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GST के कड़े प्रावधानों के विरुध्द भारत बन्द एवं इस पर विशेषज्ञों का नज़रिया

By Suresh Agrawal, Kesinga, Odisha

यद्यपि, वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) प्रणाली को लागू हुये साढ़े तीन साल बीत चुके हैं, इसके प्रारंभिक प्रावधानों से लेकर समय-समय पर इसमें किये जाने वाले संशोधनों से व्यापारी समुदाय को हमेशा शिकायत बनी रहती है। जीएसटी प्रावधानों को युक्तिसंगत बनाने समय-समय पर व्यापार एवं उद्योग जगत से मांगें भी उठती रहती हैं और इसी परिप्रेक्ष्य में अखिल भारतीय व्यापारी महासंघ (सीएआईटी) द्वारा 26 फ़रवरी को भारत बन्द का आयोजन भी किया गया है। आइये जानते हैं कि जीएसटी के नये नियम अथवा प्रावधानों की क्या हैं पेचीदगियों, उन पर विभिन्न विशेषज्ञ क्या राय रखते हैं और नियमों को युक्तिसंगत बनाने सरकार से किन कदमों की प्रत्याशा की जाती है।


चेम्बर ऑफ कॉमर्स एण्ड इंडस्ट्रीज, केसिंगा के पूर्व अध्यक्ष सजन कुमार जैन जीएसटी खण्ड (एए) से सेक्शन 16 (2) का उल्लेख करते हुये कहते हैं कि -उक्त नियम के तहत विक्रेता का उत्तरदायित्व भी ख़रीददार पर थोपा गया है, क्योंकि यदि विक्रेता ख़रीददार से ली गयी जीएसटी अपने खाते में नहीं दर्शाता है, तो वह ज़िम्मेदारी भी ख़रीददार पर ही आयत होगी, जो कि किसी भी तरह व्यवहारिक नहीं है। जैन ने कहा कि -व्यापारी जीएसटी की मूल अवधारणा के विरुद्ध नहीं है, बल्कि वह तो इसमें जानबूझकर पैदा की गयी पेचीदगियों से त्रस्त है। उन्होंने कहा कि जीएसटी लागू होने के बाद से इसमें नौ सौ से भी अधिक संशोधन किये जा चुके हैं और जिनमें से कुछ एक संशोधनों को देख कर तो यही लगता है कि जीएसटी परिषद जानकार नहीं, अपितु महज़ साधारण ज्ञान से रहित साक्षर लोगों का एक समूह बन कर रह गया है।

जीएसटी प्रावधानों पर सबसे ओजपूर्ण प्रतिक्रिया व्यावसायिक समस्याओं से गहन सरोकार रखने वाले कालाहाण्डी मर्चेंट्स एसोसिएशन अध्यक्ष बिजय कुमार साहू की रही, जिन्होंने सबसे पहले अपने अधिकारों की लड़ाई में पिछड़ने के लिये देश के सम्पूर्ण व्यापारी समुदाय ही को ज़िम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि जब जीएसटी व्यवस्था शुरू ही से त्रुटिपूर्ण है, तो उसका विरोध भी निरन्तर होना चाहिये था। व्यापारी औरों के हितों के लिये तो सदैव लड़ता है, परन्तु अपने लिये नहीं लड़ता और पिछड़ जाता है। उन्होंने जीएसटी की सबसे बड़ी ख़ामी तो इसी बात को बतलाया कि -एकल टैक्स सिस्टम में हज़ारों वस्तुओं पर आज भी भिन्न-भिन्न टैक्स लिया जाता है। सरकार राजस्व प्राप्ति के अपने सबसे बड़े स्रोत को सरल बनाने के बजाय, उसमें नित नये अड़ंगे डाल रही है। व्यापारी जीएसटी के ज़रिये देश की शासन व्यवस्था चलाने में ही सरकार की मदद नहीं करता, बल्कि इससे सरकारी क्षेत्र के मुक़ाबले लोगों को रोज़गार के अधिक अवसर भी प्रदान करता है। जहाँ व्यापारी स्वयं पूंजीनिवेश कर सरकार को राजस्व एवं लोगों को रोज़गार मुहैया कराता है, वहीं बदले में उसे शाबासी के बजाय प्रताड़ता झेलनी पड़ती है। साहू ने ऑनलाइन व्यापार को पारम्परिक व्यापार के लिये सबसे बड़ी चुनौती बतलाते हुये कहा कि -इसमें जीएसटी नियमों का कोई पालन नहीं किया जाता और यह सरकार के नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है। सरकार बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बढ़ावा देते समय यह भी भूल जाती है कि भारत में इंग्लैण्ड अथवा अमेरिका जैसे संसाधन अथवा मूलभूत सुविधाएं अभी उपलब्ध नहीं हैं।अतः सरकारों को विदेश की तर्ज़ पर नहीं, अपने देश की ज़रूरतों के अनुसार नियम बनाने चाहिये।

