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सुप्रसिद्ध लोक गायक दीवान कनवाल का निधन, संगीत जगत में शोक की लहर

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द्वि दिना का ड्यार शेरूवा यो दुनी में…

अल्मोड़ा। सुप्रसिद्ध लोक गायक दीवान कनवाल का आकस्मिक निधन की सूचना मिलते ही संगीत जगत और संगीतप्रेमियों में शोक की लहर छा गई। दीवान कनवाल उत्तराखण्ड की लोक संस्कृति के एक सच्चे सपूत थे। उनकी आवाज कुमाऊं की वादियों, पहाड़ों की पुकार, प्रेम की मिठास और विरह की पीड़ा को दर्शाने वाली थी। ‘त्यर पहाड़, म्यर पहाड़’, ‘द्वि दिना का ड्यार शेरूआ’, ‘हम पहाड़ का पंछी छां’ समेत कई सुपरहिट गीत गाकर लोगों का दिल जीतने वाले दीवान कनवाल भले ही हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनके गीत पहाड़ की वादियों में हमेशा गूंजते रहेंगे।

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मूल रूप से अल्मोड़ा खत्याड़ी गांव निवासी दीवान कनवाल का जन्म खत्याड़ी गांव में 5 फरवरी 1961 को हुआ था। दीवान कनवाल ने 1983 में एम. काम की परीक्षा पास की और आकाशवाणी नजीबाबाद से बी ग्रेड किया। कनवाल ने बी हाई ग्रेड आकाशवाणी अल्मोड़ा से लिया। उन्होंने हुडक़े में भी बी हाई ग्रेड किया। कुमाऊ की पहली फिल्म ‘मेघा आ’ में स्वर्गीय जीवन बिष्ट के निर्देशन में उन्हें गाना गाने का मौका मिला। यहीं से उनकी गायकी का सफर शुरू हुआ। साथ ही वे लेखन का कार्य भी करते रहे।

कई नाटकों और एलबम का किया निर्देशन

कनवाल जी की ठाट बाट, सुवा, पैलाग, हुडक़ी घमाघम, नंदा चालीसा, जय मय्या बाराही, सुफल हई जय पंचनाम देव गीतों की एलबम निकाली। उन्होंने मेघा आ, बलि वेदना, ऐ गे बहार, जय हिंद, आपण बिराण, जय गोलू देव समेत कई कुमाऊनी फिल्मों में पाश्र्व गायन किया। दीवान कनवाल ने कल बिष्ट, गंगनाथ, हरू हीत, सुरजू कुंवर जोत माला, अजुआ बफौल आदि नाटकों का निर्देशन भी किया।

पिता से मिली प्रेरणा, रामलीला में किया मंचन

पिता के गायन और अभिनय तथा अंचल की पारंपरिक लोकसंस्कृति के प्रति लगाव को देख, उससे प्रेरणा लेकर दीवान कनवाल ने रामलीला में बंदर और बाल्य अंगद का पात्र बन कर रंगमंच में कदम रखा था। रामलीला में पहला बड़ा किरदार महिला पात्र मंदोदरी और उसके बाद खर-दूषण तथा परशुराम की भूमिका में शानदार प्रदर्शन किया।

कनवाल के मधुर गायन में था गजब का सम्मोहन
अंचल के सुप्रसिद्ध लोकगीत गायक दीवान कनवाल के मधुर गायन में गजब का सम्मोहन था, जिसमें पहाड़ी अंचल के लोक की ठसक साफ तौर पर दिखाई देती है। पर्वतीय अंचल के गीत-संगीत से जुड़े रहे कुशल चितेरो के सुरों की मिठास मिसरी की तरह इस लोकगीत गायक के स्वरों में घुली रहती है जो गीत-संगीत की अलौकिक दुनिया में विचरण कर जनमानस को प्रभावित करती नजर आती है।

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