न्यूज़

कोरोना काल में हेम हमारे बीच में होते तो…

हेम 90 के दशक के छात्र नेता और बेहतरीन इंसान थे। वह आईसा, पीएसएफ और किसान संगठन में सक्रिय रहे। उनकी दोस्ती का दायरा बड़ा था। अगर आप इस युवा से उस दौर मिले हों तो उसकी बातों और उसके साथ बिताए पलों को भूल नहीं सकते हैं। उसमें अपने समाज के लिए काम करने जज्बा था। उसकी आंखों में सामाजिक बदलाव का सपना था। तभी तो अपने जीवन को बेहतर बनाने के बजाय सबके जीवन की बेहतरी की राह को उसने चुना। वह आज जिंदा होते तो समाज के लिए बहुत कुछ कर रहे होते। क्योंकि एक राजनीतिक संगठनकर्ता हजारों के बराबर होता है। हेम पर दो किताबें भी प्रकाशित हुई हैं जिसमें से एक किताब फ्रेंच में है। आइए अपने इस साथी को याद करते हैं। हेम के बारे में बता रहीं हैं उनकी पत्नी, दोस्त बबीता उप्रेती।

By Babita Upreti 

आज हेम को गये एक दशक पूरा हो गया है, इस एक दशक में कई बड़ी  घटनाओं के हम गवाह बने हैं। इनमें सबसे बड़ी घटना महामारी कोविड-19 (कोरोनावायरस) है। यदि आज हेम होते तो वह महामारी से पीड़ित लोगों की मदद कर रहे होते। सरकार की गलत नीतियों के चलते जान गवां रहे गरीब, मजदूर, किसानों के पक्ष में आवाज उठाते। महानगरों से गांव लौटे युवाओं के सवाल पर वह जरूर सोच रहे होते और उनके बीच जाते उनसे देश दुनिया की चर्चा करते। घर लौटने पर मुझ से भी इन सवालों पर बात करते।

इससे आगे की बात करें तो हेम अपने लेखों से नौजवानों को बताते कि उनका भविष्य केवल सोशल मीडिया तक ही सीमित नहीं है बल्कि इससे बाहर भी एक दुनिया है जो उनका इंतजार कर रही है। निश्चय ही हेम लोगों के बीच में उनके साथ-साथ होते और वह जितना कर सकते अपनी क्षमता से बहुत ज्यादा करते।

चाहते तो वह प्रोफेसर बन सकते थे या फिर अच्छे पत्रकार

हेम एक सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता थे, वह ईमानदार थे। वामपंथी संगठन को चलाने के लिए जो गुण होने चाहिए वो सब हेम में थे। चाहते तो वह प्रोफेसर बन सकते थे या फिर अच्छे पत्रकार भी मगर उन्होंने सामाजिक बदलाव की राह चुनी। छात्र आंदोलनों का हिस्सा बने, किसान-मजदूरों के आंदोलन में भी शामिल रहे। हेम में लोगों को संगठन में जोड़ने का जबर्दस्त कौशल था। मजदूर- किसान हों या फिर बुद्धिजीवी हर तरह के लोगों से उनकी मित्रता थी। वह जब भी दोस्तों से मिलने जाते उनके मनपसंद विषयों की किताबें भी उनके लिए ले जाते थे।

आज जनवादी आंदोलन पूरी तरह से बिखरा हुआ है। दुनिया की बेहतर समझ रखने वाली ताकतें खुद गोलबंद नहीं हो पा रही हैं और लोगों को बेहतर रास्ता नहीं दिखा पा रही हैं। जनता में आक्रोश तो बहुत है पर यह आंदोलन में बदलने के बजाय सोशल मीडिया में मनोरंजन का काम कर रहा है। ऐसे दौर में हेम के रास्ते पर चल रहे संगठनकार्ता युवाओं की भूमिका बढ़ जाती है।

