कला संस्कृति

इसलिए किया जाता है वट सावित्री व्रत, जानिए पौराणिक कथा

By Aashish Pandey, Haldwani

हिन्दू परंपरा में स्त्रियां अपने पति की दीर्घायु और सुखद वैवाहिक जीवन के लिए तमाम व्रत का पालन करती हैं। वट सावित्री व्रत भी सौभाग्य प्राप्ति के लिए एक बड़ा व्रत माना जाता है। व्रत के दिन महिलाएं अपने सुहाग के लिए व्रत रखती हैं, यह व्रत ज्येष्ठ  मास की अमावस्या के दिन मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ  मास की अमावस्या को शनि जयंती भी मनाई जाती है।

bat savitri

नियमों का रखना पड़ता है विशेष ध्यान

इस व्रत में नियमों का विशेष ध्यान रखना पड़ता है, व्रत में महिलाएं अपना पूरा सोलह सिंगार करती हैं, व्रत की पहली रात अपने हाथों को मेहंदी सजाती हैं। बरगद के पेड़ के नीचे बैठकर पूजा करती हैं । पति की लंबी आयु और उसके कष्टों को दूर करने के लिए इस व्रत को जो महिलाएं पहली बार करती हैं, वह इसके लिए बहुत ही उत्साहित होती हैं । उनकी सास या कोई भी घर पर जो पहले से इस व्रत को करता रहा है वह उन्हें इसके नियमों का बारे में बताता है।


 

व्रत के लिए क्या नियमों का पालन करना चाहिए
वैसे तो कोई भी व्रत करने से पहले सभी चीजों को ध्यान में रखना चाहिए। इस व्रत को करने के लिए नियमों का पालन एक दिन पहले से करना चाहिए । व्रत के पहले दिन  सात्विक भोजन करें और लहसुन प्याज नहीं खाना चाहिए कुछ  व्रती फलाहार भी करते हैं। अपने व्यवहार को भी सात्विक रखें , जिस दिन व्रत होता है उस दिन भी सुबह जल्दी उठ कर नहा धो लें और शुद्ध हो जाए ।

इस दिन भोजन में क्या खाना चाहिए
व्रत के दिन भगवान के लिए पहले प्रसाद बनाया जाता है जिसमें कि थोड़ा सा काले चने, पूरी और पांच प्रकार के फलों को रखा जाता है। सही पूजन सामग्री के बिना की गई पूजा अधूरी मानी जाती है। पूजन सामग्री में बांस का पंखा, चना, लाल या पीला धागा, धूप बत्ती, फूल, कोई भी पांच फल जल से भरा पात्र सिंदूर, लाल कपड़ा आदि का होना अनिवार्य है।

यह है वट सावित्री की पौराणिक कथा
बहुत पहले की बात है अश्वपति नाम का एक राजा था। उसकी पुत्री का नाम सावित्री था। जब सावित्री शादी के योग्य हुई तो उसकी मुलाकात सत्यवान से हुई। सत्यवान की कुंडली में सिर्फ एक वर्ष ही जीवन बचा था। सावित्री पति के साथ बरगद के पेड़ के नीचे बैठी थी। सावित्री की गोद में सिर रखकर सत्यवान लेटे हुए थे। इसी बीच उनके प्राण लेने के लिए यमलोक से यमराज के दूत आए। मगर सावित्री ने अपने पति के प्राण नहीं ले जाने दिये। तब यमराज खुद सत्यवान के प्राण के लिए आते हैं।

सावित्री के मना करने पर यमराज उसे वरदान मांगने को कहते हैं। सावित्री वरदान में अपने सास ससुर की सुख शांति मांगती है। यमराज उसे दे देते हैं पर सावित्री यमराज का पीछा नहीं छोड़ती है। यमराज उसे दोबारा वरदान मांगने को कहते हैं। सावित्री अपने माता पिता की सुख समृद्धि मांगती है। यमराज तथास्तु बोलकर आगे बढ़ते हैं। मगर सावित्री फिर से उनका पीछा नहीं छोड़ती है। यमराज उसे आखिरी वरदान मांगने को कहते हैं तो सावित्री वरदान में पुत्र मांगती है। यमराज तथास्तु कहकर जब आगे बढ़ने लगते हैं तो सावित्री कहती है कि पति के बिना मैं कैसे पुत्र प्राप्त कर सकती हूं। इस पर यमराज उसकी बुद्धिमत्ता देखकर प्रसंन्न हो जाते हैं। उसके पति प्राण वापस कर देते हैं।

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