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पहाड़ से निकला इंडिया का जेम्स बाॅन्ड (India’s James Bond), देश-दुनिया में कमाया नाम

यह कहने में कोई दो राय नहीं कि एनएसए अजीत डोभाल के बिना भारत के सुरक्षा हलकों में काम आगे नहीं बढ़ता है। हमारी यह विशेष रिपोर्ट इंडियन जेम्स बॉन्ड पर केंद्रित है। इसमें आपको यह भी पता लगेगा कि उनका देवभूमि यानी उत्तराखंड से क्या कनेक्शन है।   
जानिए इंडियन जेम्स बॉन्ड यानी अजीत डोभाल की कहानी, हमारी खास रिपोर्ट के ज़रिए

By Kirti Kapse, Delhi

राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को  भारत का जेम्स बॉन्ड भी कहा जाता है। वह फिल्मी दुनिया के नहीं बल्कि असल जिंदगी के जेम्स बाॅन्ड हैं। इंटेलिजेंस ब्यूरो में अफसर रहते हुए हो या फिर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार, जब संकट का समय आया उन्होंने इसे होशियारी से हल किया है। बात चाहे दिल्ली दंगों की हो, कश्मीर से धारा 370 हटाने के बाद पैदा हुए हालात से निपटने की या फिर हाल ही में भारत -चीन सीमा पर पैदा हुए तनाव को कम करने की। इन सब में एनएसए अजीत डोभाल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मानो उनके हाथ में जादू की कोई ऐसी छड़ी है जिससे वह हर समस्या का हल निकाल लेते हैं। एनएसए का पद काफी महत्वपूर्ण होता है, तमाम महत्वपूर्ण मौकों पर उनकी मदद ली जाती है। जिस प्रकार जेम्स बाॅन्ड का अपनी फ़िल्मों में खास रोल होता है उसी तरह महत्वपूर्ण मौकों पर डोभाल की भूमिका भी अहम होती है। डोभाल को पीएम मोदी का बेहद करीबी भी माना जाता है।

कुन्नूर से शुरू हुआ कामयाबी का सफर

अजीत डोभाल का जन्म 20 जनवरी 1945 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के घीड़ी बानेलस्यूं में हुआ था। उनके पिता भी इंडियन आर्मी में थे । उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा अजमेर मिलिट्री स्कूल से ली और आगरा यूनिवर्सिटी से अर्थशास्त्र से मास्टर डिग्री की। यूपीएसई की परीक्षा पास कर आईपीएस बन गए और उन्हें केरल कैडर मिला । यानी जन्म उत्तराखंड में, स्कूली पढ़ाई राजस्थान में, कॉलेज की पढ़ाई उत्तरप्रदेश में और नौकरी की पहली पोस्टिंग केरल में । 22-25 वर्ष की उम्र में ही वह चार प्रदेश देख चुके थे। केरल में वो SP के तौर पर पुलिस फ़ोर्स ज्वाइन करते हैं, पोस्टिंग के लगभग डेढ़ वर्ष बाद ही केरल के कुन्नूर जिले के थलासेरी गांव में 28 दिसम्बर 1971 को दंगा हो गया था, दंगा दो दिन तक चला, इसमें कई घर, दुकानें जला दीं और लूटपाट हुई।

बताते हैं कि कुन्नूर की स्थिति नियंत्रित नहीं हो पा रही थी।  तब केरल गवर्मेंट ने  दंगा रोकने के लिए यंग अफ़सर अजीत डोभाल को थलासेरी भेज दिया । उन्होंने दो दिन में हालात पर काबू पा लिया। डोभाल की कामयाबी का सफर यहीं से शुरू होता है। उनके इस काम का ज़िक्र केरल से लेकर दिल्ली तक हुआ था।

