uttrakhand : corona fear will be effective to reduce migration
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कोरोना के भय में याद आए वो वीरान गांव और आबोहवा

by Diwan karki

कोरोना वायरस का कहर जारी है। देश-दुनिया में संक्रमित लोगों और इससे मरने वालों की संख्या लगातार बढ़ते चली जा रही है। विश्वभर के तमाम वैज्ञानिक इसके उपचार, रोकथाम के लिए दिन रात एक किए हुए हैं। अभी सभी देशों की सरकारें इस महामारी से बचाव के तरीकों को अपना रही हैं। हमारे देश में भी कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों का आंकड़ा लगातार बढ़ता चला जा रहा है। केंद्र और राज्य सरकारें अपने स्तर से कोरोना वायरस से बचाव और इसके रोकथाम के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं।

देश में लॉकडाउन का दूसरा चरण चल है। इससे पहले 21 दिन का लॉकडाउन लगाया गया और अब 3 मई तक लॉकडाउन की मियाद बढ़ाई गई है। लॉकडाउन से काफी हद तक कोरोना वायरस के प्रसार पर अंकुश तो लग पाया है। लेकिन लॉकडाउन की वजह से समाज के कई लोगों को भारी दिक्कतों का भी सामना करना पड़ा है, खासकर दिहाड़ी मजदूरों, कंपनियों में ठेके पर काम कर रहे लोगों, दुकानों, शो रूमों में काम कर रहे लोगों, ठेली-रेहड़ी लगाकर परिवार की गुजर बसर कर रहे लोगों पर लॉकडाउन का बुरा असर देखने को मिला है। लॉकडाउन की घोषणा के शुरूआती दिन से ही इन लोगों पर भय का माहौल बन गया, जिससे मजदूरों ने पैदल ही गांव जाने की ठान ली। शहरों से गांवों को भागती मजदूरों की भीड़ ने शासन-प्रशासन की चिन्ता और बढ़ा दी। हालांकि सरकारों ने अपनी तरफ से इनके रहने, खाने-पीने के बंदोबस्त का भरोसा भी दिलाया, पर मजदूरों की एक ही रट थी कि उन्हें गांव पहुंचना है। पैदल गांव जाने का सिलसिला अब भी जारी है।

uttrakhand village

अब तक कोरोना वायरस के प्रकोप से बचे हैं पहाड़ी क्षेत्र के गांव 

उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र के गांव कोरोना वायरस के प्रकोप से अब तक बचे हुए हैं। हालांकि मैदानी क्षेत्रों में कुछ संक्रमित पाए गए हैं, फिर भी अन्य राज्यों की अपेक्षा स्थिति नियंत्रण में है। यह लॉकडाउन की वजह से ही संभव हो पाया कि पर्वतीय गांव के लोग अब भी सुकून से रह रहे हैं। इस पहाड़ी राज्य के गांवों के अधिकतर लोग रोजगार के लिए शहरों पर निर्भर हैं। रोजगार और शिक्षा के अभाव में पहाड़ के इन गांवों से लोगों का दशकों से लगातार पलायन जारी रहा। देखते ही देखते गांव के गांव खाली होते चले गए। कई गांवों की आबादी शून्य हो गई। पहाड़ के जिन गांवों में कभी भरे परिवार दिखते थे, हरे-भरे खेत दिखते थे। वे गांव आज बीरान पड़े हुए हैं। इतने बीरान कि अब वहां अकेले जाने में डर लगने लगता है।

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सरकारें नहीं खोज पाईं पलायन का हल

ऐसा नहीं है कि राज्य सरकारों ने इससे पहले उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों से लगातार पलायन कर रहे लोगों के लिए कुछ पहल नहीं की हो। राज्य में जिसकी भी सरकार आई हो उसने पलायन को रोकने के लिए कुछ उपाय तो सुझाए लेकिन ऐसा कोई ठोस उपाय नहीं ढूंढ पाईं जिससे पलायन पर अंकुश लग पाता। इन पहाड़ी गांवों की मूलभूत समस्याएं शिक्षा, रोजगार और स्वास्थ्य अब भी पहाड़ी गांवों का सपना ही रह गए हैं।

बंद कमरों में फंसे अब गांव जाने को बेताब

अब जब कोरोना वायरस का प्रकोप और भय चरम पर है तो पहाड़ से रोजगार के लिए शहरों में आए लोगों में भी इसका डर साफ दिख रहा है। अब उन्हें उन शांत पहाड़ी वादियों की यादें फिर से आने लगी हैं, जिन्हें कभी वे यह सोचकर शहर के इस भीड़भाड़ वाले इलाकों में बस गए थे कि इन पहाड़ों में क्या रखा है। कोरोना वायरस के इस भय ने पहाड़ी गांवों की असली कीमत भी अब बता दी है। लॉकडाउन के चलते शहरों के बंद कमरों में फंसे कई श्रमिक अब गांव जाने को बेताब हैं। पिछले दिनों समाचार पत्रों में ऐसी खबरें भी देखने और पढऩे को मिली हैं कि शहरों से आए कई लोगों ने गांव में अपने पुश्तैनी मकानों को सही करना शुरू कर दिया है। यही नहीं कई युवाओं ने खेती की तरफ भी अपना ध्यान देना शुरू कर दिया है।

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क्या फिर बढ़ेंगे शहरों की तरफ कदम 

अब देखने वाली बात यह होगी कि कोरोना वायरस की इस मार से क्या राज्य सरकार भी कुछ सबक लेगी? क्या राज्य सरकार पलायन को रोकने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, रोजगार और स्वाथ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं में सुधार करेगी? वहीं देखने वाली बात यह भी होगी कि शहरों में कोरोना वायरस की मार झेल रहे इन पहाड़ी क्षेत्रों के लोगों के कदम क्या फिर से शहरों की तरफ बढ़ेंगे? लॉकडाउन से बढ़ती बेरोजगारी, शहरों की बढ़ती गर्मी, फल-सब्जियों के बढ़ते दाम, किराए के बंद कमरों में घुट घुटकर समय बिता रहे अधिकतर लोगों का मन फिलहाल पहाड़ की उन शांत वादियों की तरफ लौटने का है, जहां जाकर वे फिलहाल अपनी इस थकावट को मिटाना चाहते हैं। क्या इनकी यह थकावट पहाड़ के पलायन को रोक पाएगी। यह आने वाला समय ही बता पाएगा। फिलहाल ‘जान’ और ‘जहान’ बचाने का समय है।

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