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कालाहाण्डी में सौ साल पहले लग चुका था बिजली का पहला पावर हाउस

By Suresh Agrawal, Kesinga, Odisha

क्या आप जानते हैं कि सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से अत्यंत पिछड़ा समझे जाने वाले कालाहाण्डी में आज से सौ साल पहले बिजली का पावर हाउस लग चुका था और इसके ज़िला मुख्यालय शहर भवानीपटना की सड़कें तब भी विद्युतीय रोशनी से जगमगाती थीं ? यह सुन कर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है, परन्तु यह सत्य है कि तत्कालीन कालाहाण्डी रियासत के महाराजा ब्रजमोहन देव के प्रयासों से देश का पहला निजी विद्युत उत्पादन केन्द्र भवानीपटना में स्थापित हुआ था। गांधी चौक के समीप स्थित उक्त पावर हाउस के निर्माण में इस्तेमाल जर्मन उपकरण अब भी मौज़ूद हैं, परन्तु देखरेख एवं रखरखाव के अभाव में सड़ चुके हैं।

इतिहास का मूक साक्षी बना यह पावर हाउस आज भी कालाहाण्डी वासियों के लिये उनकी गौरव-गाथा का प्रतीक बना हुआ है।प्राप्त जानकारी के अनुसार महाराजा ब्रजमोहन देव सन 1910 में गुरुदासपुर, पंजाब के शेखमार सरदार पाला सिंह, जो कि एक इलेक्ट्रिक मैकेनिकल इंजीनियर थे, को अपने विशेषज्ञ सलाहकार के तौर पर पंजाब से यहां लाये थे, तब उन्होंने ही यहां पावर हाउस की स्थापना की थी। जनरेटर के ज़रिये विद्युत उत्पादन की उक्त इकाई का निर्माणकार्य सन 1925 में पूरा हुआ था। तब वर्तमान के गांधी चौक के समीप स्थित शासकीय बालिका उच्च विद्यालय के निकट पावर हाउस से शहर को विद्युत आपूर्ति की जाती थी। अब भी यहां विद्युत विभाग का संभागीय कार्यालय मौज़ूद है।


विद्युत उत्पादन शुरू होने के बाद पहले चरण में राजप्रासाद एवं वहां से वर्तमान के मैटरनिटी वार्ड तक शहर के विभिन्न चौराहों पर लोहे के खम्बे खड़े कर बिजली के बल्ब लगाये गये, जो कि सांझ होते ही जनरेटर की गड़गड़ाहट के साथ इलाके को रौशन कर देते थे।

तत्पश्चात महाराजा के उद्यम एवं सरदार पाला सिंह के मार्गदर्शन में भवानीपटना शहर में विद्युतीकरण प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया एवं योजना का विस्तार करते हुये उसे शहर के बहादुर बगीचा पड़ा तथा मंदार बगीचा पड़ा आदि महत्वपूर्ण स्थानों पर भी स्ट्रीट लाइट्स लगायी गयीं। तब लोगों के लिये यह एक विशेष अनुभूति थी। भवानीपटना शहर में विद्युतीकरण, तब पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था।

इस बीच सन 1947 में यहां से दो मशीनें भुवनेश्वर में एक स्वतंत्र पावर हाउस तथा राजभवन परिसर में स्थापना हेतु भुवनेश्वर भी ले जाई गयीं।

लोगों का मानना है कि जब देश में आधुनिक ज्ञान-कौशल विकसित नहीं था, तब भी यहां बिजली का आना किसी के लिये भी गौरव की बात हो सकती है और इंजीनियर पाला सिंह का पंजाब से यहां आकर भवानीपटना वासियों की ज़िन्दगी में नई रौशनी भरना इतिहास के पन्नों में सदैव स्वर्णाक्षरों में लिपिबद्ध होकर रहेगा।

यहां एक अन्य प्रसंग भी सामने आता है कि -उन दिनों नेपाल नरेश द्वारा आयातित एक नई गाड़ी कलकत्ता बंदरगाह पहुंची थी, तब उसे कलकत्ता से नेपाल पहुंचाने नरेश द्वारा कालाहाण्डी महाराजा से सहायता मांगी गयी थी। तब इस काम के लिये महाराजा द्वारा पाला सिंह को कलकत्ता भेजा गया और उन्होंने सड़क मार्ग के ज़रिये गाड़ी को चला कर कलकत्ता से नेपाल पहुंचाया था। इस पर खुश होकर नेपाल नरेश द्वारा पाला सिंह को श्रेष्ठ चालक एवं श्रेष्ठ इंजीनियर के सम्मान से नवाज़ा गया था। इतना ही नहीं, पाला सिंह को उनकी उत्कृष्ट सेवाओं के लिये स्वयं कालाहाण्डी महाराजा द्वारा भी अनेक बार सम्मानित किया गया था।

यद्यपि, भवानीपटना शहर का वह निजी पावर हाउस अब इतिहास का एक अंग बन चुका है, फिर भी उसके पीछे का उद्यम, उस युग का तकनीकी ज्ञान-कौशल हमेशा के लिये स्मृतियों से जुड़ा रहेगा। अफ़सोस की बात तो यह है कि अतीत की यह यादगार धरोहर वर्तमान में एक अंधेरे कमरे के किसी कोने में पड़ी सिसकियां ले रही है और उसकी सुधि लेने वाला कोई नहीं है।



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