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कैसे भूल सकते हैं जननी को हम….

जननी यानी मां को समर्पित कुछ पंक्तियां…

By Santosh kumar Mishra

 

जननी

हे प्रथम अवलंब धरा की

हो तुम स्वयं धरा ही।

तन के त्रिन् का कब मोल किया

तनय तान्या पर सब वार दिया।

दुख सुख का अवमूल्यन कर

कल्पना के कुछ प्रसून लिए

सह दुर्दिन के ताने बाने

शैशव को आकर दिए।

सह धूप छाव, प्रश्तर पर चल

ऋषि बनी रही तुम एक अचल।

हे मां! है शब्द नहीं! वलय नहीं!

अरुणोदय से अरुणोदय तक

सूत्राधार बनी रहती हो।

तनया, सखी और भार्या जैसी

भावों की लड़ियां बुनती हो।

पर जब पद थक जाते

तुम शयन हेतु अकुलाती हो।

भ्रूण में शिशु के पद चापों से

सारे कष्ट भुलाती हो।

हे मां, वेद शास्त्र की प्रतिमा

हम एक छंद है तेरी लय के।

तुम मधुरिम गायन पूर्ण प्रकृति की

हम वीना के एक तार सही।

पर क्या हो जाता हमको है

भूल हम जाते जननी को?

वह प्रेम प्रकट करती रहती

हम वृथा भुलाते अपने तन को।

स्वार्थ परायण हो जग में

बस द्रव्य के पीछे भागा करते।

मां के उस लालन पालन को

हम यूं ही भुलाते पल भर में।

उदर स्वय का रीता रख

भरण करती नवजीवन का

मां तो बस मां ही होती है

छाया है वह महा समर की

कुत्सित हो यदि सुत सुता

गले लगाती है फिर भी

तिरस्कृत हो कर बार बार भी

ममता दिखलाती है फिर भी।

संतोष कुमार मिश्र, सहायक प्राध्यापक, अंग्रेजी, साहू जैन पी जी महाविद्यालय बिजनौर, उत्तर प्रदेश

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