती हैं। तमाम देवताओं का आकार ली हुई ये गुफाएं लोगों को आस्थावान बनाने के लिए प्रेरित करती हैं। प्रसिद्ध हो चुकी पाताल भुवनेश्वर गुफा अद्भुत है। इस गुफा में उतरने के लिए 82 सीढ़ियां तय करनी पड़ती हैं। शेषनाथ का फन, शिव की जटाएं, हवनकुंड, कामधेनु गाय के थन से निकलता दूध, सप्तकुंड, टेढ़े मुंह वाला हंस, नंदी, आकाश गंगा, ब्राहा, विष्णु, महेश की मेमि, शिव जटा की आकृति हैं। स्कंद पुराण के मानस खंड में गंगावाली क्षेत्र के शैल शिखर में 21 गुफाओं का उल्लेख है। अभी भोलेश्वर, मुक्तेश्वर, डाणेश्वर, कोटेश्वर, शैलेश्वर, महेश्वर गुफाएं ही अस्तित्व में आ पाई हैं। गुफाएं पर्यटन विकास की कड़ी साबित हो सकती हैं। हालांकि, पूर्व में अर्थ साइंस भू-विज्ञान मंत्रालय भारत सरकार ने गुफाओं पर शोध कार्य के साथ उन्हें चित्रित्रा करने की कोशिश की थी। माना जाता रहा है कि देश विदेश के पर्यटक गुफाओं को निहारने आएंगे तो इससे आर्थिकी को भी मजबूती मिलेगी और स्थानीय स्तर पर रोजगार भी उपलब्ध होगा।

उत्तराखण्ड की गुफाएं पर्यटन विकास में काफी फायदेमंद साबित हो सकती हैं। गुफाओं के अंदर के दृश्य लोगों को काफी कुछ सोचने के लिए विवश कर सकते हैं। कुमाऊ मंडल के जनपद पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट विकासखंड में स्थित गुफाओं को पर्यटन सर्किट से जोड़ने की बातें तो हुई, लेकिन इस पर काम नहीं हो पाया। गंगोलीहाट से बेरीनाग और मुनस्यारी को पर्यटन सर्किट से जुड़ना तो दूर की बात अकेले गंगोलीहाट में स्थित भोलेश्वर, कोटेश्वर, शैलेश्वर, मुक्तेश्वर, महेश्वर, डांडेश्वर जैसी गुफाओं तक पर्यटकों को पहुंचाने की व्यवस्था पर्यटन विभाग नहीं कर पाया। वर्ष 2005 में पिथौरागढ़ बेरीनाग, मुनस्यारी टूरिस्ट डेस्टीनेशन डेवलपमेंट योजना जिसका उद्घाटन तत्कालीन पर्यटन मंत्री ने किया था वह भी सीमांत जनपद के पर्यटन को पंख नहीं लगा पाई। पूर्व में इसे गुफाओं की घाटी के रूप में विकसित करने की योजना भी बनी थी। इसके लिए बकायदा पूर्व में प्रशासन ने सर्वे भी किया था, इसके प्रस्ताव भी बने थे, लेकिन जैसा अक्सर होता आया है कि इसके लिए बजट नहीं मिल पाया।

पाताल भुवनेश्वर तो पर्यटकों के लिए पंसदीदा जगह बनी लेकिन अन्य गुफाएं उपेक्षित ही रही। बताया जाता है कि इस मंदिर की स्थापना 400 साल पूर्व की गई थी। इस विशाल मंदिर परिसर में गगनचुंबी विशाल बांज के बड़े पेड़ भी आकर्षण का केंद्र हैं। कहा जाता है कि बागेश्वर के कांडा-कमस्यार क्षेत्र में कभी नागों का आधिपत्य रहा था। आज भी बागेश्वर व पिथौरागढ़ जनपद में कई क्षेत्र नागों के नाम से जाने जाते हैं। धौलीनाग मंदिर के अलावा बागेश्वर जनपद के कमेड़ी देवी में फेणीनाग, धरमधर में हरिनाग मंदिर स्थित हैं। तल्ला कमस्यार स्थित भद्रकाली मंदिर के नीचे स्थित गुफा को नागों और नाग कन्याओं का उपासना स्थल माना जाता है। यहां नाग ईष्टदेव के रूप में पूजे जाते हैं। इसे प्रसिद्ध कालियानाग का मंदिर माना जाता है।

भद्रकाली को वैष्णव स्वरूप में भी पूजा जाता है। इसकी महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती के रूप में भी पूजा होती है। कहा जाता है कि आदि गुरु शंकराचार्य भी यहां पधारे थे। यह बहुत प्राचीन मंदिर है। वर्ष 330 में इस मंदिर का निर्माण होना बताया जाता है। यहां उपनयन संस्कार सहित कई तरह के धार्मिक अनुष्ठान भी संपन्न होते हैं। कहा यह भी जाता है कि शिव की जटाओं से भद्रकाली की उत्पत्ति हुई थी। नागों के वंशज भी भद्रकाली के उपासक बताये जाते हैं।

