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संघर्ष का दूसरा नाम राजन जोशी

उत्तराखंड के अल्मोड़ा में एक दुर्गम गांव में गरीब परिवार में जन्मे राजन अपने इलाके और राज्य के विकास के लिए बहुत कुछ करना चाहते हैं। कोरोना वायरस के संकट के बीच वह गांवों को सैनिटाइज करने के साथ-साथ लोगों को जागरूक भी कर रहे हैं।

By Anand Pandey, Delhi

आज हम बात कर रहे हैं उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जिले के धौलादेवी ब्लाक स्थित छोटे से गांव तालर-भैना के राजन चन्द्र जोशी की। परिवार का बड़ा बेटा होने की वजह से उनके ऊपर हमेशा बहुत जिम्मेदारिया रहती हैं। वह राजू नाम से लोकप्रिय हैं, उन्होंने कक्षा 1 से 4 तक की प्राथमिक शिक्षा अपने गांव के स्कूल से हासिल की। गांव में माध्यमिक स्कूल न होने के कारण बचपन में ही वह आगे की पढ़ाई के लिए अपनी मौसी के घर मुक्तेश्वर चले गए। वहां उनकी पढ़ाई शुरू तो हुई मगर भाई बहनों की याद और मां के प्यार के बिना ज्यादा दिन तक नहीं रह पाए। वह वापस घर लौट आए। उसके बाद उन्होंने 9वीं से 12वीं तक की शिक्षा गांव से लगभग 12 किमी दूर पैदल जीआईसी बमनस्वाल से पूरी की। बचपन से ही भारतीय सेना में जाकर देश सेवा करने का उनका सपना था। मगर पैसे आदि की कमी के चलते सपना पूरा न हो सका।


इस तरह बाद में उन्होंने 2007 में आरएसएस का प्राथमिक शिक्षा वर्ग किया और संघ के स्वयंसेवक बने। और वहीं से सामाजिक कार्य में जुटे गए। 12वीं पास करने के बाद वह उच्च शिक्षा के लिए हल्द्वानी चले गए और वर्ष 2011में हल्द्वानी जाकर बी.कॉम मे दाखिला लिया। मगर घर के आर्थिक हालात सही न होने के कारण कॉलेज छोड़ने को मजबूर होना पड़ा। फिर साल 2013 में दिल्ली गये, जहां एक निजी कम्पनी में जॉब करने लगे। दिल्ली उन्हें रास नहीं आयी और मात्र 6 दिन में नौकरी छोड़कर वापस आ गए। उसी बीच नौकरी की तलाश में ऋषिकेश गए, तो केदारनाथ त्रासदी हो गयी, और जिसके चलते घर की राह पकड़नी पड़ी। फिर उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा पूरी करने का विचार किया और अल्मोड़ा कैंपस में बीए प्रथम वर्ष में प्राइवेट छात्र के रूप से दाखिला लिया। साथ ही 2014 में त्रिस्तरीय चुनाव के लिए दैनिक मानदेय पर विकास खण्ड भैंसियाछाना में नौकरी शुरू की। 2015 में बीए तृतीय वर्ष में अल्मोड़ा कैंपस में संस्थागत प्रवेश ले लिया और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद छात्र संगठन से जुड़ गए।

उनका कहना है कि एबीवीपी से उनका सम्पर्क 2011 से था, लेकिन 2015 से सक्रिय भूमिका में आए। संगठन की मजबूती के लिए दिन रात मेहनत की और संगठन ने उनके कार्यों को देखते हुए व संगठन के प्रति निष्ठा को देखते हुए 2016 में उन्हें परिसर अध्यक्ष के रूप जिम्मेदारी दी। और वहीं से उन्हें छात्र राजनीति में आने का विचार आया। और अपने जैसे दूर-दराज गांवों से आकर कॉलेज में प्रवेश लेने वाले छात्र-छात्राओं को परिसर में होने वाली परेशानियों को देखकर उन्होंने छात्रसंघ चुनाव में हिस्सा लेने का फैसला किया । और वर्ष 2018 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से अध्यक्ष पद का टिकट मांगा। आरएसएस में अच्छी पकड़ होने व संगठन के प्रति निष्ठावान होने का उन्हें लाभ मिला और उन्हें अध्यक्ष पद का प्रत्याशी घोषित किया। उन्होंने छात्र संघ चुनाव में जीत भी हासिल की और परिसर में विद्यार्थी परिषद की वापसी भी करवाई।

उसके बाद 2018 में ही संगठन ने उन्हें नई जिम्मेदारी सौंपी और उन्हें प्रदेश कार्यकारिणी का सदस्य बना दिया गया। वर्ष 2019 की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक में उन्हें एक और नई जिम्मेदारी देकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद उत्तराखंड का प्रदेश सयोंजक (SFD) Student for Development बनाया गया। और 2019 में आगरा में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन में उन्हें पुनः नया दायित्व दिया गया और उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य बना दिया गया। वर्तमान में वह राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं और अल्मोड़ा कैंपस से एलएलबी की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

राजन का कहना है कि देश सेवा और समाज कल्याण के लिए कार्य करना ही उनके जीवन का एक मात्र लक्ष्य है। और उत्तराखण्ड के युवाओं को उत्तराखण्ड में रहकर ही स्वरोजगार की योजना बनाने की बात भी वह करते हैं।
इस कोरोना संकट के दौर में भी वे गांवों में सैनिटाइज करने मे लगे हुए हैं। आज अल्मोड़ा ही नहीं कुमाऊं एवं गढ़वाल के सभी विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के छात्र इनसे बहुत लगाव रखते हैं। बकौल राजन वह आज जिस मुकाम पर हैं वह सब उनके पिता के आदर्शों की वजह से ही हैं, और अपने पिता के कर्जदार हैं। वह भविष्य में एक महान समाज सेवक बनकर अपने पिता का ही नही बल्कि अपने गांव एवं ज़िले का नाम भी रोशन करना चाहते हैं।

यहां बता दें कि उनका गांव तालर-भैना जो अल्मोड़ा से 40 किमी. दूर अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ राष्ट्रीय राजमार्ग में गुरुड़ाबॉज से करीब 7 किमी. भीतर पड़ता है। राजन एक गरीब और मध्यम परिवार से ताल्लुक रखते हैं। इनके पिता का नाम पूरन चन्द्र जोशी है, जो कि आम किसान हैं और माता गृहणी हैं। इनकी तीन बड़ी बहने हैं तीनों का विवाह हो चुका है। और एक छोटे भाई भी हैं जो दिल्ली से जुड़े गाजियाबाद में एक निजी कंपनी में कार्यरत हैं ।

इस लेख के ज़रिए यही कहना चाहूंगा कि जिन्दगी जीने का तजुर्बा राजन जोशी से सीखा जाए।
✍️आनन्द पाण्डे

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