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चक्की में गेहूं तो अच्छे पिसे, बिखर गया आपसी तानाबाना

गांवों में चक्की आने के बाद गेहूं तो बारीक पिसने लगे मगर इससे गांव का तानाबाना बिखर गया। अब घर की चक्की बाहर पत्थरों में मिल गयी, ओखली की भी याद अटक बिटक ही आती है। हां दीवाली या फिर अन्य कुछ त्यौहारों में इनकी पूजा जरूर की जाती है। घराट का आटा भी महंगा हो गया। जिनके पूर्वजों ने यह आटा नहीं खाया वे इसकी मांग करने लगे हैं। सब कुछ वक्त का कमाल है। तभी तो स्मार्ट फोन के दौर में घर की चक्की और ओखली टिक-टॉक में बिकने लगी है।

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By Anand Pandey, Delhi

करीब चालीस साल पहले आज की तरह हर गांव में न तो आटे की चक्की थी और न धान कूटने की मशीनें। शहर में पले-बढ़े युवाओं से इस बारे में बात करेंगे तो उनको यह सवाल असमंजस में डाल सकता है। मैंने शहरों में रहने वाले अपनी उम्र के युवाओं से इस बारे में जानना तो अधिकांश को घर में हाथ से चलने वाली चक्की (चाक) और नदी किनारे पानी से चलने वाले घराट के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

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घराट (Gharat) का आटा अब आने लगा है बाजार में  

अस्सी के दशक में किसी इलाके में एकाध चक्की होती थी। हर कोई इसमें गेहूं, मक्का व मडुवा नहीं पीसता था। जरूरत के लिए महिलाएं रोजाना घर के भीतर ही चक्की पीसती थीं। शाम की जरूरत के लिए सुबह और सुबह के लिए रात को गेहूं व अन्य आनाज पीसा जाता था। धान कूटने के लिए ओखली होती थी। ओखली में धान तो अभी भी कूटे जाते हैं। कुछ घराट भी चलते हैं। पहले घराट वाले पिसाई के लिए रुपये नहीं लेते थे। इसके बदले आटा दिया जाता था। घराट का आटा अब बाजार में आने लगा तो इसमें पिसाई भी आटा चक्की की तुलना महंगी हो गयी। बकायदा इस आटे को बाजार में सप्लाई करने का काम एनजीओ भी कर रहे हैं।

त्यौहारों में आती है ओखली (Okhali) और चक्की की याद

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शादी या अन्य शुभ कार्यों में तब गेहूं पिसाई घराट में होती थी या फिर लोग आटे के बोरे
खरीदते थे। धान को घर पर ही ओखली में कूटा जाता था। इसके लिए गांव लोग जुटते थे मिलकर चावल तैयार किये जाते थे। साइंस के विकास के साथ गांवों में भी सुविधाएं पहुंच गयी हैं। अब हर गांव में आटा चक्की है, धान कूटने की मशीन है। इनके आने के बाद हाथ से चलने वाली चक्की घर से बाहर पत्थरों में मिल गयी है। ग्रामीण जीवन का आपसी सहयोग भी कम हुआ है।
गावों में अभी भी कुछ जगह शुभ-काम में रस्म के तौर पर घर की चक्की में गेहूं और ओखली में धान कूटे जाते हैं। इसके अलावा दीपावली व अन्य त्यौहारों में ओखली और घर की चक्की की पूजा की जाती है। विकास के साथ पुरानी संस्कृति और परिवेश सब कुछ बदल कर इतिहास में चला जाता है। जिसे हम सब को स्वीकारना पड़ता है।

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