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चीनी उत्पादों का बहिष्कार करने से क्या चीन सच में हिल जाएगा? जानिए सारे फैक्ट्स..

 
भारत ने साल 2019 में कुल 74.9 बिलियन डॉलर की वस्तुओं का आयात किया। जो कि चीन के कुल निर्यात का केवल 3 % है। इन आंकड़ों के मुताबिक अगर भारत चीन से आयात करने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दे तो भी चीन को केवल 3 फीसदी का ही नुकसान होगा जो कि चीन जैसी अर्थव्यवस्था के लिए कोई चिंताजनक बात नहीं होगी। क्योंकि अगर हम चीन की आर्थिक वृद्धि पर नजर डालें तो 80 के दशक से लेकर अब तक हर 8 से 10 साल में चीन की अर्थव्यवस्था दोगुनी हुई है।
 
आप एयरटेल जो कि एक भारतीय टेलीकॉम कंपनी है का ब्रॉडबैंड कनेक्शन लें या डीटीएच लगवाएं तो उसका भी राउटर और डीटीएच का सेटअप बॉक्स आपको किसी चीनी कंपनी का ही मिलेगा। अगर सभी चीनी कंपनियां भारत को मोबाइल फोन निर्यात करना बंद कर दें तो 70 प्रतिशत से ज्यादा भारतीय बिना मोबाइल के हो जाएंगे।
 
 By Pawan kumar pandey, Delhi
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15 जून को भारत-चीन की सीमा पर हुए विवाद के बाद से देश भर में उठी राष्ट्रवादी लहर ने भारत में चीन विरोधी महौल बना दिया है। विरोध की शुरुआत चीनी उत्पादों के बहिष्कार से शुरू हुई, जिसके बाद सरकार ने कई चीनी कंपनियों के कॉन्ट्रैक्ट रद्द कर दिए, कई जगह चीनी वस्तुओं की होलिका जलाई गई, कन्फ़ेडरेशन ऑफ़ ऑल इंडिया ट्रेडर्स ने 500 से अधिक चीनी चीज़ों की लिस्ट जारी कर उनके बहिष्कार की मांग भी की। सरकारी टेलीकॉम कंपनियों को चीन में बने कम से कम उपकरण इस्तेमाल करने की हिदायत दी गई तो उसी क्रम में सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने (सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69ए के तहत) 30 जून को टिक-टॉक समेत 59 चाइनीज ऐप्स बैन कर दिए हैं।
हालांकि सरकार ने इन ऐप्स को बैन करने के पीछे देश की संप्रभुता, अखंडता और सुरक्षा को खतरा बताया है, लेकिन यहां पर एक सवाल यह भी उठता है कि ये ऐप्स नए नहीं हैं, कुछ ऐप्स तो 7-8 साल से भारत में प्रयोग किए जा रहे हैं। फिर इतने सालों बाद सुरक्षा का हवाला देकर  बैन करने का क्या मतलब है।

अब अगर पूरे घटनाक्रम पर एक नजर डाली जाय तो एक बात सामने आती है कि चीनी उत्पादों के बॉयकाट और ऐप्स पर बैन लगाने के पीछे सरकार की मंशा चीन को आर्थिक चोट पहुंचाने की है। लेकिन यहां यह भी जान लेना जरूरी है कि सरकार के इस कदम से चीन को ज्यादा नुकसान होगा या भारत को। चलिए पहले बात चीन को होने वाले नुकसान या लॉस की करते हैं।

2019 के आंकड़ों पर नजर डालें तो विश्व की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश चीन ने विश्व भर में 2.499 ट्रिलियन डॉलर का निर्यात किया है। जिसमें कि चीन से सबसे ज्यादा सामान आयात करने वाला देश अमेरिका है। जिसने चीन से 418.6 बिलियन डॉलर के (चीन के कुल निर्यात का 16.8 %) उत्पादों का आयात किया है। वहीं भारत ने साल 2019 में कुल 74.9 बिलियन डॉलर की वस्तुओं का आयात किया। जो कि चीन के कुल निर्यात का केवल 3 % है। इन आंकड़ों के मुताबिक अगर भारत चीन से आयात करने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दे तो भी चीन को केवल 3 फीसदी का ही नुकसान होगा। जो कि चीन जैसी अर्थव्यवस्था के लिए कोई चिंताजनक बात नहीं होगी। क्योंकि अगर हम चीन की आर्थिक वृद्धि पर नजर डालें तो 80 के दशक से लेकर अब तक हर 8 से 10 साल में चीन की अर्थव्यवस्था दोगुनी हुई है।
कितना होगा इंडिया को नुकसान
 
