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दुर्गम पहाड़ों का एक कर्मयोगी शिक्षक…

अगर आपकी तबियत खराब हो जाए तो आपको डॉक्टर के पास पहुंचने के लिए डोली या पालकी का सहारा लेना पड़ेगा। गांव से कच्ची सड़क..कच्ची सड़क से सड़क और सड़क से मुख्य सड़क तक पहुंचते-पहुंचते ही आपका आधा दिन तबाह हो सकता है। यहां मोबाइल का नेटवर्क आपको चिढ़ाता है, इंटरनेट यहां पानी तक नहीं मांगता। नील आर्मस्ट्रांग ने चांद से धरती पर बड़ी आसानी से बातचीत की थी, लेकिन पहाड़ों के दुर्गम इलाकों में नेटवर्क खोजने में नासा भी चकरा जाएगा।

 By Sanjay Bisht, Noida

उत्तराखंड के सुदूर पहाड़ों में जहां विकास छल की एक नीति है और सुविधाएं महज़ एक यूटोपिक आभास। ऐसी बीहड़ जगहों के लिए पहाड़ों के शिक्षा सर्किट में एक शब्द कुख्यात है, जिसे कहते हैं–दुर्गम इलाका। पहाड़ों के इन दुर्गम इलाकों में कोई भी शिक्षक जाना नहीं चाहता। क्यों नहीं जाना चाहता, वह भी समझिए, दुर्गम इलाकों के स्कूलों तक पहुंचने के लिए आपको कई-कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। ये गांव ऐसे होते हैं, जहां सुख की तलाश आपको अपने आत्मचिंतन से करनी होती है और सुविधाएं सिर्फ उतनी, जितनी आप अपने बैग में शहर से भरकर ला सकें।

अगर आपकी तबियत खराब हो जाए तो आपको डॉक्टर के पास पहुंचने के लिए डोली या पालकी का सहारा लेना पड़ेगा। गांव से कच्ची सड़क..कच्ची सड़क से सड़क और सड़क से मुख्य सड़क तक पहुंचते-पहुंचते ही आपका आधा दिन तबाह हो सकता है। यहां मोबाइल का नेटवर्क आपको चिढ़ाता है, इंटरनेट यहां पानी तक नहीं मांगता। नील आर्मस्ट्रांग ने चांद से धरती पर बड़ी आसानी से बातचीत की थी, लेकिन पहाड़ों के दुर्गम इलाकों में नेटवर्क खोजने में नासा भी चकरा जाएगा। पहाड़ों के ज्यादातर टीचर दुर्गम जगहों में हुई अपनी पोस्टिंग को कालापानी मानते हैं और सुगम जगहों में अपने ट्रांसफर के लिए प्रयासरत रहते हैं, जो प्रयास नहीं कर पाते वे बेचारे कुड़ते रहते हैं, जलते रहते हैं।

लेकिन उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों के दुर्गम स्थानों में भी शिक्षा की धूनी रमाई जा रही हैं, सरकारी सिस्टम के कुछ ऐसे चेंजिंग एजेंट भी हैं जो चुनौतियों के सामने आत्मसमर्पण करने को तैयार नहीं हैं। कुछ शिक्षकों ने पहाड़ों में शिक्षा की ऐसी अलख जगा रखी है, जिससे पूरा पहाड़ रौशन है। ऐसे ही एक शिक्षक हैं, भास्कर जोशी। भास्कर जोशी दुर्गम जगहों के मसीहा अध्यापक क्यों हैं, इसका अंदाजा एक वीडियो से लगाया जा सकता है। पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ, इस वीडियो में छोटे-छोटे स्कूली बच्चे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते नजर आए। ये स्कूली बच्चे सरकारी स्कूल में एडमिशन का संदेश दे रहे थे। इन बेहद प्रतिभावान बच्चों के गुरु हैं भास्कर जोशी। भास्कर अल्मोड़ा के धौलादेवी ब्लॉक के बजेला गांव के टीचर हैं। यह गांव इतना दुर्गम है कि अल्मोड़ा से इस गांव तक पहुंचने में आधा दिन लगता है। सिर्फ इतना ही नहीं, चार पहिया वाहन से सवारी करने के बाद, करीब 7 किलोमीटर की दूरी पैदल पार कर इस गांव बजेला में पहुंचा जा सकता है।

