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बाजार में टक्कर देने आ गया सेराघाट का आम (Seraghat’s Mango), जानिए इसकी खासियत

By Diwan Karki

अल्मोड़ा। फलों के राजा आम का सीजन चल रहा है। शहरों से लेकर गॉव-कस्बों के बाजार आम से पटे पड़े हैं। हर साल तराई क्षेत्रों से आने वाला आम पहाड़ी इलाकों में भी प्रचुर मात्रा में बिकता है। ऐसा नहीं है कि पहाड़ी इलाकों मेें आम न होता हो। पहाड़ी इलाकों में भी खूब आम होता है, जो अब पक कर बाजार में आने लगा है। पहाड़ी क्षेत्रों की गरम घाटी वाले इलाकों में काफी मात्रा में आम की पैदावार होती है, जिसे लोगों द्वारा बहुत पसंद किया जाता है। अल्मोड़ा जिले के सेराघाट में पैदा होने वाला आम भी लोगों की पहली पसंद है, जो अब पकने लगा है।

यों तो सरयू नदी से लगा हुआ सेराघाट का पूरा क्षेत्र काफी उपजाऊ है। यहां पर धान, गेहूं, सरसों, उड़द, मक्का की अच्छी खासी पैदावार होती है। इसके साथ ही यहां पर आम, केला, अमरूद, पपीता, गन्ना भी काफी मात्रा में पैदा होता है। इन दिनों मैदानी क्षेत्रों से पहाड़ी इलाकों में आने वाला आम 30 से 40 रुपए प्रति किलो बिक रहा है। अब मैदानी क्षेत्र के आम को टक्कर देने के लिए सेराघाट का आम भी आने लगा है। यह 20 से लेकर 25 रुपए प्रति किलो बिक रहा है।

सेराघाट के सल्युड़ी , ल्ïवेटा, ढानखेत, पभ्या, बालीबगड़, नाली, कुंजकिमौला, सल्ïला भाटकोट समेत इस क्षेत्र के दर्जनों गांवों में आम की अच्छी फसल होती है, जो लोगों के आय का श्रोत भी बनती है। सल्युड़ी गॉव के रहने वाले बिशन सिंह बोरा बताते हैं कि उनके गांव में पैदा होने वाले दशहरी, कलमी, बम्बईया आम लोगों की पहली पसंद है जिसकी अच्छी मांग रहती है। साथ ही अचार वाले आम की भी बहुत मांग रहती है। बताते हैं आचार वाले आम  का के पेड़ों में ही ठेका हो जाता है, लेकिन इस साल कोरोना वायरस के डर और लॉकडाउन की वजह से आचार वाले आम के ठेकेदार गॉंव तक नहीं पहुंच पाए।

जागेश्वर धाम में लगने वाले श्रावणी मेले में भी खूब बिकता है सेराघाट का आम

जागेश्वर धाम में हर साल लगने वाले श्रावणी मेले में भी सेराघाट क्षेत्र का आम खूब बिकता रहा है। हालांकि इस साल कोरोना वायरस के चलते श्रावणी मेले का आयोजन भी मुश्किल ही दिखता है। पहले इस मेले को क्षेत्रीय हिसाब से ‘आम केले का मेला’ भी लोग कहा करते थे। तब श्रावण के पूरे महीने में सेराघाट क्षेत्र से आने वाले  आम-केले खूब बिकते थे।

उन दिनों यह क्षेत्र मोटर मार्ग से वंचित था, फिर भी लोग घोड़ों, खच्चरों से या फिर आम की डलियों को सिर पर रखकर पैदल ही चलकर जागेश्वर धाम में लगने वाले श्रावणी मेले में आम बेचने पहुंचते थे। अब जबकि नैनी से सेराघाट तक कच्चा मोटरमार्ग बन चुका है, इससे फलपट्टी वाले इस क्षेत्र के दर्जनों गांवों को इसका लाभ भी मिल रहा है। इस सड़क को बने हुए करीब आठ-दस साल बीत चुके हैं लेकिन अब भी इस मार्ग का न तो डामरीकरण हो पाया है और न ही सेराघाट को जोड़ने  वाले पुल का निर्माण ही हो पाया है। सड़क पक्की न होने के कारण यहां के काश्तकारों को अब भी बहुत परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।  बारिश में इस कच्चे मोटर मार्ग पर वाहनों का चल पाना मुश्किल हो जाता है ।

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