पहली मुलाकात में प्रेमचंद की किताब दी

हेम से मेरी मुलाकात पिथौरागढ़ डिग्री कालेज में हुई थी। पहली मुलाकात में वह मेरे लिए  प्रेमचंद की बेहतरीन किताब ‘गोदान’ लाये थे। धीरे-धीरे हमारी दोस्ती गहरी होती गयी। हमने एक दूसरे को समझा और शादी की। हेम पीएचडी कर रहे थे, एक तरफ करियर था, दूसरी ओर सामाजिक काम। उन्होंने पीएचडी और करियर को तबज्जो देने के बजाय जनता के लिए काम को अहमियत दी। उनके निर्णय और विचारों से मैं भी सहमत थी।

हम दोनों बदलाव के कारवां में शामिल होने निकल पड़े। मैं हेम के साथ जिनता वक्त रही। यह पल शानदान था, हमने अपने परिवार और निजी जिंदगी के लिए सपने नहीं बुने बल्कि हमारी चर्चाओं के केन्द्र में गरीब लोग और देश दुनिया के हालात रहे। अल्मोड़ा में रहते हुए हेम किसानों के लिए काम कर रहे थे तो मैं खर्चे चलाने के लिए छोटे मोटे काम के साथ महिलाओं को संगठित करने लगी। हमारी शादीशुदा जिंदगी आम लोगों से अलग थी। पैसा कमाना, घर बनाना, अपना परिवार इससे बढ़कर हम सामाजिक जीवन का सपना बुन रहे थे।

labour uinty

पसंद नापसंद अलग-अलग होते हुए भी हम एक साथ थे

हेम में ईमानदारी कूट कूट कर भरी थी, लालच से दूर, दूसरों की समस्याओं को दूर करने के लिए वह तत्पर रहते थे। इससे भी ज्यादा वह अपने राजनीतिक विचारों में कायम रहने वाले इंसान थे। हेम के यही सब गुण उसे प्रिय बनाते थे। दोनों की पसंद नापसंद अलग-अलग होते हुए भी हम एक साथ थे। जो हमें एक करता वो था हमारा समाज के लिए कुछ करने का जज्बा।

एक बार मैं अपने घर से एक हफ्ते बाद लौटी तो कमरे में बेड के नीचे एक पत्र पड़ा था। खोलकर देखा तो उसमें सिर्फ इतना ही लिखा था कि मैं तुम्हारे बिना चल तो सकता हूँ पर दौड़ नहीं सकता। ये था हेम का मेरे प्रति प्यार। बिना बोले वह कई बार बहुत कुछ कह जाता था और मैं समझ जाती थी। उसको मेरी बहुत चिन्ता थी। वह जानता था कि उसके बिना नहीं रह पाउंगी। इसलिए वह अपना प्यार भी ज्यादा नहीं जताता था। वह कहता था तुम सीधी हो, लोग बहुत तेज हैं। तुम अपना ज्ञान बढ़ाओ, आगे बढ़ो।

महिलाओं की आजादी की पहली सीढ़ी ही उनकी आत्मनिर्भरता

उसकी हर चीज़ का मैं ध्यान रखती थी। कई बार वह मुझ पर गुस्सा हो जाता था कि तुम इतना ध्यान मत रखा करो। हम दोनों जितना भी साथ रहे आत्मनिर्भर रहे, हमने बेहतर समाज के लिए सोचा और यही हम दोनों को पसंद था। वह हमेशा कहता था कि महिलाओं की आजादी की पहली सीढ़ी ही उनकी आत्मनिर्भरता है। शादी के बाद  मैंने नैनीताल समाचार और समयांतर पत्रिका में लिखना शुरू किया । पत्रकारिता के साथ ही मैं सामाजिक कामों में भागीदारी भी करने लगी।

कुछ लोगों ने मुझे यह अहसास दिलाया कि हेम की राजनीतिक समझदारी मुझसे बहुत ज्यादा थी। इस बात से कौन इंकार करेगा कि हेम का मार्क्सवादी ज्ञान मेरे से बहुत अधिक था। लेकिन इस बात का अहसास हेम ने कभी नहीं कराया। वह कहते थे ‘आदमी के भीतर बेसिक ईमानदारी होनी चाहिए’  और वो मेरे अंदर है।

