Anil Azad Pandey, Beijing
18वां ब्रिक्स सम्मेलन भारत की राजधानी नई दिल्ली में सफलता से संपन्न हो गया, जिसमें विभिन्न देशों के नेताओं ने अपनी महत्वपूर्ण उपस्थिति दर्ज कराई। इससे ब्रिक्स देशों के बीच आपसी सहयोग मजबूत होने का संकेत मिलता है। यह भारत–चीन द्विपक्षीय संबंधों के लिहाज से काफी अहम रहा, क्योंकि चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग 7 वर्षों के बाद भारत पहुंचे। जबकि रूस, ईरान, दक्षिण अफ्रीका समेत अन्य देशों के बड़े नेताओं ने भी ब्रिक्स में आकर ग्लोबल साउथ को सशक्त बनाने पर जोर दिया।

भारत की अध्यक्षता में हुए ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ने पूरे विश्व का ध्यान अपनी ओर खींचा, क्योंकि कई देश अमेरिका और पश्चिमी देशों की मनमानी से तंग आ चुके हैं। ऐसे में उन्हें शांगहाई सहयोग संगठन और ब्रिक्स जैसे मंचों के लिए अपनी आवाज़ उठाने का अवसर मिलता है। यह इस बात का भी प्रतीक है कि एकध्रुवीय विश्व और दादागिरी का समय बीत चुका है। क्योंकि छोटे और कमजोर देश भी अपनी बात रखने के लिए आगे आने लगे हैं।
अमेरिका ने हाल के दशकों में विश्व के कोने–कोने में युद्ध छेड़े हैं और बहाने बनाकर दूसरे देशों पर हमले किए हैं और उनके नेताओं को गिरफ्तार किया। यह वाकई में दुनिया के लिए चिंता का एक विषय है। इतना ही नहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप टैरिफ लगाने की धमकी देकर लगातार अन्य राष्ट्रों को परेशान करते रहे हैं। वहीं ईरान के खिलाफ युद्ध छेड़कर अमेरिका ने पूरे मध्य एशिया और पश्चिम एशिया को संकट की कगार पर खड़ा कर दिया है। इस सब के बीच ब्रिक्स का आयोजन पश्चिम को य़ह ध्यान दिलाने का है कि दुनिया में उनके अलावा भी देश हैं, जो अपनी चिंता और मुश्किलों को उठाने के लिए आगे आ सकते हैं।
इस तरह दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का सफल समापन हो गया, अगली बार ब्रिक्स नेता चीन में मिलेंगे। 2027 में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी चीन करेगा, जिसमें ग्लोबल साउथ की अवधारणा और ग्रेटर ब्रिक्स को व्यापक रूप मिलेगा। ब्रिक्स के भीतर शुरू में केवल चीन, भारत, रूस और ब्राजील शामिल थे। बाद में इसमें दक्षिण अफ्रीका भी मिल गया। अब इसमें 11 सदस्य देश हैं, जबकि कई पार्टनर देश भी।
यह भी कहना होगा कि चीन और भारत एससीओ और ब्रिक्स जैसे मंचों को मजबूत करने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। विश्व की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने विभिन्न संगठनों में भागीदार के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाई है।

इस बीच ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में चीनी राष्ट्रपति के भाग लेने और उनके भाषण को भी सराहा गया। शी ने नई दिल्ली में, “ब्रिक्स सहयोग की नींव मजबूत करें, ग्लोबल साउथ की ताकत को बढ़ाएं” शीर्षक भाषण दिया। अगर ब्रिक्स जैसे संगठन मजबूत होते हैं तो उससे बहुध्रुवीय विश्व की आवाज सामने आती है। वैसे इन संगठनों में शामिल सभी देशों का अपना महत्व है, लेकिन चीन, भारत और रूस के नेता और देशों का एकजुट होकर एक स्वर में बात कहना दुनिया को सशक्त संदेश देता है।
दिल्ली में हुए ब्रिक्स सम्मेलन में हमें इस बात का बखूबी अहसास हुआ कि अगर रूस, चीन और भारत के बीच सहयोग और विश्वास मजबूत होता है तो यह समूचे विश्व के विकास के लिए उम्मीद की नयी किरण होगा।
गौरतलब है कि चीनी राष्ट्रपति सात वर्षों के बाद भारत पहुंचे और भारतीय प्रधानमंत्री मोदी से उनकी मुलाकात हुई। इस बैठक और उनकी भारत यात्रा को विशेषज्ञों ने बहुत महत्वपूर्ण करार दिया।
चीनी राष्ट्रपति शी ने कहा कि चीन और भारत दोनों की भले ही राष्ट्रीय स्थितियां अलग–अलग हों, लेकिन वे एक–दूसरे की खूबियों से सीखकर साझा सफलता और विकास हासिल कर सकते हैं। इस दौरान दोनों नेताओं ने खुलकर और गहराई से बातचीत की और चीन व भारत के साझेदार होने पर एक अहम सहमति बनाई।
शी के मुताबिक जटिल अंतरराष्ट्रीय माहौल के बीच, दुनिया के दो सबसे ज़्यादा आबादी वाले देशों और ‘ग्लोबल साउथ‘ के अहम सदस्यों के तौर पर चीन और भारत की ज़िम्मेदारियां बहुत बड़ी हैं।
भारत–चीन द्विपक्षीय संबंधों को लेकर उन्होंने भारत से आग्रह किया कि वह निष्पक्ष और तर्कसंगत रणनीतिक समझ के साथ दिशा तय करे। इतना ही नहीं चीन और भारत साझेदार हैं, प्रतिद्वंद्वी नहीं, वे एक–दूसरे के लिए विकास के अवसर हैं, न कि खतरा।
इससे पता चलता है कि चीन भारत के साथ संबंधों को सामान्य करने के लिए गंभीर है, क्योंकि ड्रैगन और हाथी का एक साथ आना बहुत मायने रखता है। चीन मैन्युफैक्चरिंग का हब है और उच्च गुणवत्ता वाले विकास पर जोर दे रहा है। जबकि भारत तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था है, जो काफी अच्छी विकास दर हासिल कर रहा है। भारत में विकास की व्यापक संभावनाएं हैं, और चीन भारत के आधारभूत ढांचे आदि के विकास में सहयोग दे सकता है।
(लेखक चाइना मीडिया ग्रुप में वरिष्ठ पत्रकार हैं)







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