अपनी बात

गॉव के लोग खुद ही खोद रहे हैं सड़क, क्या पता कभी इन सड़कों से आ टपके ‘विकास’

By C. S Karki, Delhi 

पहाड़ के एक गांव का एक वीडियो देखने को मिला। गॉव के लोग अपने कठिन पैदल मार्ग को सुगम बनाने, चौड़ा करने के लिए जुट गए हैं। इन दिनों ऐसे ही कई दुर्गम गॉवों के वीडियो, फोटाग्राफ्स और समाचार देखने, सुनने को मिल रहे हैं। लोग मुख्य सड़क से अपने गॉव को जोड़ने के लिए खुद ही अपने मोटर मार्गों का निर्माण करने लगे हैं। यह दुर्गम पहाड़ी गॉवों की पीड़ा को कम करने का एक साहसिक कदम है। ऐसा नहीं है कि लोगों ने सरकारी मदद के लिए आवाज नहीं उठाई हो। लेकिन हर बार के आश्वासन उनके इंतजार को बढ़ाते चले गए। सरकार ने जब उनके गॉवों की कोई खैर खबर ही नहीं ली। तो ग्रामीणों ने खुद ही अपने रास्ते और सड़कों को ठीक करने के लिए औजार उठा लिए और खोद डाली सड़क। तारीफ की बात यह भी कि पहाड़ के लोग साहसी, मेहनतकश के साथ-साथ ईमानदार भी होते हैं। इसी के बल बूते ये साहसिक कदम भी उठे। अब गॉव के लोगों को आस है कि विकास इन्हीं चौड़ी सड़कों से गॉव तक पहुंचेगा। विकास का मतलब अच्छी शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य, खेती किसानी, स्वच्छ पानी, पौष्टिक आहार और सबसे ऊपर स्वाभिमान की रक्षा है।

सरकारी सुविधा यदा-कदा ही मिलती है, तकलीफदेह भी

सरकारी सुविधा यदा-कदा ही मिलती है, तकलीफदेह होती है। क्योंकि ये विकास की नजदीकी है। ये है तो आम जन की हिस्सेदारी, पर फलीभूत उसे कम ही होती है। सुदूर गांव से जब किसी बीमार को डोली से अस्पताल जाना होता है तो इन कठिन पहाड़ी मार्गों से उसे ले जाना बहुत तकलीफदेह होता है। इसलिए अपनी पीड़ा को कम करने के लिए विकास के इस मशीनरी जमाने में लोगों ने खुद खोद डाली सड़क। बहुत आसान होता है बुल्डोजर से सड़क खोदना। लेकिन ये तो विकास के साथ भारी ठेके पर छूटता। जिसके कमीशन की भनक विकास पुरुषों को नहीं लगी। कमीशन का अनुमान जहां लगा, वहां विकास की विरादरी वालों ने बेतरतीब खोद डाले पहाड़। ये तो सड़क ही है। बुल्डोजर नहीं आया तो क्या हुआ। गेंठी,फावड़ा, कुदाल और इन लोगों के मजबूत हाथ ही काफी थे इसके लिए। और बना डाला गॉव तक का रास्ता सीधा सपाट। ताकि ढो सकें अपनी तकलीफें कुछ आराम से।

