साहित्य

भाभी और ननद के बीच आई सोने की चेन …

कहानी रिश्तों की पहचान: 

By Hema Kabdal, Delhi 

विमला शादी के बाद मुंबई में अपने पति के साथ रहती थी । उसके साथ उसके सास, ससुर, ननद और दो छोटे बच्चे भी रहते थे। विमला अक्सर घर के कामों में व्यस्त रहती थी और उसके पति ऑफिस के कामों में । सारे घर के लोग विमला से बहुत प्यार करते थे और सारे कामों के लिए विमला पर ही निर्भर रहते थे। आखिर रहे भी क्यों ना उसका स्वभाव जो इतना अच्छा था।
विमला का मायका इलाहाबाद में था। वहाँ पर उसके इकलौते भैया और भाभी रहते थे। मां-बाप बहुत पहले ही स्वर्ग सिधार चुके थे। विमला को मायके नहीं गए हुए काफी समय बीत चुका था। इस बार उसने सोचा था कि वह रक्षाबंधन में मायके जाएगी। यह बात जब उसने घर में बताई तो घर के लोग काफी खुश हुए। सोचा कि चलो विमला को कुछ समय के लिए आराम मिल जाएगा । उसके ससुर ने उसकी ट्रेन की टिकट बुक करा दी थी। पूरी रात ट्रेन में सफर कर के दूसरे दिन विमला इलाहाबाद पहुंची फिर गांव वाली बस में बैठकर गांव पहुँची। गाँव के बस स्टाप से कुछ ही दूर पैदल चलकर उसके भैया भाभी का घर था। अपने मायके के पुराने दिनों को याद करते करते उसका सफर कब कट गया उसको पता ही नहीं चला।

विमला घर में भैया भाभी और बच्चों से मिलकर बहुत खुश हुई । भाई बोला “अरे विमला फोन कर देती तो मैं बस स्टॉप पर लेने आ जाता । इतनी दूर से अकेले ही बैग ढो के ला रही हो” । भाभी भी कहने लगी ” हां आने की खबर दे देती तो कम से कम बच्चों को ही बस स्टॉप तक भेज देती” ।
विमला को भाई के घर में काफी कुछ बदला बदला नजर आ रहा था। जहां पहले हैंडपंप हुआ करता था अब पानी का नल लगा हुआ था। पास ही एक नई मोटर साइकिल भी खड़ी थी। घर के अंदर भी काफी कुछ बदल गया था। जहां पहले सिर्फ एक रेडियो हुआ करता था अब नया टीवी लगा हुआ था। इस के अलावा, फोन , फ्रिज, वॉशिंग मशीन आदि सारे सामान, जो एक मध्यम वर्गीय परिवार में होते हैं, मौजूद थे। भाई के ठाठ -बाट देखकर विमला को बहुत खुशी हुई। आखिर वह अपनी खुशी को छिपा नहीं पाई और अपने भाई से पूछ ही लिया “भैया यह सारा नया -नया सामान कब लिया ? इस सब सामान की वजह से आपका घर बहुत बहुत सुंदर और सजा – धजा लग रहा है” । विमला की उत्सुकता को शांत करते हुए भाई बोला “विमला अब गांव वालों की हालत पहले जैसी नहीं रही है। अब जब से गाँव में नहर आई है खेती भी पहले से…..” इतना सुनते ही भाभी ने बीच में ही टोक दिया ” देखना जी, बच्चे अभी तक स्कूल से नहीं आए। बहुत लेट हो गई है। जरा बस स्टॉप तक जाकर तो देखो” ।

भाई जैसे ही घर से बाहर निकला भाभी ने कहना शुरू कर दिया- ” अरे तुम्हारे भैया भी ऐसे ही कहते हैं ।खेती-वेती अब कुछ नहीं होती। जितना लागत लगाओ उतना भी वसूल नहीं होता और जो बचा रह गया वह जंगली जानवरों के पेट में चला जाता है। यह सारा सामान तो तुम्हारे भैया ने बैंक से लोन लेकर के लिया है”।

