अपनी बात

आवश्यक है सभी बच्चों में वैज्ञानिक सोच का होना

By G D Pandey

वैज्ञानिक सोच का संबंध केवल साइंस के विषयों तक सीमित नहीं है। आधुनिक शिक्षा प्रणाली के तहत साइंस स्ट्रीम के विषयों का अध्ययन करने वाले सभी बच्चों में वैज्ञानिक सोच का विकास हो जायेगा, ऐसा मान लेना वस्तु स्थिति के अनुरूप नहीं होगा। दूसरी तरफ काॅमर्स तथा आर्ट्‍स ( ह्यूमैनिटीज स्ट्रीमस )  के विषयों का अध्ययन करने वाले बच्चों में वैज्ञानिक सोच का विकास नहीं हो सकता, ऐसा मान लेना भी सरासर गलत होगा। अब प्रश्न उठता है कि वैज्ञानिक सोच है क्या चीज? आइये इसे समझने की कोशिश करते है, दरअसल किसी भी चीज को समझने का व्यवस्थित ज्ञान  सिस्टमैटिक नालेज  पर आधारित नजरिया वैज्ञानिक सोच कहलाता है। अब प्रश्न उठता है कि यह व्यवस्थित ज्ञान (सिस्टमैटिक नालेज) क्या है? आइये इसे भी समझने की कोशिश करते हैं व्यवस्थित ज्ञान से अभिप्राय उस ज्ञान से है जो तर्कसंगत हो, जिसका सैद्धांतिक आधार हो और जो व्यवहार में लागू करके आगे विकसित हो सकता हो। समाज तथा जीवन के किसी भी क्षेत्र में व्यवस्थित ज्ञान अर्जित करने का दृष्टिकोण वैज्ञानिक सोच के विकास की कुंजी है। यहां पर एक महत्वपूर्ण सवाल है कि बच्चों के ज्ञान के स्रोत क्या हैं ?

पांच वर्ष तक के बच्चों के ज्ञान का मुख्य स्रोत

यदि हम छोटे बच्चों से शुरू करें तो देखते हैं कि पांच वर्ष तक के बच्चों के ज्ञान का मुख्य स्रोत उसके माता-पिता और भाई-बहन, उसके आस पड़ोस के कुछ सीनियर बच्चे, मोबाइल, टेलीविजन तथा कुछ बच्चों के प्ले तथा नर्सरी स्कूल और वस्तुओं की पहचान तथा अक्षर बोध संबंधी कुछ छोटी-छोटी पुस्तकें। बच्चे बहुत ही संवेदनशील तथा मासूम होते हैं उनका मस्तिष्क कोमल तथा अनलिखे कागज की तरह होता है। ऐसी स्थिति में बच्चे कुछ भी सीख सकते हैं। उन्हें गलत सही का कोई बोध नहीं होता, वे जो देखते सुनते हैं वही बोलते हैं और जो क्रिया कलाप देखते हैं वही करने की कोशिश भी करते हैं। सभी पैरेन्टस चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छी आदतें , अच्छा व्यवहार तथा अच्छे गुण सीखें और पढ़ाई में होशियार हों, यह भावनात्मक अभिलाषा तभी साकार हो सकती है जब बच्चों को शुरू से ही वैज्ञानिक सोच के तहत उचित परिवेश प्रदान किया जाय, यह नि:संदेह एक चुनौतीपूर्ण कार्य है ।

बच्चों के विकास के लिए माता पिता का दोस्ताना व्यवहार अहम

पति पत्नी दोनों का वर्किंग होना और बच्चों को पर्याप्त समय न दे पाना, बच्चों को क्रच में डाल देना और पांच साल के बाद भी उनकी समस्याओं और खुशी में उनके साथ दोस्ताना व्यवहार बनाने के लिए समय का अभाव इत्यादि दिक्कतें बच्चों में स्वत:स्फूर्त विकास का कारण बन जाती हैं और पति तत्नी का ऊॅचा स्टेटस या बड़ा ओहदा होने के बावजूद भी बच्चों में वैज्ञानिक सोच का आभाव ही रहता है। कुछ पति पत्नी अपने बच्चों को अपनी मानसिकता की कसौटी में कस कर रखना चाहते हैं जिससे बच्चे धीरे धीरे अपनी सारी बातें बताना बन्द कर देते हैं और अपनी ही मर्जी के मालिक बनने की दिशा में आगे बढ़ने लगते हैं। पति पत्नी का कम पढ़ा लिखा होना तथा बच्चों को ठीक ढंग से मार्गदर्शन न दे पाना भी वैज्ञानिक सोच की दिशा में आगे न बढ़ पाने का एक प्रमुख कारण है । कुछ पेरैन्टस का सोच वैज्ञानिक तरीके का होने के कारण वे बच्चों को भी सही मार्गदर्शन दे पाते हैं। शेष बच्चे घर के मार्गदर्शन से वंचित रह जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में पेरैन्टस को स्वयं भी वैज्ञानिक सोच का होना पड़ेगा ।

