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अपनी बात

देश के सरकारी स्कूलों में शिक्षा की दयनीय स्थिति

By Dr. Harish Chandra Andola

केंद्र एवं राज्य सरकारों की उदासीनता के कारण स्वतंत्रता के 70 वर्ष बाद भी देश के आम लोग अच्छी और सस्ती स्तरीय शिक्षा तथा चिकित्सा के लिए तरस रहे हैं। भारत जैसे विकासशील देशों में प्रगति का एकमात्र माध्यम शिक्षा ही हो सकता है और इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए वर्ष 2009 में भारत में ‘राइट टू एजुकेशन’ का प्रावधान किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य पूरे भारत में शत-प्रतिशत साक्षरता प्राप्त करना है और इसके लिए 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य की गई है परंतु अधिकांश स्कूलों में बुनियादी ढांचे का अभाव है और अनेक सरकारी स्कूलों की अपनी इमारतें तक नहीं हैं।

देवभूमि कहलाने वाला पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड ‘स्कूल एजुकेशन क्वालिटी इंडेक्स’ रिपोर्ट में दसवें पायदान पर है, जो सरकारी स्कूलों में इसकी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में कमी को दर्शाता है। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति और भी चिंताजनक है। जहां कुछ क्षेत्रों में स्कूल भवन पढ़ाने लायक नहीं हैं, तो कहीं शिक्षकों के पद खाली हैं। सरकारी स्कूलों की चरमराती व्यवस्था के कारण ही अभिभावकों का रुझान प्राइवेट स्कूलों की तरफ बढ़ने लगा है। कम आमदनी के बावजूद मां बाप अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में दाखिला दिलाने को तरजीह दे रहे हैं।

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एक गैर सरकारी सर्वे के अनुसार 35 प्रतिशत अभिभावक अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए निजी स्कूलों का विकल्प चुन रहे हैं। वर्ष 2006 में निजी स्कूलों में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों का प्रतिशत 20 से बढ़कर 2018 में 33 प्रतिशत हो गया है। उत्तराखण्ड के सरकारी स्कूलों से वर्ष 2014 से 2018 के मध्य 1.5 लाख विद्यार्थियों ने निजी स्कूलों में पलायन किया है। 13 जिलों के 1689 प्राथमिक स्कूलों के 39000 विद्यार्थी एकल शिक्षकों की कृपा से चल रहे हैं।

राज्य में छात्र शिक्षक के अनुपात में बहुत बड़ा अंतर है। वर्तमान में निजी एवं सरकारी स्कूलों के ढांचागत शिक्षा में भी बहुत बड़ा अंतर है। खासकर अंग्रेजी भाषा की महत्ता के मामले में अभिभावक निजी स्कूलों का रुख कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि सरकारी स्कूलों की अपेक्षा प्राइवेट स्कूल में प्राइमरी स्तर पर ही अंग्रेजी बोलने पर ज़ोर दिया जाता है, जो भविष्य में बच्चों को रोज़गार दिलाने में सहायक साबित होगा।

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निजी स्कूल और सरकारी स्कूलों के विद्यार्थियों की शिक्षा क्षमता का अन्तर भी बढ़ता जा रहा है। 2009 के अनुसार यह 16 प्रतिशत से बढ़कर 2013 में 29 प्रतिशत एवं 2018 में 37 प्रतिशत देखने को मिला है। बात केवल भाषा सीखने तक ही सीमित नहीं हैं बल्कि स्कूल भवन और ढांचागत विकास भी प्रभाव रखता है।   पहाड़ों के प्राइमरी स्कूलों की शिक्षा का स्तर अब बहुत गिर चुका है। किसी जमाने में पुराने तरीकों से पढ़ाई करने में उनकी गणित मजबूत होती थी। 20 तक के पहाड़े बच्चों को कंठस्थ होते थे। उन्हें किसी कैल्कुलेटर की जरूरत नहीं पड़ती थी। लेकिन अब पढ़ाई के स्तर में आये बदलाव से सरकारी स्कूलों के अध्यापकों के लिए ऐसे कोई रिफ्रेशर कोर्स नहीं हैं, जिससे वे बच्चों को सही तालीम की ओर रुझान पैदा करवा सकें।

बच्चों की पढ़ाई भी मां-बाप की चिंता का विषय है इसलिए पहले की तरह पत्नियों को घर पर गांव में छोडऩे का रिवाज भी समाप्त हो गया है। इसके कारण गांव की चहल पहल भी जाती रही। बहरहाल सरकार को नीतियों में सुधार करने की आवश्यकता है। निजी स्कूलों की अपेक्षा सरकारी स्कूलों को सभी अनुदान दिए जाते हैं। बजट में शिक्षा के लिए विशेष राशि आवंटित की जाती है। इसके बावजूद अभिभावकों का निजी स्कूलों की तरफ रुख करना इसकी लचर व्यवस्था को दर्शाता है। ज़रूरत इस बात की है कि सरकार इन स्कूलों के मॉडल में सुधार करे। एक तरफ जहां प्राइवेट स्कूलों की तर्ज़ पर भवनों को तैयार किया जाय वहीं शिक्षकों की गुणवत्ता पर भी ध्यान दिया जाये। इसके अतिरिक्त प्राथमिक स्तर से ही अंग्रेजी विषय पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है।

