कला संस्कृति साहित्य

कुमाऊं की सौगात हरेला

By GD Pandey, Delhi

कुमाऊं की सौगात है त्योहार हरेला,
लाता ,मनभावन सावन का पैगाम हरेला. ,
सावन की फुहार, हरियाली की रफ्तार , घास की भरमार धिनाली की बहार, बच्चे वयस्क वृद्ध सभी रहते थे दमदार.
छसिया खाने को था केले का पात,
खीर का स्वाद बढ़ाता तिमिल का पात .
मां का मर्मस्पर्शी ममत्व सिर में अक्षत चंदन युक्त हरेला,
अद्भुत अनुभूति अदृश्य आगाज अनमोल आशीर्वाद अलबेला.

मगर, अब पहाड़ों के त्योहारों की यथार्थता, बनकर रह गई है महज एक औपचारिकता.
पलायन प्रभावित पहाड़ों की परम प्राचीन परंपराएं, महिमामंडित होकर रह जाएंगी केवल अपेक्षाएं.
परिस्थितियों का वैज्ञानिक विश्लेषण करना होगा निहायत जरूरी, बच्चों में वैज्ञानिक सोच विकसित करना है बेहद जरूरी.

त्योहार हरीला हो या घुघुती मनाने वाले चाहिए, पहाड़ों में रहने वाले कर्मठ लोग होने चाहिए.
पहाड़ों में युवा पीढ़ी को रोजगार चाहिए, समरूप शिक्षण प्रशिक्षण और व्यवसायिक संस्थान चाहिए.
आधुनिकतम सुविधा युक्त हेल्थ केयर सिस्टम चाहिए, जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा सुनिश्चित चाहिए.

पहाड़ों में प्रदूषण मुक्त पर्यावरण भी बना रहेगा, सांस्कृतिक विरासत और पर्यटन भी सनातन बना रहेगा.


बशर्ते, पहाड़ों में जागरूक लोग आबाद रहें , सभी लोग जन संगठनों में संगठित होकर रहें , सरकार संसाधनों का समुचित विकास सुनिश्चित करे , पलायन रोकने की प्रबल परिस्थितियां पैदा करे .
अतुल्य , अविस्मरणीय , अगाध प्रेम दुलारी मातृभूमि हमारी, मातृभूमि की संपूर्ण सुरक्षा नैतिक जिम्मेदारी है हमारी.
कुमाऊं की सौगात है त्योहार हरेला,
लाता, मनभावन सावन का पैगाम हरेला, जीडी पांडे की ओर से मुबारक हो सभी को त्योहार हरेला.

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