साहित्य

कुछ ऐसा वह भयावह दिन था…

by Harish 

कुछ ऐसा वह
भयावह दिन था
तूफ़ाँ बन आई थी
जब वो नदियां,

जिन्हें हम
माँ का दर्जा देते थे
पूजा भी हम
इनकी करते थे,

कुछ ऐसा बरस पड़ी
माँ तब
शांत- स्वच्छ निर्मल
पावन सी थी जो
आज क्यों ऐसी
क्रोधित हो आई,

भू की तृष्णा मिटाती थी
सींचा जिसने इस धरा को
फसलें सब लहलहा उठते
सबके दुःख हर लेती वो,

क्रोधित सी हो गई जो
बहे हैं मानव
ढहे हैं घर
रोते बिलखते
इस नरसंहार पर,

जहाँ कहीं था सुख
थी वहाँ शांति अपार
वहाँ हैं आज अत्यंत दर्द
और भयपूर्ण संसार,

कुछ ऐसे बिछड़े अपनों से वो
अलविदा भी कहना था शायद
तोड़ा भ्रम माँ ने सबका तब
दिखाया सबको रूप भयानक,

–हरीश, हरदा पहाड़ी

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