अपनी बात

महात्मा गांधी की सर्वोदयी और सविनय अवज्ञा की अवधारणा का स्रोत और 1942 की अगस्त क्रान्ति में उसका प्रभाव

By G D Pandey
हमारे देश में 2 अक्टूबर का दिन गांधी जयन्ती और लाल बाहदुर शास्त्री की जयंती का प्रतीक है। प्रतिवर्ष 2 अक्टूबर को देश भर में भव्य कार्यक्रमों के जरिए गांधी विचारधारा के विभिन्न पहलुओं का बखान किया जाता है। राजनेताओं द्वारा भारत के शोषित उत्पीड़ित तथा वंचित जन समुदाय को गांधी जी केे द्वारा बताये गये मार्ग पर चलने का उपदेश भी बखूबी दिया जाता है। भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन में गांधी जी की अहम भूमिका, चाहे वह जिस रूप में हो मानी जाती है। उनके द्वारा चलाये गये सत्याग्रह आंदोलन तथा सविनय अवज्ञा आंदोलन से जनता में अलख जगाने के तरीके के मद्देनजर हमारे राष्ट्रीय गान -जन गण मन के रचियता रवीन्द्र नाथ टैगोर ने गांधी जी को महात्मा की उपाधि दी और ’आजाद हिन्द फौज’ के संस्थापक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने गांधी जी को राष्ट्रपिता की उपाधि दी थी तभी से गांधी राष्ट्रपिता माहत्मा गांधी भी कहलाते हैं।

मोहन दास कर्मचन्द गांधी ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के तहत ब्रिटेन से बैरिस्टर की डिग्री प्राप्त की और वापस भारत आने के बाद मुंबई में वकालत शुरू कर दी थी, उसी बीच उन्हें दक्षिण अफ्रीेका से एक कम्पनी ने आने के लिए आफर भेजा और गांधी जी भारत से दक्षिण अफ्रीका चले गये । उस समय भारत में ब्रिटिश शासन की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए जन आक्रोश बढ़ता ही जा रहा था और युवा क्रान्तिकारी साम्राज्यवादी दमन चक्र द्वारा कुचले जा रहे थे। उस समय दक्षिण अफ्रीका में ब्रिटिश शासन की रंगभेदी नीतियों का आध्यिपत्य था।

मोहनदास क्रमचन्द गांधी 21 वर्ष तक दक्षिण अफ्रीका में ही रहे। उन 21 वर्षों में भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की वेदी पर सैकड़ों भारतीय युवाओं ने अपने प्राणों की आहुति देकर राष्ट्रभक्ति तथा मां भारती के सच्चे सपूत होने का प्रमाण दिया। जिनमें युवा क्रान्तिकारी खुदीराम बोस का नाम अग्रणी है। दासता की बेड़ियों को तोड़ने का अदम्य साहस तथा अटूट संकल्प के साथ अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेते हुए महज 19 वर्ष की उम्र में उन्होंने 11 अगस्त 1908 को हंसते हंसते फंसी के फंदे को चूम लिया। इतिहास इस बात का भी साक्षी है कि देश के सच्चे सपूतों ने अपनी पढ़ाई और पेशे को तिलांजलि देकर देश की आजादी के लिए सच्चा मार्ग चुनकर हिम्मत और हौंसले का संदेश जन -जन तक पहुंचाया और इतिहास में स्वर्णाक्षरों में स्थान प्राप्त किया।

एम के गांधी सन 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। सर्वोदय, अहिंसा और सत्याग्रह की विचारधारा तब तक उन्होंने अपना ली थी । किसी भी व्यक्ति की विचारधारा उसके भौतिक जीवन, उसके मार्गदर्शक अध्ययन तथा उसके परिवेश द्वारा निर्धारित एवं विकसित होती है। एम केे गांधी जब दक्षिण अफ्रीका में थे तो उन्हें वहां पर साम्राज्यवादियों की रंगभेद नीति का शिकार होना पड़ा, उन्हें रेलगाड़ी से धक्का देकर बाहर करने जैसी घटनाओं को सहन करना पड़ा। उन्होंने दक्षिण अफ्रीक में कई विदेशी विचारकों की पुस्तकों का अध्ययन किया। वहां पर गांधी जी को क्रूर रंगभेदी साम्राज्यवाद के सामने अनुनय विनय करने वालों का ही परिवेश भी मिला।

उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में अमेरिकी विचारक हेनरी डेविड थोरो की पुस्तक ‘सिविल डिसओविडियेंस’ का अध्ययन किया, रूसी विचारक टालस्टाय की पुस्तक ‘द किंगडम आफ गौड इज विदिन यू’ का अध्ययन किया और रूस के ही एक अन्य विचारक जौन रसकिन की पुस्तक ‘अंटू द लास्ट’ का अध्ययन किया। इस तरह के सहित्य के अध्ययन तथा कुछ भारतीय प्राचीनतम मानव साहित्य वेद-पुराण इत्यादि के आधार पर गांधी जी ने अपनी विचारधारा को निर्धरित किया। इस तरह का सहित्य आध्यात्मिक विचारकों तथा लिवरल डेमोक्रेटस के द्वारा रचित हैं। गांधी जी की सर्वोदय की अवधारणा का मुख्य स्रोत जौन रसकिन की पुस्तक ‘अंटू द लास्ट’ में निहित है। रसकिन रूस के लिवरल डेमोक्रेटस में से एक थे। उनकी विचारधारा रूस में जारशाही के विरुद्ध मजदूर किसान और बुद्धिजीवियों की बोलशेविक क्रान्ति जिसका वैचारिक आधार  मार्क्सवाद-लेनिनवाद था। उसके सामने व्यवहार में सार्थक सबित नहीं हुई।

