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कालाहाण्डी के कर्लापाट अभयारण्य में एक पखवाड़े में छह हाथियों की मौत से जनमानस उद्वेलित 

By Suresh Agrawal, Kesinga, Odisha

 पहली से चौदह फ़रवरी 2021 के बीच कालाहाण्डी के कर्लापाट वन्यजन्तु अभयारण्य में कुल सत्रह हाथियों में से छह के मर जाने से प्रकृति एवं वन्यजन्तु-प्रेमियों में चिन्ता की लहर दौड़ गयी है। एक पखवाड़े में छह हाथियों की मौत अब तक किसी भी अभयारण्य में हुई मौतों में सर्वाधिक हैं। कर्लापाट अभयारण्य में मृत छह हाथियों में चार मादा हैं। यद्यपि, प्रारम्भिक रिपोर्ट में इतनी संख्या में हाथियों के मारे जाने का कारण मवेशियों में पाये जाने वाला रोग हैमरेजिक सेप्टिसीमिया बतलाया गया है, परन्तु जानकार लोग वन-विभाग को भी इस ज़िम्मेदार से मुक्त नहीं करते। वैसे भी वर्ष 2020-21 की अवधि में अब तक ओड़िशा प्रदेश में कुल 61 हाथियों के मारे जाने का आंकड़ा चौंकाने वाला है। इन 61 मौतों में 28 हाथियों की मौत अस्वाभाविक मानी जा रही है, जबकि छह को ज़हर अथवा पोच कर मारने का सन्देह है। छह से अधिक हाथियों की मृत्यु बिजली के तार छू जाने के कारण भी हुई है। प्रश्न उठता है कि आख़िर, इतनी बड़ी तादाद में गजराज की मौत का ज़िम्मेदार कौन है और यदि इसी रफ़्तार से मौतें होती रहीं, तो क्या एक दिन ऐसी स्थिति नहीं बन जायेगी, जब भीमकाय हाथी की प्रजाति भी डायनासोर की तरह विलुप्त हो इतिहास के पन्नों में समा जायेगी।

देखने में आया है कि जंगलों की अंधाधुंध कटाई के कारण कालाहाण्डी में हाथियों अथवा अन्य वन्यजन्तु आवासीय क्षेत्र काफी सिकुड़ गया है, जिसके चलते वे बाहर का रुख करते एवं दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार कालाहाण्डी में हाथियों का गलियारा पड़ौसी फुलबानी ज़िले के बेलघर से सिंगारी तथा बालीगुड़ा से लेकर बलांगीर ज़िले की सीमा तक कोई 250 वर्ग-किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है।

उल्लेखनीय है कि कर्लापाट अभयारण्य की घोषणा 1978-79 में की गयी, जबकि 1982-83 में वन-विभाग द्वारा इसे व्याघ्र अभयारण्य की संज्ञा दी गयी। तब अभयारण्य की जद में आने वाले कुछ गांवों के विस्थापन हेतु केन्द्र सरकार द्वारा चालीस करोड़ की अनुदान राशि भी प्रदान की गयी थी, परन्तु वन-विभाग द्वारा विस्थापन कार्य पर अमल न कर उक्त राशि लौटा दी गयी थी। नतीजतन आज स्थिति यह है कि भवानीपटना से थुआमूल-रामपुर जाते समय इस क्षेत्र में बहुधा लोगों का सामना हाथियों से हो जाता है।


हालांकि, हाथी रिहायशी क्षेत्र सुधार एवं विकास, हाथी कॉरिडोर, नाली, चहारदीवारी तथा जलाशय निर्माण हेतु भी योजनाएं विद्यमान हैं, परन्तु लगता है कि उन पर अमल नहीं किया जाता, जिसके चलते अनेक बार पानी आदि की तलाश में गजराज राह भटक अपने कॉरिडोर से बाहर चले जाते और दुर्घटनाओं का शिकार हो जाते हैं। जिनमें रेल-लाइन पार करते अथवा जीवित विद्युत तारों के सम्पर्क में आने से होने वाली दुर्घटनाएं शामिल हैं।

आंकड़े बताते हैं कि विगत एक दशक में विद्युत तार छू जाने से प्रदेश में बीस से अधिक हाथी मारे गये हैं, जबकि पचास हाथी कालाहाण्डी, रायगड़ा, बलांगीर, कंधमाल आदि जिलों में सक्रिय हाथी-दाँत तस्कर गिरोह के हत्थे चढ़ चुके हैं। अफ़सोस की बात तो यह है कि वन-विभाग के पास ऐसी घटनाओं के आंकड़े पहुंचते ही नहीं। कालाहाण्डी से हाथी-दाँत की पश्चिम बंगाल को तस्करी होने के समाचार मिलते हैं, ऐसे तस्करों के अन्य राज्यों में पकड़े जाने के समाचार भी मिलते हैं, परन्तु यहां कालाहाण्डी में तस्कर अधिकारियों को कैसे चकमा देकर निकल जाने में सफल हो जाते हैं, यह भी एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा करता है।

स्वाभाविक है कि हाथियों की सुरक्षा को लेकर अब यहां यह मांग ज़ोर पकड़ने लगी है कि -इस पर तुरन्त एक ब्लू-प्रिन्ट पेश किया जाये। देखना है कि अब सरकार और वन-विभाग हाथियों की असाधारण मौत मामले को कितना गम्भीरता से लेते हैं।



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