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प्रवासी युवाओं की बड़ी संख्या में गांव वापसी से उत्तराखंड में बुलंद होगी रोजगार की मांग

By G D Pandey

जानलेवा महामारी के खतरे से भयभीत सैकड़ों प्रवासी युवा सुरक्षित अपने गांव और परिजनों तक पहुंचने की  ऊहापोह में देश व्यापी लाॅकडाउन लागू होने के दिन अर्थात 25 मार्च से ही पैदल अथवा किसी उपलब्ध जुगाड़ से शहरों से गांवों की ओर कूच कर गए। लाॅकडाउन के चलते बेरोजगार हुए लाखों युवा कामगार उत्तराखंड के विभिन्न जिलों में स्थित अपने गांव पहुंचने के लिए दिल्ली जैसे महानगरों में जद्दोजहद कर रहे हैं। देश में इसी तरह की आपाधापी में करोड़ों मेहनतकश लोग देश के विभिन्न राज्यों में पहुंचने लगे हैं। कुछ विशेष श्रमिक रेलगाड़ियों से, कुछ विशेष बसों से तथा कुछ पैदल चलकर गांव पहुंच रहे हैं। कई कामगार तो 300-400 किमी तक की दूरी पैदल तय करके अपने गांव पहुंच चुके हैं।

उत्तराखंड के प्रवासी कामगार युवा भी हजारों की तादात में येनकेन प्रकारेण अपने-अपने गांव पहुंच रहे हैं। सरकार की ओर से इस संबंध में कुछ विशेष रेलगाड़ियां चलाने का निर्णय तो हुआ है मगर मेहनतकश वर्ग की इस समस्या का भी कोई ठोस समाधान निकालने में सरकारें नाकाम रही हैं। कहने को बहुत आंकड़े पेश किये जा रहे हैं मगर श्रमिकों तथा बेरोजगार हुए अन्य युवाओं की वास्तविक समस्या का आंकलन भी नहीं किया जा रहा है, समस्याओं का समाधान तो दूर की बात है।

हजारों हजार युवा अपने गांव की ओर चल दिये

सैकड़ों की तादात में देश का भाग्य निर्माता मेहनतकश सड़कों पर बेमौत मर रहा है। उनकी जिंदगी की कोई कीमत नहीं है क्या ?

दिल्ली से उत्तराखंड के हजारों हजार युवा कामकार पैदल ही अपने गांव की ओर चल दिये। सरकारों के पास अभी भी मुख्य एजेंडा तो कोविड-19 महामारी से निजात पाने का ही है, परंतु साथ ही साथ शर्मायेदारों के उद्योग धंधे किस तरह आगे चलेंगे, इसके लिए भी शासक वर्ग पुरानी कई नीतियों में संशोधन करने लगे हैं। उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश में श्रमिक कानूनों में कई ऐसे प्रावधान शामिल कर दिये गये हैं जिनसे  मजदूरों के काम पर वापसी का कोई भविष्य नहीं रहा, उनके स्वास्थ्य की कोई गारंटी नहीं, मालिक के कारखाने चलाते हुए अगर कोई उनके साथ हादसा हो गया तो उसमें मालिक वर्ग जिम्मेदार नहीं होगा। पुराने तैयार उत्पादन का कोई मार्केट न मिलने से माल की आपूर्ति की समस्या के चलते मालिक वर्ग अपने नये उत्पादन तथा नये बाजार की तलाश में लग चुका है।

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उत्तराखंड में रोजगार मिल जाता तो गांव खाली नहीं होते

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आगे मजदूर वर्ग के रोजगार का भविष्य मालिक वर्ग के उत्पादन की दशा और दिशा पर निर्भर रहेगा और जितनी कम मैन पावर ( श्रमिक शक्ति) की मालिक वर्ग को आवश्यकता पड़ेगी उतने ही कुशल, अद्र्धकुशल तथा अकुशल श्रमिकों को ठेकेदारी प्रथा अथवा दिहाड़ी के आधार पर रखा जाएगा। जो कंपनी या फैक्ट्री के नियमित श्रमिक थे, उन्हें भी मालिक वर्ग के बाजार के संकट के चलते छंटनी का शिकार होना पड़ेगा। लाॅकडाउन खुलने के साथ ही मजदूर वर्ग द्वारा व्यवहार में यह सब प्रत्यक्ष रूप से देखा जाएगा। अभी तक उत्तराखंड में रोजगार की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। रोजगार के अभाव में तो उत्तराखंड से कुछ शिक्षित, कुछ अद्र्ध शिक्षित तथा कुछ अशिक्षित युवाओं का शहरों की ओर पलायन हुआ था। यदि गांव में अथवा उत्तराखंड में कहीं पर भी राज्य के युवाओं,  अन्य कुछ पेशेवर तथा प्रशिक्षित नौजवानों के लिए रोजगार के समुचित अवसर होते तो वे लोग अपने गांव-घरों से हजारों किमी दूर तक विभिन्न शहरों में रोजगार ढूंढने के लिए दर-दर की ठोकरें नहीं खाते। क्या समाज के सभी लोगों को जीविका चलाने के लिए उनकी योग्यतानुसार उन्हें रोजगार प्रदान करना समाज व्यवस्था का दायित्व नहीं होना चाहिए? यदि होना चाहिए, तो क्यों नहीं है ? इन सवालों पर चर्चा करना, इसके समाधान के लिए संघर्ष करना, शासन प्रशासन से जद्दोजहद करना आज समय की सबसे बड़ी मांग है। यहां पर उत्तराखंड के परिपेक्ष्य में रोजगार के आयामों पर चर्चा के कुछ बिंदु पाठकों के सम्मुख रखने की कोशिश है।

