Dollar connection of hardcore thinking
देश दुनिया

कट्टर सोच का डॉलर कनेक्शन…

By Sanjay Bisht, Noida 

क्या आपको लगता है कि धर्म के नाम पर खून खराबा करने वाले, आतंक फैलाने वाले काफी सात्विक प्रवृत्ति के होते होंगे, उन्हें दीन, दुनिया और डॉलर से कोई मतलब नहीं होता होगा, वो हर वक्त ऊपर वाले की इबादत करते होंगे और बाकी बचा समय अपने धर्म की रक्षा के लिए कुर्बान होने में लगाते होंगे। अगर आप ऐसा सोचते हैं तो बिल्कुल गलत हैं क्योंकि धार्मिक तौर पर आतंक फैलाने वाले लोग वैसे ही हैं जैसे कोई बिजनेसमैन।

धर्म के नाम पर दुनियाभर में अब तक जितनी भी तंजीमें बनी हैं, उनका मकसद पैसे, संपत्ति, अकूत दौलत जमा करना रहा है। वो खुद को धर्म के नाम पर चलने वाला पाक बंदा कह सकते हैं लेकिन वो हर वक्त ऐसे त्रिशंकु के रूप में होते हैं जिनके ऊपर भगवान होता है और नीचे डॉलर…जरा उदाहरण से समझते हैं… 1200 ईसवी में आईबेरिया यानी स्पेन और पुर्तगाल के बीच के प्रायद्वीप और उत्तरी अफ्रीका के मुसलमानों के खिलाफ ईसाईयों का धर्मयुद्ध चला, जिसे क्रूसेड कहा जाता था।

ईसा मसीह के अनुयायियों ने और अल्लाह के अनुयायियों ने हजारों की संख्या में एक दूसरे की हत्याएं की। ये खून ईसा और अल्लाह के रसूख को ऊपर रखने के लिए बहाया गया। बाद में ईसाइयों का वर्चस्व बढ़ने पर उन्होंने मस्जिदों को ध्वस्त किया और उन पर चर्चों को खड़ा कर दिया…इसके अलावा उन्होंने सोने और चांदी के सिक्के जारी किए, जिन पर क्रॉस का निशान बना था।

ईसाईयों ने मुस्लिमों से व्यापार करने के लिए एक नया सिक्का भी ढाला जिसका नाम मिलारेस था, जिसमें अरबी लिपि में लिखा था कि ‘अल्लाह के अलावा और कोई खुदा नहीं है और मोहम्मद अल्लाह के पैगंबर हैं’। इन सिक्कों के लिए कैथालिक बिशपों तक में दीवानगी थी, वो इन्हें खुशी खुशी स्वीकार करते थे। वहीं, उत्तरी अफ्रीका में मुसलमान व्यापारियों ने ईसाई सिक्कों का इस्तेमाल करते हुए कारोबार किया। जिन मुस्लिम राजाओं ने ईसाईयों के खिलाफ जिहाद किया था, वो इन सिक्कों को बड़े पैमाने पर जमा करते थे। अगर वो सच में अपने अपने धर्मों के सच्चे सिपाही होते तो गैर धर्म के सिक्कों को हाथ तक नहीं लगाते लेकिन वो सांप्रदायिक तौर पर क्रूर थे, इसलिए उन्हें एक दूसरे के भगवानों से गुरेज था लेकिन एक दूसरे के सिक्कों से नहीं। दरअसल धर्म का इस्तेमाल सत्ता तक पहुंचने के लिए होता आया है, इसीलिए धर्म के गूढ़ रहस्यों को समझने वाले मंदिर, मस्जिद, चर्चों में पाए गए और धर्म का इस्तेमाल करने वाले या तो शासक, तानाशाह बन गए या फिर बड़े बड़े व्यापारी। अब जरा अपने देश में भी नजर दौड़ाईए, सरकारी जमीनों, ग्रीन बेल्ट, सड़क के बीचों बीच जो मंदिर, मस्जिद, दरगाह नजर आते हैं क्या वो भक्ति के चरम के बाद पैदा हुए निशान हैं?????? जरा पता कीजिए इन मंदिर, मस्जिद, दरगाहों के मालिक कौन हैं..मेरा दावा है, कोई माफिया, कोई नेता, कोई बिजनेसमैन, कोई बाहुबली, कोई धनपशु ऐसे धार्मिक केंद्रों के मालिक होते हैं।

बात सिर्फ इतनी ही नहीं है, दुनिया में जो रूप आतंकवाद का है, उस रूप के पीछे भी डॉलर प्रेम ही है। ओसामा बिन लादेन और अल बगदादी जैसे आतंकवादी भी ऐसे दोहरे चरित्र में जिए की आप सोच कर दंग हो जाएंगे। उनकी जुबान पर अल्लाह का नाम था और दिमाग में डॉलर के लिए दीवानगी। अमेरिकी जांचकर्ताओं को पता लगा कि आईएस सरगना बगदादी ने 25 मिलियन यूएस डॉलर इराक के अल-अनबर रेगिस्तान में दबाकर रखा हुआ था। ओसामा बिन लादेन और उसके मुजाहिदीन दुनिया के किसी भी कोने पर अपहरण का अमाउंट डॉलर में ही लेते थे। लादेन के मारे जाने के बाद कई डी-क्लासिफाईड लेटर सामने आए, जिनमें से एक मेमो से ये साफ हुआ कि लादेन ने अफगानिस्तान के एक राजदूत के अपहरण के बदले पांच मिलियन अमेरिकी डॉलर लिए थे। बाद में वैश्विक मंदी को देखते हुए,, इस पैसे के बदले उसने सोना खरीदने का हुक्म दिया था। धर्म की कट्टर व्याख्याएं निजी स्वार्थों के लिए हुई हैं। इन कट्टर सोचों से लोगों को बरगलाया गया है…उनके हाथों में बंदूक दी गई है और इन बंदूकों से डॉलर की खेती की गई है। तो दोस्तों अगली बार आपको कोई धर्म के नाम पर भड़काए तो उसके इरादों को समझिए। सच्चे धर्म की खोज जरूर कीजिए, उसके लिए हिमालय की कंदराओं पर जाने की जरूरत नहीं है, सच्चा धर्म आपके अंदर ही है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और इंडिया टीवी में काम करते हैं।

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