वहीं स्कूली शिक्षा में आधुनिक शैक्षणिक पहुलओं एवं प्रतियोगी परीक्षाओं को पाठ्यक्रम में शामिल करने की आवश्यकता है। वर्तमान समय में कंप्यूटर हमारे दैनिक जीवन का एक हिस्सा बन गया है।  हमारी पीढ़ी इससे वंचित न रहे इसलिए ज़रूरी है कि कम्यूटर की मूल बातें प्राथमिक स्तर से ही पाठ्यक्रम में शामिल किए जाएं।

वास्तव में सरकारी स्कूलों के मॉडल में सुधार की आवश्यकता है। कई स्कूलों में सुधार आया है लेकिन कई जगह अब भी सुधार की गुजाइंश बाकी है। इसकी शुरुआत प्राथमिक स्तर से ही की जानी चाहिए क्योंकि मज़बूत नींव पर ही सशक्त भवन तैयार किया जा सकता है।  इसके लिए सरकारी स्कूलों में अध्यापन तथा अन्य स्टाफ की कमी को पूरा करने, सरकारी स्कूलों के लिए पर्याप्त इमारतों की व्यवस्था करने, जर्जर इमारतों की मरम्मत तथा बुनियादी सुविधाओं में सुधार करने, शौचालय बनवाने तथा अध्यापकों को जवाबदेह बनाने की आवश्यकता है तभी देश में शिक्षा का अधिकार सही अर्थों में लागू किया जा सकेगा और शिक्षा का स्तर ऊंचा उठ सकेगा।

इसके साथ ही सभी सरकारी जनप्रतिनिधियों, नेताओं तथा कर्मचारियों के लिए यह अनिवार्य किया जाए कि वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में ही पढ़ाएं तभी इनकी हालत में कुछ सुधार होगा। कोरोना संक्रमण के बावजूद शिक्षा बाधित हुई है। इसलिए किसी भी परिस्थिति में किसी भी सूरत में बच्चों का साल बर्बाद नहीं होना चाहिए। जीवन के लिए शिक्षा जरूरी है, इसे किसी भी हालत में रोकना नहीं चाहिए।

दूरदराज के क्षेत्रों में जहां कोई कनेक्टिविटी नहीं है और कोरोना का प्रकोप नहीं है, सामाजिक दूरी के नियमों का पालन करते हुए स्कूलों को शुरू किया जाना चाहिए, जहां पर स्कूल शुरू करना मुश्किल है, अन्य विकल्प और साथ ही ऑनलाइन शिक्षा शुरू की जानी चाहिए। जो ज्ञान छात्र ने आठ वर्षों तक हासिल नहीं किया, वह एकाएक नवीं कक्षा में कैसे आ सकता है? निचले स्तर पर रही कमियों के लिए आखिर नवीं, दसवीं, ग्यारहवीं व बारहवीं के अध्यापकों को ही कैसे दोषी माना जा सकता है? प्राथमिक स्तर की नाकामियों की जांच क्यों नहीं की जाती? प्राथमिक स्तर पर ये क्यों नहीं जांचा जाता कि छात्र का वास्तव में क्या ग्रेड चल रहा है?

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बात एक विद्यालय के परिणाम की नहीं है। यह परिणाम बहुत बड़ी चेतावनी दे रहा है और मौजूदा शिक्षा प्रणाली पर प्रश्न चिन्ह लगाता है। वास्तविकता यह है कि अधिकतर स्कूलों में या तो नवीं व इससे अगली कक्षाओं के परिणाम खराब आ रहे हैं या फिर जैसे-तैसे उन्हें अच्छा दिखाया जा रहा है। आंकड़ों व गुणवत्ता की इस जद्दोजहद में न आंकड़ा सही आ रहा है और न गुणवत्ता दिखाई दे रही। ऐसा लगता है कि शिक्षा प्रयोगों के दलदल में उलझ कर रह गई है। अभिभावक, सियासतदां, नौकरशाह सभी की निगाहें अध्यापकों की तरफ  हैं और फिर शुरू हो जाता है, एक-दूसरे पर गलतियों का ठिकरा फोड़ने का संघर्ष। इस ‘मैं न मानूं’ वाली कशमकश में सबसे ज्यादा नुकसान उठाने वाला मोहरा बच्चा बनता है। इस खेल में अंदाजा लगाना मुश्किल है कि यह खेल कब रुकेगा।

इतनी इल्तजा जरूर हमारे सत्ता तंत्र की ओर से शिक्षा के निजीकरण का एक बहुत ही नियोजित अभियान चलाया गया और मंहगे कॉरपोरेट तरीके के प्राइवेट स्कूलों के अलावा हर शहर की गलियों में भी निजी विद्यालय खुल गए हैं। शिक्षा, बाज़ार में खरीदी जाने वाली एक जींस की तरह बन गई। जिसके पास जिस भाव की शिक्षा खरीदने की आर्थिक क्षमता है, वह अपने नौनिहालों को उस स्तर की शालाओं में दाखिला कराकर अपने सुरक्षित भविष्य के सपने देखने लगा। सार्वजनिक शिक्षा को एक समान शिक्षा की दिशा में आगे बढ़कर ही बचाया जा सकता है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का लक्ष्य तब तक हमसे दूर रहेगा, जब तक हम सबके लिए एक समान, नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार के लिए अभियान नहीं चलाएंगे।

इस लेख में दिए गए विचार लेखक के हैं। लेखक द्वारा उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर का अनुभव प्राप्त हैं, वर्तमान में दून विश्वविद्यालय में कार्यरत हैं। 

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