पौराणिक काल के अनुसार जनपद के नाकुरी, पंगुरारू व कमस्यार क्षेत्र में नागों का निवास माना जाता है। जनपद पिथौरागढ़ के बेरीनाग में पिंगलनाथ, पांखू के पास बासुकीनाग, बेरीनाग में बेणीनाग, डीडीहाट में धु्रमीनाग, सुंदरीनाग, थल के समीप कालीनाग, ये ऐसे दुर्लभ स्थल हैं जहां पर पर्यटकों की आवाजाही बहुत कम है। न ही ये पर्यटन मानचित्र में स्थान बना पाए हैं और न ही इन स्थलों में पर्यटकों को पहुंचाने के प्रयास हो पाए हैं। इस क्षेत्र में नागों के ही नहीं देवी के कई प्रसिद्ध मंदिर हैं। पांखू के पास मां भगवती का कोटगाड़ी मंदिर स्थित है। इसे न्याय की देवी कहा जाता है। जब कहीं से व्यक्ति को न्याय नहीं मिलता तो वह यहां न्याय की अर्जी लगा देता है। इसके अलावा चामुंडा मंदिर, शीतला देवी, छामादेवी, अंबिका देवी के साथ ही राईआगर के पास त्रिपुरा देवी का प्रसिद्ध मंदिर है। बनकोट क्षेत्र का हरसैम मंदिर जिसे स्थानीय लोगों ने आपसी सहभागिता से दक्षिण भारतीय शैली में निर्मित कराया, अद्भुत स्थल है

। बनकोट क्षेत्र में ही नवीं शदी में बना प्राचीन कोटली विष्णु मंदिर है। जिसे हाल में ही पुरातत्व विभाग ने राष्ट्रीय धरोहर का दर्जा भी प्रदान किया है। देवराड़ी पंत स्थित वैष्णो मंदिर एवं पोखरी का नौलिंग, वैंजेंण क्षेत्र भी अद्भुत स्थल हैं। इसके अलावा कुनल्ता क्षेत्र तो प्राकøतिक दृष्टि से भरपूर है। हरे-भरे खेतों, पानी के सदाबहार स्रोतों के साथ ही सैम देवता व कुंडला देवी परिसर तो लोगों को वह शांति प्रदान करते हैं कि व्यक्ति फिर से अपने को तरोताजा महसूस करने लगता है। ये सभी लगभग एक ही दायरे में स्थित धार्मिक स्थल है। अगर सरकार चाहे तो बागेश्वर व पिथौरागढ़ जनपद की सीमाओं पर स्थित इन अद्भुत स्थलों का आधारभूत ढांचा विकसित कर यहां तक पर्यटकों की आवाजाही सुनिश्चित कर सकती है। पास में ही गंगोलीहाट को गुफाओं की घाटी के रुप में भी विकसित किया जा सकता है। यहां पर्यटन की अपार संभावनाए विद्यमान हैं जरुरत है तो इन्हें सिर्फ पंख लगाने की। इस तरह के स्थलों की बेहतर जानकारी रखने वाले कहते हैं कि इतने रमणीक व मान्यता वाले स्थलों का पर्यटन मानचित्र से दूर रहना सरकार की पर्यटन नीति पर सवाल खड़े करता है। वैसे भी उत्तराखण्ड तभी पर्यटन प्रदेश बन सकता है जब नए स्थानों को विकसित किया जाए। कुछ तो ऐसे स्थल हैं जहां पर स्थानीय लोगों ने अपने बलबूते धार्मिक स्थलों को सजाया संवारा है। सरकार को सिर्फ सड़क, होटल एवं अन्य बुनियादी सुविधाओं को आकार देकर इन पर्यटन स्थलों से लोगों को परिचित कराने की जरूरत है। इससे जहां सरकार के राजस्व में बढ़ोतरी होती तो वहीं स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी मिलते। पर्यटकों की आवाजाही से क्षेत्र भी गुलजार रहता। यहां ऐसे- ऐसे स्थल हैं जो देशी- विदेशी पर्यटकों को अपनी ओर खींचने में सक्षम हैं। आज पुराने जाने पहचाने स्थलों से बाहर निकल नए स्थलों के विकास व इसे प्रचारित किए जाने की जरूरत है।स्थानीय युवाओं को टूरिज्म से जोड़कर उन्हें रोजगार दिलाया जा सकता है। पर्यटन विभाग को इस दिशा में पहल करनी चाहिए।

लेखक द्वारा उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर का अनुभव प्राप्त हैं, वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।



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