भास्कर 2013 से इस प्राइमरी स्कूल में नियुक्त हैं। शुरुआत में भास्कर जोशी ने पास ही के एक कस्बे में किराए पर मकान लिया लेकिन स्कूल से दूर रहकर बात नहीं बनी। इसलिए बाद में वह गांव में ही रहने आ गए और फिर बच्चों के साथ भास्कर का प्रयोग शुरु हुआ। भास्कर जब गांव के स्कूल में आए, तब स्कूल की हालात बेहद खराब थी। सिर्फ 10 बच्चे इस स्कूल में पढ़ रहे थे। भास्कर ने घर घर जाकर कैंपेन चलाया। अभिभावकों को भरोसा दिलाया और बच्चों को गांव के स्कूल भेजने की अपील की। कई माता-पिता आर्थिक बोझ सहकर अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए दूर दूर के प्राइवेट स्कूलों में भेज रहे थे, भास्कर ने ऐसे माता पिता से भी बात की। स्कूल आ रहे बच्चों को नए तरीकों से शिक्षा दी। हर छात्र की कमजोरी का पता लगाया और उसे दूर किया। साल दर साल स्कूल का रिजल्ट अच्छा आने लगा, और अब भास्कर के स्कूल में 27 बच्चे पढ़ने लगे हैं।

प्राइमरी स्कूल बजेला के छात्रों को प्राइवेट स्कूल के छात्रों से कम सुविधाएं नहीं दी जा रही हैं। सरकारी स्कूल के बच्चे फर्नीचर में बैठते हैं और प्रोजेक्टर के जरिए पढ़ाई करते हैं। भास्कर कक्षा 1 से लेकर 5 तक के स्कूल में अकेले टीचर हैं। आमतौर पर अकेला शिक्षक होना एक चुनौती हो सकता है लेकिन भास्कर जोशी ने इस चुनौती को अवसर में तब्दील किया और स्कूल के सभी छात्रों को शिक्षा के एक ही सांचे में ढाला। हर छात्र के लिए पढ़ने की एक जैसी तकनीक को अपनाया और हर किसी के लिए अंग्रेजी के ज्ञान को अनिवार्य बनाया। न सिर्फ अंग्रेजी बल्कि गणित और विज्ञान जैसे विषयों पर भी स्कूली छात्रों को निपुण बनाया और इसीलिए भास्कर जोशी का स्कूल न सिर्फ जिले बल्कि राज्य में भी सबसे नामदार स्कूल है। इस स्कूल के छात्रों का लोहा पूरा जिला मानता है। भास्कर निष्काम कर्मयोगी की तरह दुर्गम गांव में रहकर बच्चों को मनोयोग से पढ़ा रहे हैं। उनकी इस साधना का अहसास न सिर्फ जिला प्रशासन बल्कि केंद्रीय सरकार को भी है। भास्कर जोशी कई पुरस्कारों से नवाज़े जा चुके हैं। उन्हें केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री से टीचर इनोविट अवार्ड भी मिल चुका है।

अध्यापक भास्कर जोशी का परिवार हल्द्वानी में रहता है और वह अकेले गांव में रहते हैं। शहरों में रहने वाले हम और आप जैसे लोग अपने मोबाइल से ई कॉमर्स कंपनियों के जरिए अपने घर तक ज़रूरी सामान चुटकियों में मंगा लेते हैं लेकिन उत्तराखंड का बजेला गांव ऐसा गांव है जहां भास्कर को महीने का राशन मंगाने के लिए घोड़ों की मदद लेनी पड़ती है। गांव में मोबाइल का नेटवर्क हर दम नदारद रहता है, भास्कर बताते हैं कि गांव में एक पेड़ के नीचे ही मोबाइल का नेटवर्क आता है, ऐसे में उन्हें दुनिया से जुड़ने के लिए उस पेड़ के नीचे आना पड़ता है, ठीक वैसे जैसे भगवान बुद्ध को बोधि वृक्ष के नीचे बोधित्व प्राप्त हुआ था, वैसे ही पहाड़ों में पेड़ के नीचे जाकर ही मोबाइल का नेटवर्क हासिल हो सकता है।

भास्कर सरकारी कर्मचारी होने के बाद भी विपरीत परिस्थितियों में असाधारण काम कर रहे हैं। उनके काम को पहचान मिल रही है और दूर दूर तक ये पैगाम भी जा रहा है कि सभी सरकारी कर्मचारी मन लगाकर काम करे तो समाज की सूरत बदल सकती है, आने वाला भविष्य सुरक्षित बन सकता है।

लेखक इंडिया टीवी से जुड़े हैं

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