कला संस्कृति

अचंभित कहूँ या मनमोहक कहूँ..

By Harish

वो काले बादलों का
घिरकर एकत्र होना
वो अंबर में उनका
निरंकुश दौड़ लगाना,
अचंभित कहूँ या मनमोहक कहूँ,,

वो अंबर में उनका टकराना
अचानक तेज रोशनी प्रकट होना
एक भयानक गर्ज़न का उत्पन्न होना
और धरा में कंपन होना,
अचंभित कहूँ या मनमोहक कहूँ,,

वो हल्की बारिश की
बूँदों का गिरना
उनका धरा पर पड़ते ही
यूँ बिखर सा जाना,
अचंभित कहूँ या मनमोहक कहूँ,,

कभी बूंदें इतनी हल्की
मानो मुस्कान सी लगती,
कभी इतना भयावह रूप धारण कर
क्रोधित सी दिखती हैं,
अचंभित कहूँ या मनमोहक कहूँ,,

कभी बच्चे बड़े सब संग में झूमते
खेलते, झूमते, गुनगुनाते
कभी भयानक इतनी
सब घर में बंद हो जाते,
अचंभित कहूँ या मनमोहक कहूँ,,

कभी न होती तो तरस जाते पानी को
फसलें सब बर्बाद हो जाती
कभी इतनी बरस कर होती
खेत खलिहान सब
संग में बहा कर ले जाती,
अचंभित कहूँ या मनमोहक कहूँ,,

हरीश, हरदा पहाड़ी

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