गांधी जी स्वयं को सत्य और अहिंसा का पुजारी मानने लगे और उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह आन्दोलन की शुरुआत भी की। भारत में आकर सन् 1917 में उन्होंने चम्पारन (बिहार) में नील किसानों की समस्याओं को लेकर सामंतों के सम्मुख सत्याग्रह आन्दोलन चलाया। विद्वानों का यह भी मानना है कि गांधी जी के सत्याग्रह के विचार का स्रोत अमेरिकी विचारक हेनरी डेविड थोरो की पुस्तक ‘सिविल डिसओविडियेंस’ है भारत में महात्मा गांधी ने 1920 असहयोग आंदोलन तथा 1930 में सविनय अविज्ञा आंदोलन चलाये।

सन् 1942 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के मुंबई अधिवेशन में ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को भारत छोड़ने के लिए  मजबूर करने हेतु प्रस्ताव परित किया गया और ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ को ’सविनय अवज्ञा आन्दोलन’ के रूप में चलाने हेतु महात्मा गांधी को आंदोलन की कामान सौंपी गयी। यह प्रस्ताव 8 अगस्त 1942 को पारित होते ही 9 अगस्त 1942 की सुबह से ही पूरे देश में एक साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाने के लिए महात्मा गांधी ने जनता को एक मंत्र भी दिया, वह मंत्र था ’करो या मरो’ लेकिन 9 अगस्त की सुबह ही गांधी समेत कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को देश के विभिन्न भागों में स्थित जेलों में डाल दिया गया। जन आक्रोश के चलते यह आंदोलन नेतृत्व विहीन होने के वाबजूद स्वतः स्फूर्त आंदोलन के रूप में देश भर में एक साथ उग्र रूप में फैल गया। सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा तथा अहिंसा के गांधी जी के विचार गांधी जी तक ही रह गये और 1942 के इस जन आन्दोलन में अव्यवहारिक सिद्ध हो गये। भारत की क्रान्तिकारी जनता ब्रिटिश साम्राज्यवाद को जड़ से उखाड़ फेंकना चाहती थी इसीलिए यह आन्दोलन हिंसक एव क्रान्तिकारी तरीके से पूरे देश में आग कि तरह फैल गया जनता द्वारा जगह-जगह पर रेल पटरियों को उखाड़ फेंका गया ।

ब्रिटिश सरकार की कंपनियों में आग लगाने की कार्यवाही तथा हमले की कार्यवाही शुरू हो गयी, डाक व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर दिया गया। जनता और पुलिस के बीच हिंसक वारदातें होने लगी। ब्रिटिश शासकों ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की नींव को हिलता देख तुरंत अपने रक्षा कवच पुलिस तथा रटेट मशीनरी के बल पर दमनचक्र तेेजकर दिया हजारों आंदोलनकारियों को गोलियों से भून दिया गया। लगभग 60 हजार लोगों को जेल में ठूंस दिया गया।
क्रान्तिकारी जनता निहत्थी थी, उसकी इस आंदोलन के लिए कोई योजनाबद्ध तैयारी भी नहीं थी। तत्कालीन नेतृत्व जनता में साम्राज्यवाद के विरद्ध आक्रोश को न तो गहराई से समझ पाया और ना ही जनता को हिंसक क्रान्ति के लिए गोलबंद किया गया था। पूरा नेतृत्व जेल में बंद कर दिया गया तथा सत्याग्रह, अहिंसा और सविनय अवज्ञा की विचारधारा का जनता में कोई न तो असर ही था और ना कोई प्रासंगिकता। इसीलिए 1942 की अगस्त क्रान्ति स्वतः स्फूर्त तरीके से चली और अन्तिम लक्ष्य हासिल किये बिना ही समाप्त हो गयी। अतः महात्मा गांधी जी के सर्वोदय की अवधारणा अगस्त क्रान्ति में जनता को साम्राज्यवादी दमन चक्र से बचाने में विफल और साम्राज्यवाद को उखाड़ फेंकने के लिए अव्यवहारिक सिद्ध हो गयी।

ऐसा ठीक उसी तरह से हुआ जिस तरह रूस में जौन रसकिन जैसे लिवरल डैमोक्रेट की विचारधारा जारशाही को उखाड़ फेंकने और मजदूर -किसान तथा बुद्धिजीवियों के क्रान्तिकारी आन्दोलनों को नेतृत्व देने के काम में अव्यवहारिक तथा अप्रासंगिक हो गयी। उसके विपरीत रूस में 1917 की बोलशिविक क्रान्ति का सफल नेतृत्व मार्क्सवादी-लेनिनवादी विचारधारा ने किया।
महात्मा गांधी के सर्वोदय और सुधारवादी विचारों का कुछ असर हमारे संविधान के नीति निर्देशक सिद्धांतों में कुछ दिखाई देता है जैसे -मद्य निषेध, पंचायती व्यवस्था तथा कर्तव्य परायरणता आदि ।  इसके अलावा अन्तोदय, मनरेगा और ’सबका साथ सबका विकास’ इत्यदि भी महात्मा गांधी जी के विचारों पर ही आधारित है।



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