जिज्ञासाओं का सही और सरल जवाब वैज्ञानिक सोच का परिचायक

इसका व्यावहारिक पहलू यह है कि बच्चे बड़ी सरलता से सहज रूप में क्या, क्यों और कैसे का जवाब चाहते हैं अर्थात, ये चीचें क्या हैं? क्यो हैं ? कैसे हैं ? उन्हें उसी सरलता और सहज भाव से जवाब देना और सही जवाब देना वैज्ञानिक सोच का परिचायक है। यदि सही ढंग से उचित जवाब देने के बजाय टालमटोल करने या बच्चों को जबरन चुप करा देने जैसे तरीकों से बच्चों के सोचने समझने की स्वाभाविक इच्छा कमजोर पड़ने लगती है और उनके ऐसे प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं जो उनके व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं। घर के अतिरिक्त बच्चे स्कूल में भी हर प्रश्न का उत्तर क्या , क्यों और कैसे पर ही आधारित चाहते हैं, तभी वे आसानी से समझ भी सकते हैं।

बच्चों पर जबरन कोई विचार न थोपे, तार्किक बनने दें

अर्थात बच्चों की मूलभूत प्रवृत्ति चीजों को तर्कसंगत तरीके से समझने की होती है। यदि बच्चों पर कोई विचार या मन्यता जबरन थोपने की कोशिश की जाती है और बिना रीजनिंग के कोई अवधारणा या कोई उत्तर उनके सामने रख दिया जाता है तो वे न तो समझ पाते हैं और ना ही ऐसे अनरगल बातों और अपुष्ट उत्तरों के प्रति कोई दिलचस्पी दिखाते हैं। अगर प्रारम्भ से ही सोचने और समझने का दृष्टिकोण व्यवस्थित तरीके का होता है तो बच्चे आगे चलकर सही और गलत की पहचान स्वयं से कर सकते हैं। बच्चों में अपनी बात को दूसरों के सामने प्रस्तुत करने का आत्मविश्वास भी तभी पैदा होता है जब उन्हें लगता है कि उनकी बात हर पहलू से ठीक है और उस बात को रखने में कोई हिचक अथवा डर बच्चों में नहीं रहता है।

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शारीरिक पालन पोषण के साथ मानसिक पोषण का उत्तरदायित्व भी

यहाॅ पर एक और व्यवहारिक पहलू सामने आता है कि अधिकांश पेरैन्टस यह कह कर अपने उत्तरदायित्व से मुंह मोड़ लेते हैं कि हमने बच्चों को अच्छे स्कूल में डाल दिया है और उनके लिए ट्यूशन की व्यवस्था भी कर दी है, हमारे पास टाइम नहीं है, हमें नौकरी भी करनी है, हम तो पैसा दे सकते हैं बांकी पढ़ना तो बच्चों का काम है, इत्यादि इत्यादि। यह परिस्थिति तो अवश्य है परन्तु बच्चों के प्रति पेरैन्टस का दायित्व तो स्कूल अथवा ट्यूशन की व्यवस्था द्वारा पूरा नहीं किया जा सकता। आज के दौर में शिक्षा दीक्षा का भी व्यवसायीकरण हो चुका है। ऐसे में जितना संभव हो सके उतना समय तो कम से कम इस सोच के साथ बच्चों को दिया जाए कि बच्चों के शारीरिक पालन पोषण के साथ उनके मानसिक पोषण का उत्तरदायित्व भी पेरैन्टस का ही है। इसलिए यथासंभव सब कुछ व्यवस्थित ढंग से करने की आवश्यकता है। टाइम मैनेजमेंट का जिन्दगी में बहुत बड़ा योगदान होता है। बच्चों के साथ पेरैन्टस का शुरू से ही एक दोस्ताना व्यवहार होना निहायत जरूरी है। बच्चे जब माता पिता के सामने सब कुछ रखने की स्थित में स्वयं को पाते हैं तो उनके हर प्रश्न का उत्तर ढूंढने में पैरेन्टस की भागीदारी का लाभ उठाकार चीजों को समझने का उनका दृष्टिकोण संतुलित ढंग से सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं को समीक्षा पर आधारित रहने लगता है और उनका ज्ञान व्यवस्थित तरीके का हो जाता है और ऐसा ही दृष्टिकोण वैज्ञानिक सोच का पथ प्रदर्शक होता है। अत: आवश्यक है बच्चों में वैज्ञानिक सोच का होना।

लेखक भारत सरकार के आवासन एवं शहरी कार्य  मंत्रालय के प्रशासनिक अधिकारी पद से अवकाश प्राप्त हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेखन और संपादन से जुड़े हैं।

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