अस्सी और नब्बे का दशक रहा काफ़ी महत्वपूर्ण 

1972 में सेंट्रल सर्विस के लिए उन्हें दिल्ली बुला लिया गया। इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी आईबी में उन्हें नई जिम्मेदारी मिली। यहां से उनके जासूस बनने की कहानी शुरू होती है । डोभाल की ज़िंदगी में सत्तर, अस्सी और नब्बे का दशक काफ़ी महत्वपूर्ण रहा। इन तीन दशकों में उन्होंने वो कर दिखाया जो जासूसी दुनिया में बहुत कम लोगों ने किया है। 75 वर्ष की उम्र के अजीत डोभाल को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया गया। उन्हें पीएम मोदी का बहुत करीबी माना जाता है। इतना ही नहीं उन्हें कैबिनेट स्तर के मंत्री का दर्जा भी हासिल है ।

ऐसे हल किया मिजोरम की समस्या को

डोभाल के आईबी ज्वाइन करने के दो वर्ष बाद मीजोरम में कोई घटना घट जाती है ,मिज़ो नेशनल फ़्रंट के लालदेंगा का नाम आपने सुना होगा । लालदेंगा ने एक मूवमेंट चला रखा था, मिज़ोरम को भारत से अलग करने का । वहाँ इस समूह ने काफ़ी खून ख़राबा कर रखा था । तभी वहाँ एक बड़े IPS अफ़सर का क़त्ल हो जाता है । जिसके बाद अजीत डोभाल को मिज़ोरम भेजा गया। उसके बाद पाँच साल उनकी तैनाती मिज़ोरम में ही थी । वो वहाँ की एक एक इंफारमेशन निकालते हैं तो मालूम पड़ता है कि लालदेंगा  के सात कमांडर हैं । जिनकी वजह से लालदेंगा का काफ़ी दबदबा था मिज़ोरम में । उन्होंने एक-एक कमांडर से मिलकर उन्हें अपनी और मिला लिया । उन्हें बताया कि अलग देश बनाने के क्या नुक़सान है, सन 1976 में लालदेंगा और भारत सरकार के बीच बातचीत शुरू हुई। इस तरह मीजोरम की अशांति को अजीत डोभाल की सूझबूझ से हल किया गया । इस समस्या को हल करने के लिए उन्हें राष्ट्रपति पुरस्कार भी मिला । ये पुरस्कार उन्हें उनकी नौकरी के आठ वर्ष बाद ही मिल गया था ।

रिक्शेवाला बनकर हल कर दी पंजाब की समस्या

मिज़ोरम के बाद डोभाल को  सिक्किम भेजा गया। सिक्किम में भी मिज़ो जैसी ही भारत विरोधी गतिविधियाँ चल रही थी । सिक्किम में भी विरोधियों से मिलकर मामला हल कराया । तब तक नोर्थ ईस्ट का सारा मामला शांत हो चुका था लेकिन अस्सी के दशक में पंजाब में अशांति बढ़ने लगी थी।पंजाब में खाली स्थान समर्थक अपनी अलगाववादी नीति पर चल रहे थे, उसी दरम्यान आपरेशन ब्लू स्टार शुरू हो जाता है।  यह कहीं रिकार्ड में नहीं है, हालांकि कहा जाता है कि भिंडरावाले और स्वर्णमंदिर की सारी अंदरूनी खबरें देने वाले डोभाल ही थे। लेकिन इसके लिए नहीं अजीत डोभाल को आपरेशन ब्लैक थंडर 1988 के लिए जाना जाता है। आतंकियों ने स्वर्ण मंदिर पर क़ब्ज़ा कर लिया था।  अजीत डोभाल रिक्शेवाला बन कर घूमे और मौका मिलने पर  स्वर्ण मंदिर के अंदर घुस गए । जहाँ उन्हें पहचान लिया गया । लेकिन उन्होंने आतंकियों को यक़ीन दिला दिया कि वह आइएसआइ से भेजे गए हैं और उनकी मदद करने आए हैं । इस तरह सूचनाएं एकत्र कर इस मिशन को पूरा किया, जिसके लिए उन्हें कीर्ति चक्र से नवाजा गया है। वह पहले पुलिस अधिकारी थे जिन्हें सेना का न होते हुए भी यह सम्मान मिला है। तब राजीव गाँधी प्रधानमंत्री थे।

