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एनआईएफ़ की अनुवाद फ़ेलोशिप के लिए मलयालम, हिंदी और उर्दू की चार महत्वपूर्ण रचनाओं का चयन

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नई दिल्ली। न्यू इंडिया फ़ाउंडेशन (एनआईएफ़) ने चयन प्रक्रिया के बाद अपनी अनुवाद फ़ेलोशिप के तीसरे दौर के विजेताओं के नामों की घोषणा की है। 2026 के अनुवाद फ़ेलो हैं: मलयालम में जयश्री कलतिल और मिनी चंद्रन, हिंदी में मुरली रंगनाथन और उर्दू में शेफाली झा ।
पुरस्कृत द्विभाषी लेखिका और अनुवादक जयश्री कलतिल को आदिवासी भूमि अधिकार कार्यकर्ता सी.के. जानू की आत्मकथा आडिममक्का का अनुवाद करने के लिए फ़ेलोशिप मिली है। यह पुस्तक केरलम में भूमि अधिकारों के लिए आदिवासी आंदोलन का इतिहास है। जानू आदिवासी लोगों के उस राजनीतिक संघर्ष के इतिहास को सामने लाती हैं, जो केरलम के विकास के बहु-चर्चित मॉडल के रिकॉर्ड से नदारद है। यह पुस्तक भूमि, अधिकारों और राजनीति की आदिवासी समझ में योगदान देती है। कलतिल ‘ द बॉम्बे लिटरेरी मैगज़ीन में अनूदित कथा-साहित्य की मैनेजिंग एडिटर हैं और एएलटीए एमर्जिंग ट्रांसलेटर्स मेंटरशिप प्रोग्राम में मेंटर के तौर पर काम करती हैं।
आईआईटी कानपुर में अंग्रेज़ी की प्रोफ़ेसर मिनी चंद्रन मशहूर नाटककार तोप्पिल भासी के संस्मरणों पर आधारित पुस्तक ओलीविले ओरमगल का अनुवाद करेंगी। भासी एक प्रमुख मलयालम नाटककार थे, जो अपने नाटक ‘निंगलन्ने कम्युनिस्टाक्की’ (तुमने मुझे कम्युनिस्ट बना दिया) के लिए सबसे ज़्यादा जाने जाते हैं। इस पुस्तक में सिर्फ़ पांच साल—1948 से 1953 – का समय दर्शाया गया है, फिर भी यह मलयालम की सबसे मशहूर आत्मकथाओं में से एक है। भारतीय राज्यों के विकास को दर्ज करने वाले सामाजिक-ऐतिहासिक लेख- संग्रहों में यह एक अहम योगदान है।
इतिहासकार, लेखक और अनुवादक मुरली रंगनाथन को राहुल सांकृत्यायन की पुस्तक तिब्बत में सवा वर्ष के अनुवाद के लिए फ़ेलोशिप प्रदान की गई है। 1934 में प्रकाशित इस पुस्तक में सांकृत्यायन की दिसंबर 1928 से जून 1930 के बीच बुद्ध की खोज में की गई यात्राओं का विवरण है, जो कोलंबो से शुरू होकर वहीं खत्म हुई थीं। जिस दौर में भारत, नेपाल और तिब्बत में विदेशियों के आने पर पाबंदी थी, तब उन्होंने इन देशों की गुप्त यात्रा की थी। उन्होंने एक तरफ़ नेपाल और तिब्बत और दूसरी तरफ़ तिब्बत और चीन के बीच के तनाव को बहुत नज़दीक से देखा और समझा। साथ ही, उन्होंने उस समय की औपनिवेशिक (लेकिन जल्द ही स्वतंत्र होने वाली) भारतीय सरकार की भूमिका का भी विश्लेषण किया था।एंथ्रोपोलॉजिस्ट और स्कॉलर शेफाली झा इब्राहिम हुसैन जलीस की किताब दो मुल्क, एक कहानीका उर्दू से अनुवाद करेंगी। आज़ादी के बाद के दक्षिण एशिया के उथल-पुथल भरे राजनीतिक माहौल को दर्ज करने वाली यह किताब व्यक्तिगत अनुभव पर आधारित पत्रकारिता के क्षेत्र में एक अहम दस्तावेज़ है। यह एक युवा उर्दू लेखक और पत्रकार के नज़रिए से आज़ादी पाने के बाद दक्षिण एशिया के निर्माण की अहम घटनाओं का ब्यौरा देती है। इसमें हैदराबाद रियासत के आख़री साल (1947-48) का अनूठा वृत्तांत है, जिसमें प्रगतिशील लेखक जलीस (1923-1977) हैदराबाद के मक़सद के लिए निज़ाम-विरोधी समर्थक के तौर पर इत्तेहादुल- मुस्लिमीन की राजनीति और गतिविधियों में अपनी छोटी लेकिन अहम भागीदारी और आख़िर में रियासत के ख़त्म होने की कहानी बताते हैं।