कठिन होता है सुदूरवर्ती गांव में रहने वालों का जीवन

काश, कुछ ऐसी ही मेहनत करके ये खोद पाते अच्छे स्वास्थ्य की पुड़िया। बहुत दु:खी होते हैं सुदूरवर्ती गांव में रहने वाले लोग। बीमार पड़ते हैं तो कई दिन यों ही तकलीफ में काट लेते हैं। उन्हें लगता है कि सहते-सहते ठीक हो जाएं। ज्यादा असहाय होने पर ही नजर दौड़ाते हैं बेचारे, कहां है अस्पताल? पर इन दुर्गम गांवों से ठीक से नजर भी नहीं आता अस्पताल। अस्पतालों के भवन तो दिखते हैं कहीं-कहीं, पर वहां जाओ तो डाक्टर नहीं। यदा कदा कोई डाक्टर मिले भी तो दवा नहीं। रेफरल केंद्र ही तो बने हैं पहाड़ के स्वास्थ्य केंद्र। चलो, रेफरल के बाद भी अस्पताल मिल जाता तो राहत की बात होती। पहाड़ में ऐसा भी संभव नहीं। मैदान में उतरकर ही आस दिखती है। वहां भी प्राइवेट अस्पताल के ही द्वार देखने पड़ते हैं। वहां भी पैसों की पोटली चाहिए। प्राइवेट अस्पताल भी मरीज की जेब ही तो टटोलते हैं। पर इन लोगों के पास लुटाने को पैसा कहां? तो मामला फिर वहीं अटक जाता है कि – ‘कहीं नहीं जाना’।  फिर वहीं झाडफ़ूंक या पूजा पाठ का रास्ता दिखता है। किस्मत से ठीक हुए तो ठीक। नहीं तो जय राम जी की। काश, ये लोग सड़क की तरह ही खोद पाते अस्पताल, डाक्टर और पैदा कर पाते ईलाज अपने कष्टों के निवारण के लिए। असंभव ही तो है ये मामला, विकास से जो जुड़ा हुआ है।

शिक्षा से पनपती हैं विकास की जड़ें

विकास की जड़ें शिक्षा से पनपती हैं। तंदुरुस्त व विशाल हो जाता है विकास। जब शिक्षा की फसल खूब बढ़िया होती है। इसी फसल का तो अभाव है यहां। पहाड़ी खेती की तरह तितर-बितर लगती हैं दालें। बहुत अच्छी तादात में उसर जमीन की क्यारियां सी बना दी शिक्षा की। बहुत लापरवाही हो जाती है इस फसल की गुड़ाई-निराई में। रख-रखाव का ख्याल कम ही होता है। मुरझाई सी बालियां निकलती हैं पढ़ी लिखी। खिलखिलाती होती तो रोजगार के बाजार में अच्छी बोली लगती।

काश ये खुद ही संवार पाते शिक्षा की इन क्यारियों को। महकते नौनिहालों को। चमक धमक से निकलते तो इस विकास के रण क्षेत्र में। फिर क्या, विकास की क्या औकात जो नहीं आता हर गांव में। हर गांव चमकता, हर चेहरा मुस्कुराता। पर क्या करें। शिक्षा के स्तर को फावड़े से खोदकर ये सुधार नहीं सकते। ये तो तभी होगा जब कभी भूले भटके विकास टपक पड़ेगा।

जंगली जानवर गॉंवों को ही अपना घर समझने लगे

बहुत मोटा अनाज उगाते हैं पहाड़ में। कुछ साग सब्जी। जीवन जीने का माध्यम है यहां की कृषि। ये इनकी मेहनत पर ही है। खूब मेहनत के बाद थोड़ा बहुत जो भी पैदावार होती है, उसे जंगली जानवर चट कर जाते हैं। छोड़ दी है दूर दराज की खेती लोगों ने। पता चला अड़ोस-पड़ोस के गांवों में छिटका छिटका विकास आया। भटका हुआ विकास अड़ोस-पड़ोस के जंगलों को चट कर गया। जंगली जानवर गॉंवों को ही अपना घर समझने लगे हैं। गॉव वालों की मेहनत चट कर रहे हैं।

काश इन गांव वालों की मेहनत में दम होता। जानवरों के जंगल फिर खिलखिला पाते। घने वन में जंगल के परिंदों, वाशिंदों को अपना परिवेश मिलता। गांव के गरीब की मेहनत चट नहीं करते या फिर विकास का आदमी ही जानवरों से गांव की रक्षा करता। गांव में फसलें उगती, सब्जियां उगती। मन लगा रहता। दिन तो कट ही जाते। ये तभी तो होता जब विकास सीधे रास्ते गांव तक पहुंचता।

चलो पगडंडियों को चौड़ा करना इन ग्रामीणों के वश में था, जो इन्होंने कर दिखाया। कोशिश की विकास का रास्ता बनाने की। बाकी विकास की मर्जी। आशा है कभी तो टपकेगा।

लेखक सेवानिवृत्त शिक्षक हैं।

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