“बहुत अच्छा किया भाभी आज के समय में इस सब सामान की भी जरूरत है। भगवान ने चाहा तो अगली फसल तक सारा कर्ज भी उतर जाएगा” विमला ने भाभी को दिलासा देते हुए कहा।
विमला के आने पर भाभी खुश नहीं थी। वह मन ही मन सोच रही थी कि अब एक और मेहमान की सेवा  करनी पड़ेगी और विदाई के वक्त जो लत्ता- कपड़ा, रुपया -पैसा देना पड़ेगा वह अलग। यह सोचते सोचते उसके सिर में दर्द हो गया। अब विमला को ही पूरे घर का खाना बनाना पड़ा। फिर बर्तनों की सफाई की । उसके बाद भाभी का सिर दबाने बैठ गई। सिर दबाते दबाते पता नहीं कब उसकी आँख लग गई उसे पता ही नहीं चला। जब सोई तो सवेरे भाभी के चिल्लाने की आवाज पर ही नींद खुली ” अरे इस घर के मेहमान तो मेहमान थे पर घर के लोग तो और भी बड़े मेहमान हो गए हैं। मैं ही अकेले कितना काम करूं। सिर दर्द से फटा जा रहा है। इनको यह भी नहीं सुझता कि कम से कम कुछ दवा ला दें। हे भगवान मुझे उठा ले आप किसी को मेरी जरूरत नहीं है यहाँ” । विमला यह सुनते ही हड़बड़ाते हुए उठी और भाभी से बोली- ” ” भाभी परेशान मत होओ। घर का सारा काम मैं कर लूंगी। आप आराम करो” ।

इस प्रकार विमला रोज सवेरे भाभी के बताए कामों में जुट जाती। देखते-देखते एक हफ्ता बीत गया। एक दिन विमला घर में झाड़ू लगा रही थी। सहसा भाई के कमरे से भाई और भाभी के लड़ने की आवाज आई। भाभी कह रही थी ” देखो जी, तुम्हारी बहन को य़हाँ डेरा डाले हफ्ता भर हो गया है। रक्षाबंधन का त्यौहार भी निकल गया। अब तो इसे वापस भेजने की सोचो। कब तक यहां बैठे-बैठे मुफ्त की रोटियां तोड़ती रहेगी। भाई समझाते हुए कह रहे थे “अरे भाग्यवान वह मेरी इकलौती बहन है। उसे भी तो आखिर मायके में रहने का हक है। चले जाएगी बेचारी। तुम नाहक परेशान होते हो”। इस पर भाभी गुस्से में बोली “हां मैंने तो घर में धर्मशाला खोला है मुफ्ती की रोटियां खिलाओ, सेवा करो और ऊपर से विदाई के वक्त लत्ता-कपड़ा और रुपया पैसा भी दो। हाँ, कल शाम को तुम क्या कह रहे थे कि इस बार विदाई में बहन को कोई सोने का जेवर दूंगा रक्षाबंधन के दिन तो नहीं दे पाया। यहां मैं पुरानी साड़ियां घिस-घिस के काम चला रही हूं और तुम्हें बहन को जेवर देने की सूझी है”। भाई कुछ नहीं बोला और चुपचाप कमरे से बाहर चला गया। यह सुनकर विमला को काफी दुख हुआ और वह मन ही मन सोचने लगी कि अगर आज उसके मां-बाप जीवित होते तो उसे घर में ऐसा बोझ नहीं समझा जाता। उसके वापस जाने का टिकट अभी तक बुक नहीं हुआ था। उसने अपने पति को फोन करके कहा कि उसे बच्चों की बहुत याद आ रही है । वह तुरंत परसों का टिकट बुक करा दें। यदि ना मिले तो तत्काल में ले लें। लेकिन वापस जाने की यह बात उसने अपने भाई और भाभी को नहीं बताई।

