धर्म कर्म

लाग हरियाव, लाग बग्वाव, जी रया, जागी रया…

लाग हरियाव, लाग दशैं, लाग बग्वाव,
जी रया, जागी रया,
य दिन, य महैण कैं नित-नित भ्यटनै रया।
बेर जस फल जया,
दुब जस पंगुर जया।
स्याव जसि बुद्धि है जौ,
स्यूं जस तराण ऐ जौ।

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अल्मोड़ा।  रीति रिवाज व संस्कृति से जुड़ा, प्रकृति पूजन का प्रतीक लोकपर्व हरेला कल (गुरुवार) को मनाया जाएगा। हरेला पर्व सामाजिक सौहार्द के साथ ही कृषि व मौसम से भी संबंध रखता है। घर में सुख, समृद्धि व शान्ति के साथ ही हरियाली व अच्छी कृषि का सूचक हरेला इस कामना के साथ बोया जाता है कि इस साल बोई गई फसलों को नुकसान न हो।

कुमाऊं में वैसे तो कहीं-कहीं साल में तीन बार हरेला बोया जाता है, लेकिन श्रावण मास के हरेला का अपना महत्व है। श्रावण मास भगवान भोलेनाथ का प्रिय महीना है, इसलिए इस हरेला को कही-कही हर-काली के नाम से भी जन जाता है। श्रावण मास में हरेला सम्पूर्ण कुमाऊं में बोया जाता है। चैत्र व आश्विन मास का हरेला मौसम में बदलाव के सूचक हैं। चैत्र मास का हरेला गर्मी आने की सूचना देता है तो वहीं आश्विन मास का हरेला सर्दी आने की सूचना देता है।

चैत्र मास में हरेला प्रथम दिन बोया जाता है और नवमी को काटा जाता है। आश्विन मास में हरेला नवरात्र के पहले दिन बोया जाता है और दशहरा के दिन काटा जाता है। इसी प्रकार श्रावण मास का हरेला श्रावण मास लगने से नौ दिन पहले अषाड़ के महीने में बोया जाता है और 10 वें दिन काटा जाता है। हरेला के साथ जुड़ी मान्यता यह भी है कि जिसका हरेला जितना बड़ा होगा उसे कृषि में उतना ही फायदा होता है।

कुमाऊं में हरेला पर्व से ही श्रावण मास की शुरूआत मानी जाती है। हरेला से नौ दिन पूर्व दो बर्तनों में पांच, सात या नौ अनाजों को मिलाकर हरेला बोया जाता है, जिसे मंदिर के कमरे में रखा जाता है। इन नौ दिनों में जरूरत के अनुरूप हरेला में पानी डाला जाता है। दो-तीन दिन में हरेला अंकुरित होने लगता है। हरेला को सूर्य की रोशनी से दूर रखा जाता है जिससे अनाज की इन पत्तियों का रंग पीला होता है। पीला रंग उन्नति और संपन्नता का प्रतीक माना जाता है।

श्रावण मास लगने के दिन परिवार का बुजुर्ग सदस्य हरेला काटता है। हरेला काटने के बाद इसमें अक्षत, चंदन डालकर भगवान को लगाया जाता है और सबसे पहले अपने ईष्ट देव गोलज्यू, हरज्यू, सैम देवता, गंगनाथ देवता, देवी भगवती आदि देवों को अर्पित किया जाता है। हरेला के तिनकों को ईष्ट देव को अर्पित कर अच्छे धन-धान्य, परिवार की सुख सम्पदा, मित्रों की कुशलता के साथ ही दुधारू जानवरों की रक्षा की कामना की जाती है। हरेला की पहली शाम डेकर पूजन की परंपरा भी निभाई जाती है। हरेले की मुलायम पंखुडिय़ां रिश्तों में मधुरता लाती हैं।

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