हेम का व्यवहार मेरे लिए बराबरी का था। वह मेरी चीजों का हमेशा सम्मान करता था। हेम जितना भी मेरे साथ रहा वो रिश्ता एक बेहतर दोस्त की ही तरह था। हां मेरी भी कुछ अपेक्षाएं जरूर उससे होती थी। वो भी केवल इतनी कि कभी फिल्म देखने चलें या कभी घूमने।  पर इसके लिए भी उसके पास समय नहीं था।

सोचा नहीं था वह मुझे इतनी जल्दी छोड़ कर चल देगा

कभी सोचा भी नहीं था कि जिस हेम के बिना मैं एक पल भी नहीं रह सकती हूँ, वह मुझे इतनी जल्दी छोड़ कर चल देगा। आज भी यह सोचने में बहुत तकलीफ़ होती है कि उसे कैसे मारा होगा। इतने सालों में मैंने यह कभी नहीं सोचा और न मैं सोचूंगी। अगर मैं सोचूंगी तो निश्चय ही मैं परेशान हो जाऊँगी। क्योंकि मैं उससे बहुत प्यार करती हूं और उसकी परेशानी मैं उससे ज्यादा परेशान हो जाती थी। फिर मैं कैसे सोचूं कि कितनी बेरहमी से उन्होंने मेरे हेम को मारा होगा। कितनी तकलीफ उन्होंने मेरे हेम को पहुँचाई होगी यह सब सोच कर भी मेरी रूह आज भी कांप उठती है।

हेम जीवनसाथी के रूप में नहीं होते तो…

समाज में जब चारों तरफ नजर दौड़ाती हूँ तो अधिकांश औरतों को देखती हूँ कि दिनरात घर में काम करने के बाद भी उनके के पास न अपने लिए समय है और न ही अपनी इच्छाओं के लिए ।  उसके घरेलू काम का कोई सम्मान भी नहीं है। वह जीवन भर दूसरों की इच्छाओं को ही पूरा करने में लगी रहती हैं । तब सोचती हूँ अगर हेम जीवनसाथी के रूप में नहीं होते तो मैं कौन सी भूमिका में होती।

यह हेम की ही संगति का असर था कि मैं भी उससे बहुत कुछ खीख पाई। उसे जब भी देखा लिखते पढ़ते ही पाया। अख़बारों में उसके लेख लगातार छप रहे थे। वह मुझे पढ़ने और उन्हें सुधारने के लिए देता था। मैं उससे कहती तुम राजनीतिक मुद्दों पर लेख क्यों नहीं लिखते हो तो उसका एक ही जवाब होता राजनीतिक मुद्दों पर तो बहुत से लोग लिख रहे हैं। मुझे ऐसे विषयों को छूना चाहिए जिनके लिए मुख्यधारा के मीडिया में जगह नहीं है। इसलिए उसने कृषि से संबंधित लेख लिखने शुरू किये।

हेम पर शानदार किताब ‘विचारधारा वाला पत्रकार’

हेम की मौत की ख़बर पर  केवल जनवादी लोगों ने नहीं बल्कि अलग -अलग राजनीतिक संगठनों के लोगों ने दुख जताया। उन्होंने फर्जी मुठभेड़ में हत्या की निन्दा की।उत्तराखण्ड से लेकर दिल्ली, आन्ध्रप्रदेश के पत्रकार, जनवादी लोग और उसके वैचारिक साथी और हमारे परिवार के साथ खड़े रहे। हेम के जाने के बाद उस पर एक शानदार किताब निकली ‘विचारधारा वाला पत्रकार’ । किताब में उत्तराखण्ड के तमाम जनवादी लोगों ने लेख लिखे हैं। निश्चय ही यह किताब हेम की सामाजिक, राजनीतिक विचारधारा, उसका व्यवहार, उसकी आदतें, अच्छाई, उसका जनता के लिए प्रेम सब कुछ है। इस किताब से बेहतर विश्लेषण हेम का नहीं हो सकता।

हेम जाने के बाद मेरे सामाजिक, राजनैतिक,  वैचारिक दोस्त मेरे साथ मेरे हर दुख में खड़े हुए। यही कारण था कि हेम के जाने के बाद न मैं टूटी और न ही बिखरी बल्कि मैं खड़ी हुई और आत्मनिर्भर बनी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *