कला संस्कृति

रानीखेत के डोल और हमारा सरगम क्लब

By Vidhi Pandey

कृष्ण जन्माष्टमी पर सरगम क्लब की याद आ गई। इस क्लब में मैं कई बार कृष्ण बनी तो मेरी बहन रिंकी राधा बनती थी। राधा कृष्ण बनने को लेकर हमउम्र के बच्चों से झगड़ा भी होता था। आस पड़ोस के सारे बच्चे कान्हा और गोपियों की ड्रेस पहनकर डोल (कृष्ण जन्मोत्सव) में पहुंचते थे। राधा कृष्ण बनने में जिनका नंबर नहीं आता था बड़े लोग उन्हें राधा कृष्ण के आसपास बैठाकर सांत्वना देते थे, असली तो तुम ही हो। झांकी में सजने संवरने को लेकर कई बार बच्चों में तनातनी भी हो जाती थी।

सरगम क्लब, रानीखेत के खड़ी बाजार का था। डोल के शुरुआती दौर में क्लब जैसी कोई चीज नहीं थी। हमारे डोल को ‘सरगम’ नाम ताऊ जी के दौर के मिला, संभवत यह नाम उन्हीं लोगों ने दिया। वह समय शायद 60 के दशक का रहा होगा। उनके समय में झांकी में राधाकृष्ण बच्चे बनने लगे थे।

नये दौर में प्रवेश कराने का श्रेय बाबी दा को

वैसे डोल की शुरुआत मूर्तियों को सजाने से हुई थी। घर के सामान से डोल और स्टेज बनता था। इसमें क्रेटिविटी लगातार रही, हर बार कुछ न कुछ नई चीज जुड़ जाती थी। सरगम क्लब को नये दौर में प्रवेश कराने का श्रेय बाबी दा (देवेश सती)  को जाता है। उन्होंने झांकी में थीम देने के साथ और स्टेज को नये रूप में पेश किया। इसमें सुंदर लाइट, म्यूजिक और टेंट शामिल कर उन्होंने डोल का आकर्षण बढ़ा दिया। वह झांकियों के लिए अलग-अलग थीम तैयार कराते थे। कभी कृष्ण जन्म तो कभी रास लीला सहित कान्हा के जीवन पर आधारित हर दिन अलग झांकी होती थी।

कई बार हमारे क्लब ने जीती शील्ड

तीन चार दिन चलने वाले डोल से खासी रौनक रहती थी। हमारे मोहल्ले में ही नहीं रानीखेत बाजार में डोल के कई क्लब थे। हर दिन झांकियां सजाने का कंप्टीशन होता था। नगर के वरिष्ठ लोग जज होते थे। शोभायात्रा के दिन क्लबों को प्राइज मिलता था और अव्वल रहे क्लबों के नाम भी घोषित होते थे। कई बार हमारे क्लब ने शील्ड जीती थी। सन् 2005 तक सरगम क्लब डोल में शामिल रहा। इस लंबे अंतराल में हमारे क्लब में कृष्ण और राधा बदलते रहे। इससे काफी यादें जुड़ी हुई हैं।

स्कूल से आकर बस्ता रखा और डोल की तैयारी में जुट गए। डोल में बारिश और लाइट काफी परेशान करती थी। शायद ही हो जब डोल के दिनों शाम को बारिश नहीं हुई । बारिश के साथ ही लाइट भी चली जाती थी। बारिश बंद होने के बाद दर्शकों को बुलाने के माइक से कमेंट्री और इसके बाद भीड़ जुटने पर झांकी में शामिल बच्चों का उत्साह देखने लायक होता था।

रानीखेत में जन्माष्टमी पर तैयार होने वाली राधा कृष्ण की झांकियों को डोल नाम से पुकारा जाता है। बताते हैं कि डोल की शुरुआत मेरठ से आकर शर्मा बुक स्टोर वाले दादा जी ने की थी। तब डोल में मूर्तियां शामिल होती थी। रानीखेत में कृष्ण जन्मोत्सव यानी डोल हर साल धूमधाम से मनाया जाता है। हालांकि कोरोना के चलते इस बार डोल तो नहीं बने लेकिन संस्कृति कर्मी व पत्रकार विमल सती ने राधा कृष्ण की आनलाइन प्रतियोगिता कराई। इस नये प्रयोग को काफी सराहा जा रहा है।

प्रसाद में बंटता था सेब और खीरा

ताऊ जी (कैलाश सती) अपने बचपन को याद करते हुए बताते हैं कि वह भी डोल में बढ़चढ़ कर शामिल होते थे। पहले डोल खिड़कियों के पास, जीने में और बरामदे में बनते थे। बाद में रोड साइड खाली घरों में बनाए जाने लगे। बच्चे झांकियों के लिए सारा सामान घर से लाते थे। दर्शकों को पर्दा खुलने का इंतजार रहता था। पर्दा खुलते ही ढोलक मजीरे के साथ भजन कीर्तन होते थे। सबको टीका लगता था प्रसाद में सेब और खीरा बंटता था। लोग डोल में सजे बच्चों को भगवान का ही रूप मानते थे। उनमें फूल और एक आना, दो आना भेंट भी चढ़ाते थे। सन् 1950 की बात है, हमारे डोल में सावित्री पांडे कृष्ण बनी थीं। तब वह आठवीं की छात्रा थीं। नई पीढ़ी के बच्चों में सरगम क्लब में सबसे पहले दीपा कृष्ण बनी। बड़े बच्चे पर्दे के पीछे होते थे और छोटे राधा कृष्ण बनते थे। हमारे क्लब में सबसे ज्यादा बार मंटू राधा बनी थी।

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