शाम को भाई और भाभी को गांव के किसी के जन्मदिन के निमंत्रण पर जाना था। भाभी तैयार होने के लिए अपने कमरे में गई और थोड़ी देर में चिल्लाते हुए बाहर आई “हाय मैं लुट गई। मेरी सोने की चेन न जाने कहां गायब हो गई। कल रात को सोते वक्त उतार के सिरहाने के पास ही तो रखी थी। सवेरे उठकर देखती हूं तो गायब है। न जाने किस ने चुरा ली”। विमला सांत्वना देते हुए बोली “गुम कहां होगी भाभी। यहीं कहीं इधर-उधर हो गई होगी। ढूंढोगे तो मिल जाएगी” भाई तैयार होकर भाभी का बेचैनी से इंतजार कर रहा था। जब बहुत देर तक भाभी बाहर नहीं आई तो बोला “अरे जल्दी करो भाई और कितना टाइम लगेगा । देर हो रही है। जब पार्टी खत्म हो जाएगी तब चलोगी क्या? ” अंदर से भाभी की गुस्से में आवाज आई ” तुम चलो मैं नहीं आऊंगी। मेरा सर दर्द से फटा जा रहा है”। भाई भी अकेले पार्टी में नहीं गया। जब रात के खाने के लिए बुलाया गया तो भी भाभी बाहर नहीं आई। आखिर हार कर भाई ही भाभी के कमरे में गया और पूछा ” आखिर तुम खाना खाने क्यों नहीं आई” ? भाभी अभी भी गुस्से में थी बोली ” मेरी इतनी महंगी दो तोले की चेन किसी ने चुरा ली है और तुम्हें खाने की पड़ी है। जब तक चोर नहीं पकड़ा जाएगा और मेरी चेन नहीं मिलेगी, मैं खाना नहीं खाऊंगी” । थक हार कर भाई बोला “ठीक है अगर यह चेन नहीं मिली तो मैं तुम्हारे लिए नहीं चैन बनवा दूंगा। अब तो खाना खाने चलो” इस पर भाभी बोली ” ठीक है अगर तुम जुबान देते हो तो मैं खाती हूं। पर ध्यान रहे, अगर अपनी बात से मुकरे तो मैं यूं ही भूखे प्यासे अपनी जान दे दूंगी “।

विमला को यहां रहना अब एक-एक पल भारी पड़ रहा था अब तक विमला का वापसी का टिकट भी हो चुका था उसे दूसरे दिन सवेरे की ट्रेन से मुंबई के लिए रवाना होना था। विमला सवेरे ही जाने के लिए तैयार होकर आंगन में आ गई । तब तक भाई और भाभी भी उसे विदा करने के लिए बाहर आ चुके थे नम आंखों से विमला को विदा करते हुए भाई बोला “बहन इस बार रक्षाबंधन को सोचा था कि कोई बड़ा उपहार दूंगा पर उस दिन नहीं हो पाया। फिर सोचा था कि विदाई के वक्त ही सही, कोई सोने का आभूषण दे दूंगा। पर मेरा दुर्भाग्य देखो , ठीक अभी तुम्हारी भाभी की सोने की चेन ही खो गई। जब अगले रक्षाबंधन को आओगी तो कुछ ना कुछ आभूषण तुम्हारे लिए जरूर बनाकर रखूंगा ” । फिर एक सौ रूपये का नोट निकालकर बहन के हाथ में रख दिया।

विमला उन दिनों को याद में खो गई जब उसके मां-बाप जीवित थे और आंखों से आंसू पूछते हुए धीरे-धीरे बस स्टॉप की तरफ चल पड़ी। बस पकड़कर सीधे रेलवे स्टेशन गई और वहां से ट्रेन पकड़ कर मुंबई पहुंच गई। मुंबई स्टेशन पर विमला को लेने के लिए उसके ससुर जी आए थे। घर पहुंचकर सास ने पूछा “बेटी तुम्हारे मायके में सब राजी खुशी हैं ना ? फोन करके अपने भैया -भाभी को अपने सकुशल पहुंचने की सूचना दे दो” विमला ने बस इतना सा जवाब दिया ” सब ठीक हैं” अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के बारे में उसने घर पर किसी से कोई चर्चा नहीं की।
एक दिन शाम के समय विमला खाना बना रही थी। अचानक दरवाजे की घंटी बजी और वह दरवाजे खोलने गई तो क्या देखती है कि उसके भैया -भाभी दोनों सामने खड़े हैं । थोड़ी देर तक वह अवाक होकर देखते रही और फिर बोली ” भैया- भाभी आप लोग यों अचानक… खबर कर दी होती तो कोई स्टेशन पर लेने आ जाता” भैया और भाभी का चेहरा देखने में उदास लग रहा था। भाई ने दुखी मन से कहा “क्या बताऊं अभी तुम्हारी भाभी की बीमारी की वजह से अचानक ही आना पड़ा पिछले दो महीने से यह बीमार चल रही है। इलाहाबाद के बड़े-बड़े डॉक्टरों को दिखाया पर कोई फायदा नहीं हुआ। उनका कहना है कि इस बीमारी के टेस्ट और इलाज की सुविधा यहां नहीं है। इसे दिल्ली या मुंबई किसी बड़े शहर में ले जाना पड़ेगा”। भाभी का चेहरा एकदम पीला पड़ गया था और वह सुख कर कांटा हो गई थी। भाभी की यह दशा देखकर विमला की आँखें भर आई और बोली “भाभी अब आप यहां बड़े शहर में आ गई हो। यहां पर आपका इलाज हो जाएगा और आप जल्दी ठीक हो जाएंगे। चिंता ना करें”।

