कलश कलाश्री की ओर से किया गया आयोजन
नई दिल्ली। कलश कलाश्री की ओर से नई दिल्ली के मंडी हाउस स्थित एलटीजी सभागार में दिव्यांगों के सहायतार्थ नाटक ‘घूघूती और कौव’ का कुमाऊंनी में शानदार मंचन किया गया। उत्तराखण्ड के कुमाऊं मंडल में मकर संक्रात्रि के दिन मनाए जाने वाले लोकपर्व उत्तरायणी जिसे ‘घूघूतिया’ के नाम से भी जाना जाता है पर आधारित इस नाटक की परिकल्पना व आलेख कलश कलाश्री के अध्यक्ष व वरिष्ठ रंगकर्मी के.एन.पाण्डेय ‘खिमदा’, निर्देशन अखिलेश भट्ट और संगीत निर्देशन मनीष कुमार द्वारा किया गया था। लोककथा पर आधारित और कुली बेगार प्रथा के विरोध को प्रदर्शित करने वाले इस नाटक को सभागार में मौजूद दर्शकों ने बहुत पसंद किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ सभागार में मौजूद विशिष्ठजनों की ओर से दीप प्रज्जवलित कर किया गया। इस अवसर पर ‘कलश स्मारिका- 2026’ का लोकार्पण किया गया साथ ही साहित्य, संस्कृति, समाजसेवा, रंगमंच व पत्रिकारिता के क्षेत्र मेेंं उत्कृष्ट कार्य करने वाले लोगों को ‘कलश कलाश्री सम्मान-2006’ से सम्मानित किया गया। साहित्य के क्षेत्र में डॉ. हयात सिंह रावत, मीडिया क्षेत्र में सुनील नेगी, समाज सेवा के लिए पूरन भट्ट, रंगमंच में गीता नेगी और संस्कृति के क्षेत्र में नेहा आगरी को प्रतीक चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया गया।

लोककथा पर आधारित नाटक ‘घूघूती और कौव’ में बताया गया कि उत्तरायणी के इस लोकपर्व को ‘घूघूतिया’ त्यौहार क्यों कहते हैं। लोककथा के अनुसार चंद वंश के शासक कल्याण सिंह के राजपाठ को दर्शाया गया। राजा कल्याण सिंह की कोई संतान नहीं थी। इस पर उसका महामंत्री बड़ा खुश था, उसे लगता था कि राजा की मृत्यु के बाद वही राजा बनेगा। लेकिन कुछ समय बाद ही भगवान बागनाथ की कृपा से राजा को पुत्र रत्ïन की प्राप्ति हो जाती है। इससे आक्रोशित महामंत्री ने राजा बनने के ख्वाब में बालक को मारने की साजिश रच डाली। रानी अपने बेटे को प्यार से ‘घूघूती’ नाम से पुकारा करती थी। ‘घूघूती’ की कौवों से घनिष्ठ दोस्ती थी। जब महामंत्री ने ‘घूघूती’ को मारने की साजिश रची तो घूघूती के दोस्त कौवों ने उसकी जान बचा ली और महामंत्री की साजिश का पर्दाफाश हो गया। घूघूती को बचाने के लिए राजा-रानी और प्रजा ने कौवों के लिए पकवान बनाए जिन्हें बच्चों द्वारा कौवों को प्यार से बुलाकर खिलाया गया। इस कारण आज भी यह त्यौहार कुमाऊं मंडल में घूघूती त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। वहीं उत्तरायणी पर्व के दिन ही 14 जनवरी सन 1921 को पंडित बद्रीदत्त पाण्डे, हरगोविन्द पंत और चिरंजीलाल साह की अगुवाई में हजारों लोगों ने भगवान बागनाथ की शपथ लेकर कुली बेगार को कभी नहीं मानने की शपथ ली और कुली बेगार के रजिस्टर सरयू नदी में बहा दिए। इस कारण इसका ऐतिहासिक महत्व भी रहा है, जिसे नाटक के माध्यम से बखूबी दर्शाया गया।

इन कलाकारों ने किया अभिनय
नाटक में भगत नेगी ने चाचा, लक्ष्मी महतो ने चाची, राजा व रानी की भूमिका वीरेंद्र कैटा व पुष्पा भट्ट, महामंत्री व मंत्री की भूमिका भूपाल सिंह बिष्ट व पुष्कर पांडे, पुजारी और बद्रीदत्त पांडे की भूमिका केएन पांडे, शहरी महिला व पुरुष की भूमिका में ममता कर्नाटक व डॉ. कमल कर्नाटक, शहरी बच्चे की भूमिका यश भट्ट, शहरी बच्ची की भूमिका मिताक्षी कर्नाटक, छोटा व बड़ा घूघूती की भूमिका भव्यश महतो व धु्रव पांडे, सेवक की भूमिका राम सिंह बाणी, शमशेर सिंह रावत व कार्तिक, काव की भूमिका आर. सुरेश, गोविन्द महतो व सागर गुप्ता, आकृति काव की भूमिका नवीन बोरा ग्रामीण बच्चों की भूमिका कमल भट्ट, प्रवीर कैटा, ग्रामीण महिला की भूमिका सुनीता नायल, सहयोगी महिला की भूमिका शोभा नेगी और दिव्या भट्ट, नृतका की भूमिका ज्योति ढोंडियाल व वैभवी नेगी, गीत /सेट रचना मानसी भट्ट, मेकअप की भूमिा हंसी गुसाई ने निभाई। मंच का संचालन जीवन पाण्डेय और मानसी भट्ट ने किया।








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