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तिब्बत की सुंदरता के कहने ही क्या…

मनुष्य को प्रकृति ने कितने बड़े उपहार दिए हैं, हमारे दिलों में प्रकृति मां या मातृभूमि के लिए उतना बड़ा धन्यवाद होना चाहिए..
By Pro. Navin Lohani, Delhi
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मुझे पिछले साल तिब्बत यात्रा के दौरान एक अवसर मिला जब एक कमरे की छत पर लगाई जाने वाली सामग्री को बराबर करते और गाते हुए मजदूरों ने बरबस हमारा ध्यान खींचा। श्रम में आनंद की जगह ढूंढ रहे इन मजदूरों को आपके समक्ष प्रस्तुत करने का लोग संवरण नहीं कर सका।
तिब्बत यात्रा का विविध वर्णी रंग आपके सामने जल्दी लाऊंगा लेकिन इन वीडियो व चित्रों के माध्यम से आप जान पाएंगे कि तिब्बत की संस्कृति कैसी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि श्रम अगर समन्वय, सहयोग और प्रेम से किया जाए तो वह फिर पूजा हो जाती है। पूजा केवल मंदिर, मस्जिद, गिरजा, गुरुद्वारे में ही नहीं होती।
मैं उत्तराखंड में गीत गाते हुए धान की रोपाई लगाने वाले समूह के गीत का गवाह रहा हूं। दोपहर की चिलचिलाती धूप में टखनों तक मिट्टी में डूबे पांव आनंद में एक दूसरे के साथ गाते हुए रोपाई लगाते हैं।
अब यहां मैं एक गीत साझा कर रहा हूं, जिसे भेजा है चीन के शंघाई अंतरराष्ट्रीय अध्ययन विश्वविद्यालय SISU में अध्ययनरत स्नातक कक्षा हिंदी ऑनर्स की तृतीय वर्ष की छात्रा 次单央宗 त्सतानयांगज़ोंग  (मीना ) ने। जो ल्हासा(तिब्बत) की  मूल निवासी हैं। इस सत्र में कोरोना के कारण विश्वविद्यालय बंद होने से वह ल्हासा में ही रह रही हैं। मेरे अनुरोध पर उन्होंने तिब्बती गीत का हिंदी भावार्थ मुझे भेजा है। यह अनुवाद मैं आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं।

इसके पीछे एक और बात है कि विश्व भर में श्रम गीतों की एक बड़ी परंपरा रही है, मैं जिस कौरवी क्षेत्र के चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में अध्यापन करता हूँ, यहां भी श्रम गीतों की एक अच्छी परंपरा है और मेरा गांव उत्तराखंड में है वहां भी श्रम गीतों की एक लंबी परंपरा है। श्रम गीतों में  प्रायः जो सबसे अच्छी बात है वह यह कि वह प्रकृति प्रेम, देश प्रेम और आपसी सौहार्द के दृष्टिकोण में रचे बसे होते हैं।
ऐसे ही गीत मानव सभ्यता के भविष्य में काम आने वाले गीत हैं जहां प्रकृति मां है और उससे जो भी मिलता है और इस गीत में जो कहा गया है कि और बढ़ कर उसे लौटाएं। यह बहुत बड़ी भावना है “माता भूमि  पुत्रो अहम् पृथ्व्या:” । यह भावना हम विश्व भर के श्रम गीतों में पाते हैं। सब नागरिक अपने देश, अपनी मिट्टी, अपनी मातृभूमि के प्रति इसी प्रकार समर्पित भाव से  गीत गाते पाए जाते हैं ।

जो यह गीत वीडियो में आप सुन रहे हैं। उसे हिंदी विभाग की छात्रा मीना ने इस तिब्बती गीत का हिंदी अनुवाद मुझे उपलब्ध कराया मैं उनका आभारी हूं और मैं इस कोरोना काल में उनके उनके परिवार के सभी मित्रों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता हूं।

गीत का सार….

“जब श्रमिक श्रम करते हैं, तब वे इस तरह के गीत गाते हैं ताकि थकान दूर कर सकें।
आशा पहाड़ पर आकर श्रम कर रहे नौजवानों ने (श्रम करते समय)  नारा सुना: 1, 2, 3, 4,  और पहाड़ पर हमारी प्रकृति माँ(Mother Nature) को देखा।
आशा पहाड़ से ही मकान को सजाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली मिट्टी लाई जाती है।
इस गीत गाने से वह यह व्यक्त करना चाहते हैं कि मनुष्य को प्रकृति ने कितने बड़े उपहार दिए हैं, हमारे दिलों में प्रकृति मां या मातृभूमि के लिए उतना बड़ा धन्यवाद होना चाहिए ।”

प्रो. नवीन लोहनी चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ में हिंदी विभाग के अध्यक्ष हैं और चीन सहित कई देशों में हिंदी अध्यापन कर चुके हैं।

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