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तीलू रौतेली के नाम से इसलिए दिया जाता है सम्मान जानिए अपना इतिहास

By Harish Chandra Sanwal

तीलू रौतेली ( Teelu-Rauteli) उत्तराखंड की वीरांगना हैं। उसने 15 से 22 साल की उम्र में सात युद्ध लड़े थे। उत्तराखंड के इतिहास में उनकी वीरता की तुलना रानी लक्ष्‍मीबाई, चांद बीबी, झलकारी बाई, बेगम हजरत महल के समान ही है। चौंदकोट में पति की बड़ी बहिन को ‘रौतेली’ कहा जाता है। इसीलिए उनके नाम के पीछे रौतेली शब्द जुड़ गया। तीलू रौतेली की वीरता को सम्मान देने के लिए उत्तराखंड सरकार ने उनके नाम से सम्मान और योजनाएं शुरू की हैं। तीलू रौतेली पुरस्कार हर साल आठ अगस्त को दिया जाता है। 

तीलू रौतेली (Teelu-Rauteli) का नाम तिलोत्‍तमा देवी था। तीलू का जन्म सन 1661 में हुआ था। वह चौंदकोट गढ़वाल के गोर्ला रौत थोकदार और गढ़वाल रियासत के राजा फतेहशाह के सेनापति भूप्पू रावत की बेटी थी। तीलू ढाल-तलवार चलाकर ही बड़ी हुई थी। वह अच्छी घुड़सवार भी थी।

15 साल की उम्र में वह घुड़सवारी और तलवारबाजी के सारे गुर सीख चुकी थी। कत्यूरों के आक्रमण में तीलू के पिता भूप्पू रावत और दोनों बड़े भाई पत्वा और भक्तू, मंगेतर भवानी सिंह मारे गये थे। इसका बदला लेने के लिए उसने अपने बचपन की सहेली बेला और देवकी के साथ कत्यूरों से लड़ाई लड़ी। कहते हैं कि कुमाऊं में जहां बेला शहीद हुई उस स्थान का नाम बेलाघाट और देवकी के शहीद स्थल को देघाट कहते हैं। अंत में जब तीलू लड़ाई जीतकर अपने गांव गुराड़ वापस आ रही थी तो रात को पूर्वी नयार में स्नान करते समय कत्यूर सैनिक रामू रजवाड़ ने धोखे से उनकी हत्या कर दी।

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