रुद्रपुर। उत्तराखण्ड आशा हेल्थ वर्कर्स यूनियन ने आशाओं को राज्य कर्मचारी का दर्जा देने, न्यूनतम वेतन लागू करने, आशाओं के शोषण पर रोक लगाने सहित कई मांगो पर गल्ला मंडी में धरना-प्रदर्शन किया और सीएमओ के माध्यम से मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजा है।
गल्ला मंडी पर हुई सभा को संबोधित करते हुए यूनियन की प्रदेश उपाध्यक्ष रीता कश्यप ने कहा कि भाजपा सरकार को राज्य में 10 साल पूरे हो चुके हैं। धामी जी भी मुख्यमंत्री का कार्यकाल पूरा कर चुके है। इस दौरान कई बार सरकार के समक्ष आशा वर्कर्स ने अपनी समस्याओं को रखा। लेकिन सरकार आशाओं को बंधुआ मजदूर समझती है। स्वास्थ्य विभाग का हर काम आशाओं के मत्थे मढ़ दिया जाता है। लेकिन मेहनताने के नाम पर उन्हें मात्र 3300 रुपये प्रोत्साहन के तौर पर दिया जाता है जो कि न्यूनतम वेतन से बेहद कम है। हमारी मांग है कि सरकार हमें राज्य कर्मचारी का दर्जा दे और न्यूनतम वेतन लागू करे।
यूनियन की जिलाध्यक्ष ममता पानू ने कहा कि 2021 में हड़ताल के बाद मुख्यमंत्री हमसे वार्ता करने को राजी हुए और उन्होंने 11500 रुपए मानदेय करने का वादा किया था। लेकिन 5 साल बाद भी उनका वादा पूरा नहीं हुआ। अब आशा काार्यकर्ताओं के पास आंदोलन के सिवा और कोई दूसरा रास्ता नहीं है। उन्होंने कहा कि सरकार अखबारों में आशाओं के लिए बड़ी बड़ी घोषणाएं करके जनता में भ्रम फैलाने का काम करती है। सरकार ने आशाओं को मुफ्त का मजदूर समझ लिया है। उनके लिए न तो पेंशन है ना ही बीमा। कई आशाएं काम में रहते हुए अपनी जान गंवा देती है। आशाओं को गर्भवती की सेवा दिन रात अपनी जान जोखिम में डालकर करनी होती है। लेकिन उनके लिए ना तो सरकार के पास पैसा है ना ही सम्मान।
ऐक्टू की जिला सचिव व यूनियन की उपसचिव अनिता अन्ना ने कहा कि भाजपा सरकार के रवैया मजदूर विरोधी है। वह मजदूरों के खिलाफ कानून बना रही है। आशाएं जो कि सरकारी विभाग में ही कार्यरत हैए सरकार उनका खुलेआम शोषण कर रही है। हमें इस शोषण के खिलाफ आवाज उठानी ही होगी। 22 नवंबर 2026 को विशाल रैली को कामयाब बनाते हुए आशाओं को अपने हक की आवाज बुलंद करते हुए देहरादून कूच करेंगी।







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