बागेश्वर। उत्तराखंड के बागेश्वर जिले की सुमटी गांव की रहने वाली प्रतिभावान क्रिकेटर प्रेमा रावत ने भारतीय टी-20 विश्व कप टीम में जगह बनाकर राज्य का नाम रोशन किया है। उनकी इस उपलब्धि को उत्तराखंड क्रिकेट के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है। टीम इंडिया की जर्सी पहनकर विश्व क्रिकेट के सबसे बड़े मंच पर उतरने जा रही प्रेमा की इस उपलब्धि ने पूरे उत्तराखंड को गौरवान्वित किया है। उनके चयन की खबर मिलते ही खेल जगत, क्रिकेट प्रेमियों और युवा खिलाडिय़ों में खुशी की लहर दौड़ गई है।
प्रेमा का भारतीय टीम में चयन उत्तराखंड क्रिकेट के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि माना जा रहा है। इन दिनों छुट्टियां मनाने गांव पहुंची प्रेमा की मां बसंती देवी और भाई विमल रावत ने ग्रामीणों के साथ खुशी को साझा किया। ग्राम प्रधान विमला देवी और ग्रामीणों ने प्रेमा के घर जाकर उनकी मां, भाई, दादी और बुआ को मिठाई खिलाकर खुशियां बांटी।
प्रेमा ने कक्षा दो तक की शिक्षा गांव के प्राथमिक स्कूल से हासिल की थी। इसके बाद उनका परिवार बरेली बस गया। भाइयों के साथ गली-मोहल्ले में क्रिकेट खेलने की शुरूआत के बाद प्रेमा ने बड़े मैदानों में अपने खेल को निखारा। उत्तराखंड की अंडर-19, अंडर-23, रणजी टीम और डब्ल्यूपीएल में अपनी छाप छोडऩे के बाद अब प्रेमा राष्ट्रीय टीम में शामिल होकर विश्व कप में फिरकी का दम दिखाने को तैयार हैं।
प्रेमा के पिता केदार सिंह रावत एयरफोर्स में कार्यरत हैं। इन दिनों वह असम में पोस्टेड हैं। उनकी मां बसंती देवी गृहिणी हैं। बड़े भाई हिमांशु रावत बेंगलुरु में नौकरी करते हैं जबकि छोटे भाई विमल पढ़ाई कर रहे हैं।
देश के साथ उत्तराखण्ड का नाम करेंगी रोशन
बीसीसीआई के पूर्व उपाध्यक्ष माहिम वर्मा, क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड (सीएयू) की सचिव किरण रौतेला वर्मा और सीएयू अध्यक्ष दीपक मेहरा ने प्रेमा को बधाई देते हुए इसे उत्तराखंड क्रिकेट के लिए ऐतिहासिक क्षण बताया है। सभी ने विश्वास जताया है कि प्रेमा विश्व कप में अपने प्रदर्शन से भारतीय टीम को मजबूती प्रदान करेंगी और देश के साथ-साथ उत्तराखंड का नाम भी रोशन करेंगी।
हॉकी से शुरू हुआ खेल का सफर
12 नवंबर 2001 को जन्मीं प्रेमा रावत की खेल यात्रा बेहद प्रेरणादायक रही है। प्रेमा ने अपने खेल करियर की शुरुआत क्रिकेट से नहीं बल्कि हॉकी से की थी। शुरुआती दिनों में वह एक समर्पित हॉकी खिलाड़ी थीं और राज्य स्तर पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुकी थीं। एक छोटे से गांव से आने वाली प्रेमा के लिए खेलों में आगे बढऩा आसान नहीं थाण् उनके क्षेत्र में हॉकी के लिए सीमित संसाधन और करियर के कम अवसर थे। ऐसे में परिवार विशेषकर उनके भाई ने उन्हें क्रिकेट की ओर बढऩे के लिए प्रेरित किया। बचपन से क्रिकेट को करीब से देखने वाली प्रेमा ने इस चुनौती को स्वीकार किया और जल्द ही अपनी मेहनत तथा प्रतिभा के दम पर क्रिकेट में पहचान बनानी शुरू कर दी।







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