न पलायन रुका और न ही विकसित नहीं हुए रोजगाार के साधन

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उत्तराखंड को प्रथक राज्य बने हुए लगभग बीस वर्ष हो चुके हैं। नवंबर 2000 से दिसंबर 2006 तक उत्तरांचल तथा जनवरी 2007 से राजनीतिक पार्टियों की रजामंदी से उत्तराखंड नाम का यह पर्वतीय राज्य देवभूमि के नाम से भी जाना जाता है। इस पर्वतीय रीजन को तत्कालीन उत्तर प्रदेश राज्य से पृथक करके एवं अलग राज्य बनाने की अवधारणा का केन्द्र बिन्दु था, इस क्षेत्र का चहुमुखी विकास तथा यहां पर रोजगार मुहैया कराकर यहां से युवकों के पलायन को रोकना । बीते बीस वर्षों में कितना विकास हुआ ?  कितने रोजगार के साधन विकसित हुए ? और कितना पलायन रुका ? यह बिन्दु प्रगतिशील तबकों, छात्रों, नौजवानों तथा उत्तराखंड से संबंध रखने वाले सभी बुद्धिजीवियों के लिए इस नये सामाजिक परिदृश्य में गंभीरतापूर्वक विचारणीय है।

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देश के विभिन्न शहरों तथा महानगरों से वापस उत्तराखंड के गांवों में पहुंचे युवा बेरोजगार तथा गांव में पहले से ही बसे बेरोजगारों, प्राइवेट अथवा रेगुलर कोर्सों में पढ़ाई कर रहे छात्रों और गांव की आम जनता मिलकर अपनी बुनियादी समस्याओं के समाधान के लिए संघर्ष करना शुरू कर दे तो रोजगार प्राप्ति के लिए एक सशक्त आंदोलन खड़ा हो सकता है। उत्तराखंड पृथक राज्य भी तो एक मजबूत जनांदोलन की परिणामी परिणिति ही है। उत्तराखंड की आजीविका का मुख्य स्रोत कृषि होने के बावजूद भी आज तक कृषि का औद्योगिकरण नहीं हुआ। टूरिजम इंडस्ट्री विकसित नहीं की गई, ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए सूक्ष्म अथवा लघु तथा मझौले उद्यमों की कौन कौन से योजनाएं बनाई गयी ?

प्रोफेशनल तथा रोजगारपरख प्रशिक्षणों की हो समुचित व्यवस्था

स्कूल व कालेज की शिक्षा के स्तर को ऊपर उठाने तथा प्रोफेशनल तथा रोजगारपरक प्रशिक्षणों के लिए समुचित व्यवस्था करना सरकारों का मौलिक तथा नैतिक दायित्व है। आयुर्वेद तथा योग को जनता से जोड़ने के लिए प्रशिक्षण संस्थानों की पर्याप्त संख्या में स्थापना करके उनमें छात्रों को प्रशिक्षण देकर देश व दुनिया में स्वस्थ्य रहने के प्राकृतिक तौर तरीकों का प्रचार प्रसार भी हो सकता है और स्थानीय स्तर से प्रतिभाएं भी निखरकर आएंगी। इस क्षेत्र में अनुसंधान करने की अपार संभावनाएं हैं जिन्हें तरासने की कोशिश ही नहीं की गयी। यदि थोड़ी बहुत भी कोशिश की गयी होती तो यह कुछ ही लोगों तक सीमित रहती, उसे ना तो रोजगारपरक बनाया गया और ना ही उसे आम जनता से जोड़ा गया। शिक्षण- प्रशिक्षण संस्थान, मेडिकल, इंजीनियरिंग कालेज, पैरामेडिकल कोर्सेज इतिआदि का पर्याप्त संख्या में ना होना, गांव व शहरों के बीच संसाधनों का अंतर, स्थानीय स्तर पर उद्योग धंधे खोलने की दिशा में सुझाव लेकर काम ना करना इतिआदि बहुत ऐसे कारण हैं जिनसे खासकर उत्तराखंड में रोजगार की समस्या दिन पर दिन गहरी होती गयी। इसीलिए युवाओं का पलायन भी तेजी से हुआ।

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गांव वापसी से नई चेतना विकसित होने का मार्ग प्रशस्त

कोरोना वायरस ने गांव में युवाओं की वापसी तथा नई चेतना विकसित करने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। अब समय आ गया है कि जिंदगी जीने तथा रोजगार पाने के लिए नये तरीके से सोचा जाए। रोजगार के साधन गांव तथा आसपास के कस्बों में उपलब्ध हों, इसके लिए सभी लोगों को एकजुट होकर युवा वर्ग की अगुवाई में रोजगार प्राप्ति के लिए सरकार से जनता की जायज मांगों मनवाने के लिए संघर्ष शुरू करना ही पड़ेगा। यह निश्चित लगता है कि आने वाले कुछ ही महीनों में उत्तराखंड में रोजगार की मांग बुलंद होगी और युवा वर्ग उसकी अगुवाई करेगा।

लेखक भारत सरकार के आवासन एवं शहरी कार्य  मंत्रालय के प्रशासनिक अधिकारी पद से अवकाश प्राप्त हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेखन और संपादन से जुड़े हैं।

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