अपनी बात

भाषा आंदोलन को मीडिया के प्रमुख भी मानते रहे हैं अपना, समर्थन ही नहीं सक्रिय साथ

रवींद्र सिंह धामी की फेसबुक वॉल से

संघर्ष के पल..भाषा आंदोलन में देश के प्रमुख अखबारों के अपनों का समर्थन…सनातन संस्कृति की वाहक भारतीय भाषाओं के खिलाफ अँग्रेजियत की साजिश के खिलाफ संघर्ष में वर्ष 1990 से 1998 तक तत्कालीन तब के प्रमुख अखबारों के सम्पादक, संवाददाता अपना संघर्ष मानते थे।

उनकी सक्रिय भागीदारी जब भी मौका मिलता नई ऊर्जा ..क्योंकि यह संघर्ष भारत को भारत बनाने का संघर्ष..आज 1998 के बाद से देवभूमि उत्तराखंड में 20-22 साल से पत्रकारिता का मौका मिला, उत्तराखंड के अपने अनुभव बाद में..पहले दिल्ली..प्रमुख अखबारों के अपनों का सक्रिय सहयोग..बारी बारी से अगले अंकों में उनका जिक्र..पहली कड़ी में ..तब नवभारत टाइम्स आईटीओ जाते ही सम्पादक विद्या निवास मिश्र जी, अच्युतानंद मिश्र जी, डॉ.गोविंद सिंह जी, ओम प्रकाश तपस, हबीब अख्तर जी, विनोद अग्निहोत्री जी हो या अन्य सभी का अपनापन..सक्रिय समर्थन मिलते ही नई ऊर्जा..जनसत्ता, हिंदुस्तान, सहारा, भाष्कर, उजाला, राजस्थान पत्रिका, भाषा, यूनीवार्ता सभी प्रमुख अखबारों के अपने इसे अपना संघर्ष मानते। जिनका आगे..नभाटा का आज इसलिए कि आदरणीय अच्युतानंद मिश्रा जी से बीते दिनों फोन पर आशीर्वाद लिया तो बोले अब में घर पर हूं जो भी सम्भव सक्रिय भागीदारी संघर्ष में होगी।

डॉ. गोविंद सिंह जी हल्द्वानी में उत्तराखंड ओपन विवि में पत्रकारिता में नई पीढ़ी को नई ऊर्जा..उनका तो आज भी जब पूरा आशीर्वाद.. हबीब अख्तर जी दैनिक आज समाज अखबार के दिल्ली मेट्रो सम्पादक हैं और बोले यह संघर्ष हमारा अपना है आंदोलन के साथ अखबार में उत्तराखंड से पत्रकारिता ..।

जबकि विनोद अग्निहोत्री जी अमर उजाला के एसोसिएट सम्पादक हैं उनसे भी बीते दिनों वर्षो बाद संपर्क तो वही पुराना अपनापन मिला, बोले कहां हो। आदरणीय विद्या निवास मिश्रा जी व ओम प्रकाश तपस जी आज हमारे बीच नहीं हैं उनको नमन..उनके संघर्ष को..आगे बढ़ाना हमारा संकल्प है..यह तो तब के एक प्रमुख अखबार के अपनों का समर्थन है आगे..प्रमुख अखबारों के अपनों के समर्थन का जिक्र..आज इसलिए कि नई पीढ़ी के पत्रकारिता के साथियों के समक्ष रखना कि जनहित, समाज हित, देश हित के लिए कलम जब तब चलती थी हो हिल जाती थी अँग्रेजियत..कलम के साथ सक्रिय भाषा आंदोलन को समर्थन व अपना मानते और इससे जुड़े अपने भी तब अपने थे..देश भर के सभी अपनों को प्रणाम..रवींद्र सिंह।

रवींद्र सिंह धामी, राष्ट्रीय सचिव, अखिल भारतीय भाषा संरक्षण संगठन, नई दिल्ली



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