कराधान विशेषज्ञ चार्टर्ड एकाउन्टेंट दीपक गुप्ता ने जीएसटी एक्ट को बढ़िया बतलाया, ख़ास कर छोटे व्यापारियों को सालाना चालीस लाख तक के टर्नओवर की छूट दिये जाने को उन्होंने बड़ी राहत करार दिया। हालांकि, व्यापारियों पर पड़ने वाले एकतरफा बोझ की बात को उन्होंने भी माना और कहा कि -क्योंकि पूरा डैटा व्यापारी ही को अपलोड़ करना होता है, अतः यह सेल्फ़ एसेसमेंट जैसा हो गया है। यदि सरकार कंप्लायंस वाले काम में कुछ राहत दें, तो व्यापारियों का काम आसान हो सकता है। उन्होंने कहा कि ज़्यादातर व्यापारी जीएसटी प्रावधानों से खुश हैं।

महाविद्यालय में अर्थशास्त्र के व्याख्याता सीमांचल मिश्र भी मानते हैं कि जीएसटी की व्यवस्थाएं आज भी अस्पष्ट बनी हुई हैं और कहने को इसमें चार स्लैब बने हैं, परन्तु कहीं भी पारदर्शिता नहीं है। टैक्स चाहे सेल्स टैक्स, वैट अथवा जीएसटी किसी भी रूप में क्यों न लिया जाये, उसका रेशनल होना बहुत ज़रूरी है। जीएसटी के नये प्रावधानों में कागज़ी कार्रवाई बढ़ी है और व्यवस्था इतनी जटिल हो गयी है कि व्यापारी को कम्प्यूटर में दक्ष होना आवश्यक है, अन्यथा उसे अलग से व्यवस्था करनी होगी। अतः इसका सरलीकरण अत्यावश्यक है। अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमतें कम होने के बावज़ूद भारत में डीज़ल, पेट्रोल महंगा होने की बात पर मिश्र कहते हैं कि इसे केसकेडिंग इफैक्ट कहते हैं, क्योंकि क़ीमतें कम होने के बावज़ूद उस पर टैक्स बढ़ा दिया जाता है। वैसे भी जीएसटी केवल एक नहीं, केंद्रीय तथा प्रादेशिक दोनों सरकारों द्वारा समान रूप से लिया जाता है।

कराधान में गहरी पैठ रखने वाले तथा महाविद्यालय के पूर्व प्राचार्य अशोक मिश्र भी -जीएसटी पर व्यापारियों के रुख का समर्थन करते हैं। उनका कहना है कि जब तक देश में पूरी तरह डिज़िलीलकरण नहीं हो जाता, जीएसटी के वर्तमान प्रावधानों पर ठीक से अमल करना आम व्यापारी के बूते से बाहर की बात है। व्यापारी वर्तमान में एक द्वंद्व में फंस कर रह गया है। सरकार को चाहिये कि व्यवस्था में नये परिवर्तन लाने से पूर्व उसकी पूरी जानकारी आम आदमी को प्रदान करे।

वहीं जीएसटी के नये प्रावधानों पर दृष्टिपात करते हुये चेम्बर ऑफ़ कॉमर्स एण्ड इंडस्ट्रीज, केसिंगा अध्यक्ष अनिल कुमार जैन कहते हैं कि -जिस व्यवस्था में अब तक 984 बार संशोधन हो चुका हो, उसका व्यावहारिक पक्ष स्वतः समझ में आ जाता है। उन्होंने कहा -सरकार अकसर क़ानून लागू करने के पश्चात उसकी समीक्षा करती है, जब कि उनका मूल्यांकन लागू करने से पहले होना चाहिये। जीएसटी प्रावधान इतने पेचीदा हैं कि आम आदमी तो क्या, स्वयं उन्हें बनाने वालों के लिये भी समझना नामुमकिन है। रिटर्न का प्रारूप ऐसा होना चाहिये कि आम आदमी को भी आसानी से समझ में आ जाये, परन्तु वह इतना जटिल है कि शायद देश के वित्त-मंत्री के लिये भी भरना मुश्किल हो। फिर फ़ॉर्म 2-ए, 2-बी को 3-बी से मैच कराने की अनिवार्यता तो व्यापारी के लिये सबसे घातक है, क्योंकि इसके मैच न करने पर उसका पंजीयन रद्द हो सकता है। इसी प्रकार नियम 36 (4) की व्यवस्था भी परस्पर विरोधी एवं जटिल है। अतः सरकार को चाहिये कि नियमों का सरलीकरण करें।



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