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काफल की यही पुकार कब आओगे मुझे तोड़ने!

माना जाता है कि गांवों मे जब यह फल पक कर तैयार हो जाता है तो एक पक्षी गीत गाता है, ‘काफल पक्को मैन न चाक्खौ’ पर इस बार यह इंसानों के लिए भी हकीकत बन गया है। वैसे पहाड़ों में फलों व खान-पान के साथ कई गीत जुड़े हुए हैं। इनमें सबसे अधिक लोकप्रिय ‘बेड़ु पाको बारू मासा वो नरायण काफल पाको चैता’ और ‘वो हिमा काफल पाको म्यार नरसिंह डाना’। काफल तो आप जान गए होंगे, लेकिन बेड़ु एक तरह का wild fig होता है। इस प्रसिद्ध गाने को ब्रजेंद्र लाल साह ने लिखा था, जबकि संगीतकार थे जाने माने रंगकर्मी मोहन उप्रेती व बी.एम.साह।
By Anand Pandey, New Delhi
‌कोरोना वायरस की दहशत और लॉकडाउन के चलते देश का हर इलाका प्रभावित हुआ है। उत्तराखंड में भी इसकी वजह से लोगों की रोजी-रोटी के लिए संकट पैदा हो गया है। आजकल इस पहाड़ी राज्य में पाबंदी के कारण रसीले फल काफल पेड़ों पर ही लटक रहे हैं। उत्तराखण्ड के कुमाऊं व गढ़वाल के कई इलाकों में यह फल स्थानीय लोगों के लिए मौसमी रोजगार का एक जरिया भी है। ग्रामीण लोग हर साल अप्रैल के महीने से ही जंगलों से काफल को तोड़कर टोकरी में शहरों में लाकर बेचा करते हैं।
अल्मोड़ा, नैनीताल, चमोली, बद्रीनाथ, कर्णप्रयाग व अन्य शहरों में इन लोगों को सड़क किनारे काफल के साथ देखा जा सकता है। लेकिन इस बार इनके चेहरे मायूस हैं। क्योंकि देशव्यापी लॉकडाउन के कारण ये लोग एक गांव से दूसरे गांव में नहीं जा पा रहे हैं। साथ ही शहरों में प्रवेश की भी मनाही है। इसलिए इस साल काफल पेड़ों पर ही रह गये हैं। जहां एक ओर बड़ी संख्या में ग्रामीण लॉकडाउन से परेशान हैं, वहीं कुछ ग्रामीणों का कहना है काफल तोड़ने वाले कई बार पेड़ की टहनियां भी तोड़ देते थे, लेकिन इस बार कुछ हद तक जंगलों के पेड़-पौधे भी सुरक्षित हैं।
माना जाता है कि गांवों मे जब यह फल पक कर तैयार हो जाता है तो एक पक्षी गीत गाता है, ‘काफल पक्को मैन न चाक्खौ’ पर इस बार यह इंसानों के लिए भी हकीकत बन गया है। वैसे पहाड़ों में फलों व खान-पान के साथ कई गीत जुड़े हुए हैं। इनमें सबसे अधिक लोकप्रिय ‘बेड़ु पाको बारू मासा वो नरायण काफल पाको चैता’ और ‘वो हिमा काफल पाको म्यार नरसिंह डाना’। काफल तो आप जान गए होंगे, लेकिन बेड़ु एक तरह का wild fig होता है। इस प्रसिद्ध गाने को ब्रजेंद्र लाल साह ने लिखा था, जबकि संगीतकार थे जाने माने रंगकर्मी मोहन उप्रेती व बी.एम.साह।
चीन, जापान व सिंगापुर में भी होता है काफल
काफल जहां एक ओर उत्तर भारत के पर्वतीय क्षेत्रों (उत्तराखंड, हिमाचल) व उत्तर-पूर्व में पाया जाता है। वहीं नेपाल, भूटान, चीन, जापान, मलेशिया व सिंगापुर में भी काफल मिलता है। यह मुख्य तौर पर 900 से 1800 मीटर यानी 3000 से 6000 फिट की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में होता है

क्या-क्या नाम है इसके
इसे kaphal के अलावा bay berry व box myrtle आदि नामों से भी जाना जाता है। भारत के उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में इसे soh-phi के नाम से पुकारते हैं।
Scientific Name/ वैज्ञानिक नाम-मिरिका एस्कुलेंटा (myrica esculenta)
Uses
काफल का न केवल फल काम में काम आता है, बल्कि पेड़ की छाल व पत्तियों को भी उपयोग में लाया जाता है। इसकी छाल/bark को चमड़ा बनाने में इस्तेमाल किया जाता है।
Health Benefits
दिखने में यह कुछ-कुछ शहतूत की तरह नज़र आता है। यह छोटा सा फल हमारे शरीर के लिए दवा का काम भी करता है। इसमें न केवल विटामिन्स होते हैं, बल्कि आयरन भी भरपूर मात्रा में पाया जाता है।
आयुर्वेद में काफल को भूख जगाने की अचूक दवा माना गया है। इसके साथ ही मधुमेह यानी डायबीटिज के रोगियों के लिए भी यह छोटा सा फल लाभकारी होता है। इसमें एंटी-ऑक्सीडेंट गुण मौजूद होते हैं, जिनसे शरीर में ऑक्सीडेटिव तनाव कम होता है। इसकी छाल का इस्तेमाल विभिन्न औषधियां बनाने में भी होता है। छाल में एंटी इन्फ्लैमेटरी, एंटी माइक्रोबियल क्वालिटी पाई जाती है। काफल के पेड़ की छाल का पाउडर जुकाम, आंखों की बीमारी व सिर दर्द आदि में आराम दिलाता है। जबकि इसकी पत्तियां भी गुणकारी होती हैं।
Edited by Report Ring Team

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