“इस साल के फ़ेलो आज के भारत में अनुवाद के क्षेत्र में मौजूद असाधारण विद्वता का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने जो पुस्तकें चुनी हैं, उनमें आत्मकथा, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत और राजनीतिक पत्रकारिता शामिल हैं, और ये भारत के बौद्धिक और सामाजिक इतिहास पर एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं।” नीरजा गोपाल जयाल, गवर्निंग बोर्ड सदस्य, न्यू इंडिया फ़ाउंडेशन।
यह फ़ेलोशिप प्रत्येक फ़ेलो को छह महीने के लिए ₹6 लाख का अनुदान देती है ताकि वे दस भारतीय भाषाओं—असमिया, बांग्ला, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, मराठी, मलयालम, ओडिया, तमिल और उर्दू–में लिखी गई कथेतर रचनाओं का अनुवाद कर सकें। इस साल इस फ़ेलोशिप के चयन के लिए निर्णायक समिति में एनआईएफ़ न्यासियों के साथ ही सभी दस भाषाओं की भाषा विशेषज्ञ समितियां थीं, जिनमें प्रतिष्ठित द्विभाषी विद्वान, प्रोफ़ेसर और साहित्यिक अनुवादक शामिल थे।
“भारत के बारे में कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण किताबें भारतीय भाषाओं में लिखी गई हैं, फिर भी कई किताबें बड़े पाठक-वर्ग तक नहीं पहुंच पाती हैं। अनुवाद फ़ेलोशिप के माध्यम से हम इन बेहतरीन रचनाओं का अंग्रेज़ी में अनुवाद करने में अनुवादकों की मदद करना चाहते हैं, ताकि वे अलग-अलग क्षेत्रों और पीढ़ियों तक पहुंच सकें।” श्रीनाथ राघवन, गवर्निंग बोर्ड सदस्य, न्यू इंडिया फ़ाउंडेशन ।
एनआईएफ़ ने ज्ञान और सूचना को लोकतांत्रिक बनाने और भारतीय भाषाओं की महत्वपूर्ण रचनाओं को बड़े पाठक-वर्ग तक पहुंचाने के लिए 2022 में अपनी अनुवाद फ़ेलोशिप शुरू की थी ।
न्यू इंडिया फ़ाउंडेशन: एक परिचय
एनआईएफ़ तीन मुख्य प्रोग्राम चलाता है: एनआईएफ़ बुक फ़ेलोशिप, अनुवाद फ़ेलोशिप और कमलादेवी चट्टोपाध्याय एनआईएफ़ बुक प्राइज़ । एनआईएफ़ अशोका सैंटर फ़ॉर ट्रांसलेशन के साथ भाषावाद नामक वार्षिक अनुवाद संगोष्ठी भी आयोजित करता है। इस संगोष्ठी ने भारत में अनुवादों का एक अनोखा और सर्च करने योग्य डेटाबेस (bhashavaad.in) भी तैयार किया है, जिसमें 30,000 से ज़्यादा प्रविष्टियां हैं और यह संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। पिछले दो दशकों में, एनआईएफ़ बुक फ़ेलोशिप ने लगभग 40 बेहतरीन कथेतर किताबों को अपना सहयोग दिया है, जो 1947 के बाद के भारत के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाती हैं। इन किताबों में राजनीतिक जीवनियों और सांस्कृतिक इतिहास से लेकर संस्मरण तक शामिल हैं, और हर किताब आज के भारत की एक अलग समझ पेश करती है। न्यू इंडिया फ़ाउंडेशन का मार्गदर्शन न्यासियों का एक सम्मानित बोर्ड करता है, जिसमें पॉलिटिकल साइंटिस्ट नीरजा गोपाल जयाल, इतिहासकार श्रीनाथ राघवन, ट्राइलीगल के पार्टनर राहुल माथन, आंत्रेप्रेन्योर मनीष सभरवाल और नंदन नीलेकनी (मानद गवर्निंग बोर्ड सदस्य) शामिल हैं।

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