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औषधीय गुणों की खान, मंहगा बिकता है तेल,रोजगार के मौके!

Dr Harish Chandra Andola 

पर्वतीय क्षेत्रों में उगने वाले ‘कुणजा’ जिसका वानस्पति नाम आर्टीमीसियावलगेरिस है, उसका स्थानीय स्तर पर भले ही बहुत ज्यादा उपयोग और कोई खास अहमियत न हो, लेकिन पड़ोसी मुल्क चीन में ‘कुणजा’ कई काश्तकारों की आर्थिकी का मुख्य जरिया है। दरअसल, ‘कुणजा’ में जहां तमाम औषधीय गुण हैं, वहीं इसके तेल को बतौर कीटनाशक प्रयोग में लाया जाता है।

उत्तराखंड में अभी तक कुणजा को सगंध और औषधीय पौधों की खेती से जोड़ने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए हैं, जबकि पर्वतीय क्षेत्रों में धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शायद ही कोई ऐसा हवन,यज्ञ हो, जिसमें कुणजा का प्रयोग न हो, लेकिन व्यवसायिक दृष्टि से इसका उपयोग नहीं हो पा रहा। इतना ही नहीं, बड़े.बुजुर्ग दाद, खाज, खुजली में भी कुणजा का आमतौर पर प्रयोग करते हैं। जिससे साफ जाहिर है कि स्थानीय स्तर पर बुजुर्गों को इसके औषधीय गुणों की जानकारी तो है, लेकिन आज तक इसे किसानों ने अपनी आर्थिकी का जरिया नहीं बनाया है।

स्थानीय स्तर पर परंपरागत तौर पर ‘कुणजा’ के नाम से पहचाने जाने वाला पौधे का वानस्पति नाम आर्टीमीसियावलगेरिस। साल के बारह महीनों उगने वाले इस पौधे को चीन में मुगवर्ट के नाम से जाना जाता है। उसका स्थानीय स्तर पर भले ही बहुत ज्यादा उपयोग और कोई खास अहमियत न हो, लेकिन पड़ोसी मुल्क चीन में ‘कुणजा’ कई काश्तकारों की आर्थिकी का मुख्य जरिया है। दरअसल, ‘कुणजा’ में जहां तमाम औषधीय गुण हैं, वहीं इसके तेल को बतौर कीटनाशक प्रयोग में लाया जाता है। उत्तराखंड में अभी तक कुणजा को सगंध और औषधीय पौधों की खेती से जोड़ने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए हैं, जबकि पर्वतीय क्षेत्रों में धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शायद ही कोई ऐसा हवन-यज्ञ हो, जिसमें कुणजा का प्रयोग न हो, लेकिन व्यवसायिक दृष्टि से इसका उपयोग नहीं हो पा रहा। इतना ही नहीं, बड़े-बुजुर्ग दाद, खाज, खुजली में भी कुणजा का आमतौर पर प्रयोग करते हैं। जिससे साफ जाहिर है कि स्थानीय स्तर पर बुजुर्गों को इसके औषधीय गुणों की जानकारी तो है, लेकिन आज तक इसे किसानों ने अपनी आर्थिकी का जरिया नहीं बनाया है।

जो पहाड़ की आर्थिकी का आधार बन सकते हैं। वर्तमान में जहां काश्तकार जंगली जानवरों के कारण फसलों से विमुख हो रहे हैं, ऐसे में इस तरह की घासें काश्तकारों की आर्थिकी का मुख्य आधार बन सकती हैं। केंद्र की ओर से काश्तकारों को कुणजा की खेती के लिए प्रेरित किया जा रहा है। चीन में ‘कुणजा’ का एक लीटर तेल एक हजार से बारह सौ रुपये प्रति लीटर के हिसाब से बेचा जाता है।

इतना ही नहीं, चीन में कुणजा का न सिर्फ तेल बनाया जाता है, बल्कि कई औषधियों में भी इसे मुख्य घटक के रूप में प्रयोग किया जाता है। उत्तराखंड में पाई जाने वाली औषधीय गुणों की वनस्पतियों का वन महकमा शोध के बाद सुव्यवस्थित तरीके से उत्पादन और मार्केटिंग कराएगा। साथ ही, इन औषधीय पौधों के उत्पादों का पेटेंट भी सरकार कराएगी, ताकि इनके व्यावसायिक दोहन पर लगाम लग सके। हमारे आस.पास कई औषधीय पौधे होते हैं, लेकिन जानकारी के अभाव में हम उनका सदुपयोग नहीं कर पाते हैं, कई बार तो उन्हें खर पतवार या अनुपयोगी समझकर नष्ट भी कर देते हैं ।  विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार औषधीय पौधों और उसके उत्पाद का वैश्विक बाजार वर्ष 2050 तक 5 ट्रिलीयन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने की संभावना है। भारत इस क्षेत्र में अभी सिर्फ 462 करोड़ रुपए सालाना के औषधीय उत्पाद का ही निर्यात कर रहा है। केन्द्र सरकार किसानों के बीच औषधीय खेती करने को विभिन्न प्रकार के जागरूकता कार्यक्रम और अभियान चला रही है। किसानों की आय बढ़ाने में औषधीय खेती बहुत मददगार होगी। अगर यह कहा जाय कि आयुर्वेद रोग मुक्त करने के साथ ही किसानों को गरीब मुक्त भी कर रहा है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

लेखक उत्तराखण्ड सरकार के अधीन उद्यान विभाग के वैज्ञानिक के पद पर कार्य कर चुके हैं, वर्तमान में दून विश्वविद्यालय कार्यरत हैं।

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