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कोरोना के बाद जीवन को रफ्तार से आगे बढ़ाने की चुनौती

By G D Pandey

मौजूदा वैश्विक परिदृश्य इस आशय का बोध करा रहा है कि विश्व के अभी तक आविर्भूत समस्त  सामाजिक-आर्थिक व्यवस्थाओं के पटाक्षेप की परिस्थितियां परिपक्व हो चुकी हैं और एक नया वैश्विक परिदृश्य अपनी झलक दिखाने लगा है। वर्तमान समय को कोरोना काल कहने में कहीं कोई हिचक नहीं है। इस समय भारत समेत पूरे विश्व में कोरोना वायरस के खिलाफ जंग में विजय प्राप्त करना ही एकमात्र एजेंडा है। 

तेज रफ्तार से आगे बढ़ने की चुनौती :
विश्व के तेजी से बदलते परिदृश्य में कोरोना काल के बाद भारत जैसे विशाल और तकरीबन 135 करोड़ की आबादी वाले मेहनतकश बाहुल्य देश में जीविकोपार्जन के लिए तेज रफ्तार से आगे बढ़ने की चुनौती अन्य किसी चुनौती से कम नहीं है। एडवांस टेक्नोलॉजी, डिजीटल व्यवस्था तथा नये वर्क कल्चर के दौर में मौजूदा शासक वर्ग सत्ता में काबिज रहने तथा अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए समाज में विशेषाधिकार प्राप्त तबके के खासकर आईआईटी, आईआईएम जैसे विशेष संस्थानों से आधुनिकतम तरीके से प्रशिक्षित पेशेवरों तथा कुछ आईएएस नौकरशाहों से काम चला लेगा। सवाल तो करोड़ों मेहनतकश, मजदूरी करने वालों, निम्न मध्यमवर्गीय तबके के सामान्य रूप से शिक्षित तथा आम जनता के जीवन यापन संबंधी व्यवस्था का है।

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गौरतलब है कि भारत में अभी भी साक्षरता की दर मात्र 74.4 फीसदी है अर्थात 100 में से 26 आदमी आज भी निरक्षर हैं। जिन्हें अभी तक अक्षर बोध ही नहीं है। साक्षरों में से भी बहुतायत संख्या उनकी है जो मात्र पांचवीं, आठवीं या अधिक से अधिक दसवीं कक्षा तक पढ़े हुए हैं। गांव और शहरी बस्तियों में रहने वाले कामगारों के सभी बच्चे देश के कर्णधार कथनी में तो हैं परंतु व्यवहार में नहीं, व्यवहार में तो देश के कर्णधार मुट्ठीभर विशेषरूप से शुरू से ही तैयार किए गए ब्रांडेड बच्चे ही हैं।

इस दोहरे मापदंड की जड़ें मौजूदा समाज व्यवस्था तथा लार्ड मैकाले के समय से बरकरार शिक्षा प्रणाली में धसी हुई हैं। इसलिए तेज रफ्तार से नये ढांचे में ढलने की चुनौती भारत के बहुसंख्यक जन समुदाय के सामने है। ऐसा लगता है कि आने वाला कोरोना काल के बाद का युग उन लोगों की उत्तरजीवित्ता को सुनिश्चित करेगा जो सबसे तेज रफ्तार से नई तकनीक, नये आर्थिक तौर तरीकों तथा नई चुनौतियों को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ेंगे। यहां पर यह कहना भी वस्तु स्थिति से मेल खायेगा यदि आज प्रकृतिवादी दार्शनिक चाल्स डारविन जीवित होते तो वह सरवाइवल आफ द फिटैस्ट की थ्योरी को परिमार्जित करके सरवाइवल आफ द क्विकैस्ट अर्थात सबसे तेज रफ्तार से आगे बढ़ने वाले की उत्तरजीविता की थ्योरी को विश्व के सामने ले आते। अत: संघर्षशील जनमानस को अब अपने संघर्ष की रफ्तार को तेज करते हुए आगे बढ़ाना होगा।

 मेहनतकश वर्ग के सामने बच्चों को शिक्षित कराने की चुनौती:
मेहनतकश वर्ग के अंतरगत मजदूर, निम्न व मध्यम दर्जे के किसान, निम्न मध्यम वर्ग के नौजवान, खेतिहर मजदूर तथा ग्रामीण जन समुदाय आते हैं। यही वर्ग हर दृष्टि से शोषण व उत्पीड़न का शिकार होता है। इनके बच्चों की शिक्षा की जिम्मेदारी समाज व्यवस्था की होनी चाहिए। शिक्षा प्रारंभ से ही सभी बच्चों को एक सी मिलनी चाहिए। विशेषाधिकार व मालिक वर्ग के बच्चों केे लिए अलग तथा मेहनतकश वर्ग के बच्चों के लिए अलग नहीं होनी चाहिए। सारे ही स्कूल एक समान क्यों नहीं होते ? सरकारी व प्रइवेट स्कूलों का दोहरा मापदंड क्यों अपनाया गया है?  इसका उत्तर एक ही है कि हमारी समाज व्यवस्था अभी भी आर्थिक, सामाजिक व शैक्षिक रूप से औपनिवेशिक दासता से मुक्त नहीं हो पायी है इसीलिए तो लार्ड मैकाले ने जो शिक्षा नीति सन् 1835 में तत्कालीन भारत में अंग्रेजी हुकूमत के समय बनायी थी, वह आज भी बुनियादी रूप मे मौजूद है अर्थात 185 वर्षों में उसे मूलभूत रूप से बदलने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी । उस समय लार्ड मैकाले ने भारत में प्रत्यक्ष रूप से अंग्रेजी साम्राज्यवाद के पहियों को चलाने के लिए भारत के कुछ लोगों को क्लर्क का काम करने लायक बनाने हेतु शिक्षित करने मात्र के उद्देश्य से यह शिक्षा नीति लागू की थी ।

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इस शिक्षा नीति में पिछले 185 वर्षों में शासक वर्ग के स्वार्थों की पूर्ति करने हेतु कुछ संशोधन तथा कुछ उच्च तकनीकि शिक्षा संस्थानों का सृजन किया गया लेकिन बुनियादी तौर से मैकाले की शिक्षा नीति को आज तक बदला नहीं गया । इससे यह साबित होता है कि भारत में नव औपनिवेशिक शिक्षा नीति चल रही है। ऐसी परिस्थिति में कोरोना काल के बाद भी मेहनतकश वर्ग के बच्चे शिक्षा और उच्च शिक्षा वैब शिक्षण और आनलाइन शिक्षण की चुनौती का मुकाबला कैसे करेंगे? यह एक विचारणीय विषय है।

लेखक भारत सरकार के आवासन एवं शहरी कार्य  मंत्रालय के प्रशासनिक अधिकारी पद से अवकाश प्राप्त हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेखन और संपादन से जुड़े हैं।

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