प्रताप सिंह नेगी
पहाड़ी फलों की बात हो और काफल का जिक्र न हो, यह हो ही नहीं सकता। खट्टे-मीठे स्वाद का अनुभव कराने वाला पहाड़ का यह रसीला फल बड़ा स्वादिष्ट होता है। जो भी एक बार इस फल को खा ले, फिर उसका दीवाना हो जाता है। उत्तराखण्ड के ऊंंची पहाड़ी इलाकों में पाया जाने वाला यह फल चैत्र मास से ज्येष्ठ मास के बीच उत्तराखण्ड के जंगलों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। काफल उत्तराखंड समेत पहाड़ी राज्योंं-देशों में पाया जाता है। यह हिमाचल प्रदेश, नेपाल, भूटान के पहाड़ो में देखा जा सकता है।
काफल पर एक सुप्रसिद्ध गाना भी बना है, जो देश-विदेश में भी काफी प्रचलित रहा है- ‘बेडू पाको बारा मासा नारयणी काफल पाको चैता मेरी छैला।’ आप अगर इस समय में उत्तराखंड जाएंगे तो आपको सडक़ों के किनारे इसके पेड़ देखने को मिल जाएंगे और सडक़ों के किनारे काफल बेचते बच्चे भी आपको दिखाई देेंगे।
काफल में भरपूर मात्रा में बिटामिन एवं पोषक तत्व पाये जाते हैं। इससे इसकी खूबी और बढ़ जाती है। काफल में बिटामिन सी, बिटामिन ए, पोटेशियम, आयरन, कैलिशियम, कोलेस्टांल, एंटीआक्सीडेंट, मिनिरल एवं खनिज तत्वों का भंडार पाया जाता है। काफल के पेड़ की छाल और बीज भी औषधीय गुणों से युक्त होते हैं जो कई बीमारियों की रोकथाम करते हैं। पर्यटन सीजन में काफल गरीबों के रोजगार का साधन भी बनता है। स्थानीय लोग जंगल से काफल तोडक़र लाते हैं और बाजार और पर्यटक स्थलों पर ले जाकर काफल बेचकर अपनी आजीविका भी चलाते हैं। इस तरह काफल लोगों की आमदनी का यह नया श्रोत भी बन गया है।

क्या है काफल की कहानी
काफल को लेकर पहाड़ों में एक कहावत भी है कि उत्तराखंड के एक गांव में एक गरीब महिला और उसकी बेटी रहती थी। उस महिला के पास आजीविका के लिए थोड़ी.सी ज़मीन के अलावा कुछ भी नहीं था। एक बार वह महिला सुबह ही जंगल जाकर एक टोकरी भरकर काफल तोड़ लाई। उसके बाद उसने अपनी बेटी को नींद से जगाया और कहा कि धूप आने लगी है, मैं खेत से गेहूं काट कर आती हूँ, तब तक सिलबट्टे में नमक पीसकर तैयार रखना। फिर हम दोनों साथ मिलकर काफल खाएँगे। सुनकर, उसकी बेटी उसे कहती है. माँ कल रात से कुछ भी नहीं खाया है। मुझे बहुत तेज़ भूख लग रही है। कुछ काफल मुझे खाना है। लेकिन उसकी माँ उसे मना करके, गेहूं काटने खेत में चली जाती है। माँ की बात मानकर बच्ची दोपहर तक इंतज़ार करती है। इस दौरान भूख के कारण कई बार उन रसीले काफलों को देखकर बच्ची के मन में लालच आया। पर माँ की बात मानकर वह खुद पर काबू कर बैठी रही। दोपहर काफ़ी देर बाद जब उसकी माँ घर आई तो उसने देखा कि टोकरी में काफल कम हैं। सुबह से ही काम पर लगी माँ को ये देखकर बहुत गुस्सा आता है। वह अपनी बेटी से कहती है. मेरे मना करने के बाद भी तूने इसे क्यूँ खाया। इस पर उसकी बेटी उसे कहती है कि मैं अपने मरे हुए पिता की कसम खाती हूँ, मैंने इसमें से एक भी काफल चखा तक नहीं। इस बीच माँ गुस्से में अपनी बच्ची को ज़ोर से धक्का देती है और बेटी बेसुध होकर नीचे गिर जाती है। तभी उसकी माँ उसे काफ़ी देर तक हिलाती है लेकिन तब तक उसकी बेटी की मौत हो चुकी थी।
बेटी की मौत पर मॉ वहीं बैठकर रोती है। इधर शाम होते-होते काफल की टोकरी फिर से पूरी भर जाती है। जब उस महिला की नजर टोकरी पर पड़ी तो उसे समझ में आता है कि दिन की तेज धूप और गर्मी के कारण काफल मुरझा गए और शाम को ठंडी हवा लगते ही वह फिर ताजे हो गए। अब मां को अपनी गलती पर बेहद पछतावा होता है और सदमे से उसकी भी मृत्यु हो जाती है। कहावत है कि दोनों मॉ-बेटी बाद में पक्षी बन जाते हैं। जो आज भी काफल पकने के सीजन में आवाज लगाते सुनाई देते हैं। जिसमें बेटी कहती हैै- ‘काफल पाको’ मीन नी चाखो’। दूसरी चिडिय़ा बोलती है- ‘पता च बेटी पता च।’ इस कहानी का कोई प्रमाण तो नहीं है, लेकिन इस तरह की पक्षियों की आवाज जंगलों में काफल के सीजन में सुनाई पड़ती है।







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