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देखिये क्या -क्या है कालाढूंगी के जिम कॉर्बेट म्यूजियम में

By Aashish pandey

कालाढुंगी में स्थित  कॉर्बेट संग्रहालय एक महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल है। यह प्रसिद्ध ब्रिटिश शिकारी व पर्यावरण प्रेमी जिम कॉर्बेट का विरासत बंगला है। इस संग्रहालय में जिम कॉर्बेट का व्यक्तिगत सामान, उनके पत्र , वस्तुएँ और  फोटोग्राफ रखे गए हैं।

एडवर्ड जेम्स कॉर्बेट को दुनिया जिम कॉर्बेट के नाम से जानती है । जिम कॉर्बेट का जन्म 25 जुलाई 1875 को नैनीताल में हुआ था। जिम क्रिस्टोफर व मेरी जेन कॉर्बेट की आठवीं संतान थे। जिम का बचपन नैनीताल में बीता और उन्होंने अपनी शिक्षा भी यहीं से प्राप्त की । जिम सर्दियों का मौसम कालाढूंगी में तथा गर्मियां नैनीताल में बिताते थे । ये दोनों स्थान प्रकृति के अत्यंत निकट थे और इस बात ने जिम को बहुत प्रभावित किया एवं उन्हें वनों और वन्यजीवों से गहरा लगाव हो गया।

उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद जिम ने पहले रेल विभाग में और उसके बाद सेना में काम किया । बाद जिम पुनः नैनीताल व कालाढूंगी लौट आये, उनके जीवन का यह समय उनकी पुस्तकों में विस्तार से दर्शाया गया है। जिम एक अच्छे शिकारी प्रकृतिविद व लेखक तो थे ही साथ ही वे एक साधारण व दयावान व्यक्ति भी थे।

जिम अविवाहित  थे और  अधिकाँश जीवन अपनी बहन मैगी के साथ बिताया । मार्गेट कॉर्बेट जो मैगी नाम से जानी जाती थी। जिम से एक साल बड़ी थी। मैगी केवल जिम की बड़ी बहन ही नहीं बल्कि उनकी  घनिष्ठ सहयोगी भी थी। वृद्धावस्था में जिम और मैगी एक दूसरे पर बहुत निर्भर रहे और उन्होंने अधिकाँश समय नैनीताल व कालाढूंगी में बिताया। मैगी भी जिम कॉर्बेट की भाँति एक प्रकृति प्रेमी थी। पक्षियों में उसकी विशेष रुचि थी और वह घर पर अक्सर उन्हें दाना डालती।

मैगी स्वभाव से शाँत व गंभीर थी, सामाजिक कार्यों में काफी योगदान देती थी।साथ ही मैगी बच्चों को पियानो सिखाया करती थी। सन् 1963 में 89 की आयु में मैगी का देहान्त हो गया। उन्हें जिम की कब्र के पास दफनाया गया।

जिम कॉर्बेट के लिए जंगल  घर के समान था। उन्हें वनों के जीवन का इतना अनुभव था कि वे जंगल के संकेतों से ही यह भाँप लेते थे कि वहाँ क्या गतिविधियाँ घटित हो रही हैं। जिम की इस कला ने उन्हें कई आदमखोर बाघों व तेंदुओं पर विजय पाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। धीरे.धीरे कॉर्बेट ने इतनी ख्याति प्राप्त कर ली कि दूरदराज के गाँवों से लोग आते और उनसे आदमखोरों के प्रकोप से मुक्ति दिलाने का आग्रह करते। इस कार्य के लिए कॉर्बेट को कठिन परिस्थितियों में ऊँचे पहाड़ों पर पैदल चलना पड़ता और धैर्य व चौकन्नी निगाह से काम लेना पड़ता। अपने जीवन में कॉर्बेट ने लगभग 50 बाघों व 250 तेंदुओं का संहार किया।

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