Sau mein sattar aadmi
कला संस्कृति

हां मैं मजबूर हूं बेबस, बेसहारा घर से दूर…

By Harish

हां मैं मजबूर हूं
बेबस, बेसहारा
घर से दूर
फिर से आज
ग़रीबी में मजबूर हूं
मैं मजदूर हूं।

यादों में समाए हुए
मेरे वो अपने
कुछ धुधले धुधले से
हो गए मेरे सपने
सपने मिटाने को मजबूर हूं
मैं मजदूर हूं।

Sau mein sattar aadmi

मायूस हूं
नम आखों से
कैसे व्यक्त करू उदगार
मन की गहराइयों से
खाली पेट मजबूर हूं
मैं मजदूर हूं।

Sau mein sattar aadmi

कैसे दूर होगी
ये बेताबी
मिटा भी पाऊंगा
ये गरीबी
इसी उलझन में फसा हूं
टीस में जीने को मजबूर हूं
मैं मजदूर हूं।

कैसी है यह दुविधा
गुम सा हो गया हूं
याद आते हैं बेहद
साए में जिनके पला हूं
उन्हें याद करने को मजबूर हूं
मै मजदूर हूं।

हरीश / हरदा पहाड़ी  (नैनी -जागेश्वर, अल्मोड़ा)

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