अजीत डोभाल ने दो देशों में राजनयिक के तौर पर भी काम किया जिनमें एक था पाकिस्तान व दूसरा इंग्लैंड। नब्बे में कश्मीर में आतंकवाद बढ़ने लगा तो उन्हें कश्मीर भेजा गया।  वहां वे कई मिलिटेंट ग्रुप से मिले और उनका ब्रेनवाश करने की कोशिश की, उन्होंने मिलिटेंट कूका पारे और उसके 250 समर्थकों से कई मुलाक़ातें की और उसे अपनी ओर मिला लिया । 1996 में कश्मीर में इलेक्शन करने का रास्ता साफ़ हुआ।  कूका पारे ने चुनाव लड़ा और जीता भी।

खाली स्थानियों के कब्जे से छुड़ाया ऐम्बैसडर को

1999 में  इंडियन एयरलाइन का एक विमान हाईजेक हो जाता है । जो काठमांडू से दिल्ली जा रहा था, जिसमें 184 यात्री सवार थे। उसे पंजाब, दुबई, लाहौर होते हुये कंधार ले ज़ाया जाता है, जहाँ तालिबान का क़ब्ज़ा था। आतंकवादी भारत के सामने 100 आतंकियों को छोड़ने की मांग रखते हैं। ये आतंकी भारत की अलग अलग जेलों में बंद थे, इनका प्रमुख था मौलाना मसूद अजहर। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी और गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी थे।आतंकियों से बातचीत करने के लिए तीन लोगों की टीम थी,  जिनमें से एक अजीत डोभाल भी थे। 100 आतंकियों से होते होते वार्ता 3 आतंकियों पर समाप्त होती है जिसमें मसूद अजहर समेत दो और को कंधार छोड़ दिया जाता है। बचे यात्रियों को हिफ़ाज़त से दिल्ली ले आया जाता है । एक और वाक्या है जब रोमानिया के ऐम्बैसडर को खाली स्थान लिबरेशन आर्मी ने बंधक बना लिया था उन्हें छुड़वाने में भी डोभाल की बड़ी भूमिका थी वरना अंतरराष्ट्रीय स्तर भारत की बड़ी बदनामी होती ।

 PM मोदी के दूसरे कार्यकाल में पद और क़द दोनों बढ़ा

जिस IB में उन्होंने काम किया उसी IB का सबसे बड़ा डायरेक्टर जनरल पद उन्हें मिला । 2005 में डोभाल रिटायर हो गए । उसके बाद उन्होंने किताबें लिखी , पेपर में आर्टिकल लिखे,  विवेकानंद फ़ाउंडेशन की स्थापना की । 2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ तो उन्हें 30 मई 2014 को नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर ( NSA )बनाया गया ।  PM मोदी के दूसरे कार्यकाल में उनका पद और क़द दोनों बढ़ाकर उन्हें कैबिनेट मंत्री के पद का दर्जा दिया गया। पुलवामा अटैक के बाद सर्जिकल स्ट्राइक के प्लान में भी दिमाग़ अजीत डोभाल का ही था। ये ऑपरेशन कामयाब रहा ।  इराक़ से ISIS के क़ब्ज़े से 46 नर्सों को छुड़वाने में भी उनकी बड़ी भूमिका रही। हाल ही में भारत-चीन सीमा विवाद सुलझाने में भी अजीत डोभाल का योगदान रहा है ।

Kirti Kapse
Kirti Kapse

लेखिका  दैनिक भास्कर व दैनिक जागरण आदि मीडिया समूहों में सीनियर मैनेजर के रूप में काम कर चुकी हैं।

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