साहित्य

राखी

बहन तुम्हें तो याद है ना
दीदी आपको तो याद होगा ना
पिछली बार भी न मिले हम
इस बार तो मिलना होगा ना

साथ होते थे जब हम सब
गूंज उठता था सारा घर
हमारे ठहाकों से
हमारी वो बातें कभी खत्म ही न होती थी

इस वर्ष तो ऐसा होगा ना
बहन मिलना तो होगा ना

पिछली बार भी न बांधी राखी
मेरी कलाई पर
सिर्फ भेज दी थी
मेरे पते पर

किसी और बहन ने
हक अदा किया था
पिछली बार
क्या मिल भी पाएगा
फिर वो स्नेह
अबकी बार

इस वर्ष तो ऐसा होगा ना
दीदी मिलना तो होगा ना

उस बार जब दीदी आई थी
संग में मिठाई लाई थी
भाई संग स्नेह बांटने
सब चिंताएं छोड़ आई थी

इस वर्ष तो ऐसा होगा ना
बहन मिलना तो होगा ना

—हरीश, हरदा पहाड़ी

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