दूसरे ही दिन विमला अपनी भाभी को दिखाने के लिए एक बड़े अस्पताल में ले गई । डॉक्टरों ने भाभी को चेक करके कई दवाएं और टेस्ट लिखे। अस्पताल के कई चक्कर लगाने पड़े। आखिरकार ऑपरेशन की तारीख मिल गई। ऑपरेशन के बाद पन्द्रह दिनों तक भाभी अस्पताल में भर्ती रही। इस बीच पूरे समय विमला उनके साथ ही रही क्योंकि महिला वार्ड में पुरुषों को आने की अनुमति नहीं थी । सोलहवें दिन अस्पताल से डिस्चार्ज करा कर विमला उसे अपने घर ले आई और पूरे एक महीने तक खूब सेवा की- समय पर दवा देना, नाश्ता, खाना, नहलाना धुलाना । अब भाभी पूर्ण रूप से स्वस्थ हो चुकी थी।
“अब हमें वापस चलना चाहिए। बच्चे भी घर में अकेले पड़ोसियों के सहारे छोड़े हुए हैं। हमारी कल की टिकट हो चुकी है ।कल शाम की ट्रेन से हम लोग वापस घर चले जाएंगे” रात को खाना खा चुकने के बाद भाई ने सबके सामने यह बात बताई । विमला बोली “पहली बार आप लोगों के साथ इतने समय तक रहने का मौका। मिला कुछ दिन और रुक जाते तो अच्छा रहता ” ।


दूसरे दिन सवेरे ही भैया भाभी तैयार होकर चलने का इंतजार करने लगे। उन को विदा करने के लिए सारे घर के लोग आंगन में इकट्ठा हो गए थे। भाभी आज बहुत सुंदर लग रही थी। गले में पड़ी सोने की चेन उनकी सुंदरता को और भी चार चांद लगा रही थी। गले में सोने की चेन देखकर सहसा विमला के मुंह से निकल पड़ा “भाभी क्या गुम हुई चेन मिल गई या भैया ने फिर नई बना कर दी है। बहुत सुंदर लग रही है” । यह यह सुनते ही भाभी अपने को नहीं रोक पाई और सिसकते हुए बोली “विमला मुझे माफ कर देना। असल में मेरी कोई चेन नहीं खोई हुई थी। वह तो मैंने ऐसे ही नाटक किया था ताकि तुम्हारे भैया तुमको विदाई के वक्त सोने की चेन ना दे दें क्योंकि उन्होंने मुझे बताया था कि उन्होंने ऐसा मन बनाया है । मैंने सोचा कि अगर मैं अपनी चेन खोने का बहाना बना दूँ और नई चेन बनाने के लिए जुबान ले लूं तो वह तुम्हें चेन नहीं दे पाएंगे।

मैंने तुम्हारे साथ बहुत दुर्व्यवहार किया और बदले में तुमने मेरे साथ इतना बड़ा उपकार किया। मुझे नई जिंदगी दी। आज अगर मैं अपने पैरों पर खड़ी हूं तो सिर्फ आप लोगों की बदौलत” । यह कहते हुए रोते रोते भाभी ने अपने गले की चेन निकालकर विमला के गले में डाल दी और बोली “विमला इसमें असल हक तुम्हारा ही है” विमला ने चेन वापस भाभी को दे दी और बोली “भाभी भगवान का दिया हुआ मेरे पास सब कुछ है। मेरे ससुराल में मेरे लिए कोई कमी नहीं है। बस कमी थी तो आप लोगों की प्यार की। वही प्यार पाने के लिए मैं मायके आई थी। मुझे किसी उपहार की जरूरत नहीं है। मां-बाप तो अब रहे नहीं वह प्यार भी आप लोगों से पाने की उम्मीद की थी। वह प्यार मुझे मिल जाए बस और कुछ नहीं चाहिए”। भाभी विमला से चिपट कर काफी देर तक रोती रही। भैया की भी आँखें भर आई । फिर धीरे-धीरे वे लोग स्टेशन की तरफ चल पड़े । विमला सजल नेत्रों से देर तक उनको निहारती रही और तब तक अपनी दृष्टि हटाई नहीं जब तक कि वह नजरों से ओझल नहीं हो गए।

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