साहित्य

पहाड़ : आस और आंसू

By CS Karki

पहाड़ संभाले हैं सीने में
कठोर चट्टान,
छाती पर उगाते हैं नरम घास
विशाल दरख्तों से सोखते हैं
खूब नमी टकराते हैं बादलों से
बहा देते हैं सारा जीवन जल।

ऊंचे बहुत ऊंचे उठकर
शिखाओ में जमा दी बर्फ़
कपकपा, नहीं,
न सिकुड़े हम
पिघल पिघल कर
इठलाती नदियों से
बहा देते हैं सारा जीवन जल।

तिनके की तरह पालते हैं मानव को,
जैसे रोपाई का धान
जड़े कीचड़ में जमा
मजबूत होता, बढ़ता इंसान
पकी फसल की तरह
बहा देते हैं जोश शौर्य और ज्ञान।

कुछ और था मेरे सीने में लोहा,
संभाले था चट्टानों को
दरखतो को थामे था,
कि खूबसूरत लगूं
जो बह न सका
उसे संभाल के रख सकूं।

पर तुम क्या आए
विकास को बुल्डोजर में लाद कर
रग रग उधेड़ गए
तिनका तिनका ले गए
मलवा छोड़ गए
बहुत घायल कर गए।



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