 
अब भारत को होने वाले नुकसान पर नजर डालते हैं तो पाएंगे कि भारत की चीन पर निर्भरता जग जाहिर है। चीन इंडिया को न केवल सस्ती दरों में सामान उपलब्ध करवाता है, बल्कि छोटे व्यापारी जो कि अमेरिका और यूरोप से मंहगी मशीनें खरीदकर बड़े कारखाने लगाने की हालत में नहीं हैं उन्हें चीन सस्ती मशीनों का विकल्प देता है। भारत का एक बड़ा वर्ग या तो मध्यम परिवार से आता है या गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों में से है। अब ये दोनों वर्ग अपनी रोजमर्रा की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए यूरोप और अमेरिका के बाजारों से आयात किए जाने वाली वस्तुओं को अफोर्ड नहीं कर सकता। लिहाजा इनके पास केवल चीन से आयात किए गए उत्पादों का ही विकल्प बचता है। टेलीकॉम इंडस्ट्री हो, आईटी इंडस्ट्री, फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री हो या इलेक्ट्रॉनिक इंडस्ट्री इन सबकी निर्भरता का अंदाजा आप बस केवल इस बात से ही लगा सकते हैं कि इसमें से कितने उद्योग तो ऐसे हैं जो कि बिना चीन से आयात के काम नहीं कर पाएंगे।
मसलन अगर आप एयरटेल जो कि एक भारतीय टेलीकॉम कंपनी है का ब्रॉडबैंड कनेक्शन लें या डीटीएच लगवाएं तो उसका भी राउटर और डीटीएच का सेटअप बॉक्स आपको किसी चीनी कंपनी का ही मिलेगा। अगर सभी चीनी कंपनियां भारत को मोबाइल फोन निर्यात करना बंद कर दें तो 70 प्रतिशत से ज्यादा भारतीय बिना मोबाइल के हो जाएंगे। भारत की इलेक्ट्रॉनिक इंडस्ट्री में एक लंबी फेहरिस्त ऐसे आइटम्स की है जो कि भारत में बनाए ही नहीं जा सकते। वो सिर्फ चीन से ही मंगाए जा सकते हैं।
फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री की बात करें तो भारत कुल आयात किए गए एक्टिव फ़ार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट्स का 70 फीसदी चीन से आयात करता है। वहीं एंटीबायोटिक बनाने के लिए 80 प्रतिशत कच्चा माल चीन से आता है। इन्ही एक्टिव फ़ार्मास्यूटिकल इनग्रेडिएंट्स से बनने वाली जेनरिक दवाओं का निर्यात भारत विश्व भर में करता है जो कि भारत की मोटी कमाई का एक जरिया है।

आईटी सेक्टर में भारतीय बाजारों में कोई दूसरा देश चीन का मुकाबला ही नहीं कर सकता। वैसे तो भारतीय बाजारों में चीनी ऐप्स की भरमार हैं फिर भी भारतीय बाजारों से मिलने वाला रेवेन्यू अन्य देशों के मुकाबले मिलने वाले रेवेन्यू से बहुत कम है। उदाहरण के लिए अगर हम टिक-टॉक को ही लें तो टिक-टॉक का ग्लोबल रेवेन्यू 17 बिलियन डॉलर का है जबकि भारत में टिक-टॉक का कुल कारोबार 5.8 मिलियन डॉलर का है, जो कि कुल ग्लोबल बिजनेस का सिर्फ 0.03 प्रतिशत ही है। लेकिन अगर भारत के नुकसान का अंदाजा लगाएं तो टिक-टॉक के बन्द होने से ना सिर्फ वहां काम करने वाले हज़ारों लोग बेरोजगार हो जाएंगे बल्कि लाखों की संख्या में टिक-टॉक के क्रिएटर जो कि उस प्लेटफॉर्म पर इनफ्लूएन्सर के रूप में जाने जाते थे और प्रोडक्ट ऐड उनकी कमाई का जरिया हुआ करता था वो लोग भी टिक-टॉक से होने वाली कमाई से वंचित रह जाएंगे। एक गौर करने वाली बात यहां ये भी है कि टिक-टॉक का फिलहाल कोई दूसरा विकल्प भारत में उपलब्ध नहीं है।

चीनी कंपनियों का भारत में एक दूसरा पहलू भी देखने को मिलता है। जो कि खासकर इंटरनेट कंपनियों में देखा जा सकता है। अगर औसतन देखा जाए तो चीनी कंपनियां भारत या अन्य देशों के मुकाबले भारत में अपने कर्मचारियों को ज्यादा वेतन देती हैं और दूसरी तरफ अन्य देशों जैसे कि अमेरिका या यूरोपियन कंपनियों के मुकाबले चीनी कंपनियों में काम करना ज्यादा आसान होता है। क्योंकि उनके चयन का मापदंड दूसरे देशों की कंपनियों की तरह भारी-भरकम नहीं होता। चीनी कंपनियां कॉलेज विशेष से ली गयी डिग्री के मुकाबले कुशल और मेहनती लोगों को काम पर रखने में ज्यादा भरोसा रखती हैं। चीनी कंपनियों से अच्छे वेतन मिलने के कारण काम करने वाले कर्मचारियों के स्तर, हौंसले और नैतिक मूल्यों में भी बढ़ोतरी होती है। लेकिन इन्हीं चीनी कंपनियों के बंद हो जाने से बेरोजगार होने वाले युवाओं का वही हाल होगा जो कभी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में रोज नये चैनलों के आने और असमय बंद होने से हुआ करता था। बढ़ती भीड़ और बेरोजगारी के कारण जहां वो एक तरफ कम वेतन में काम करने को मजबूर होंगे वहीं पैसों की कमी के चलते स्तर और नैतिक मूल्यों का पतन भी संभव है जो कि कुछ प्रतिशत बेरोजगारों को वापस अपने घर जाने पर मजबूर करेगी और कुछ को अपराध की दुनिया में भी धकेल सकती है। कोविड-19 के कारण भारत की कंपनियों का हाल और यहां की बेरोजगारी के आंकड़े दुनिया से छिपे नहीं है। ऐसे में भारतीय कंपनियों से किसी तरह की उम्मीद रखना बेमानी ही होगी।

भारत का चीनी कंपनियों पर बैन लगाने का दूसरा सबसे बड़ा नुकसान उसे एफडीआई में होने वाली कटौती के रूप में भी उठाना पड़ सकता है। चीन से भारत में होने वाले निवेश में बड़े लेबल पर कमी तो आएगी ही साथ में विश्व के और देशों का भी भारत में निवेश करने पर विश्वास कम होगा। जिसके फलस्वरूप भारत की गिरती अर्थव्यवस्था को और बड़ा झटका पहुंच सकता हैं।

बेशक इंडिया का बाजार विश्व के लगभग सभी देशों को लुभाता है, इसके पीछे का सबसे बड़ा कारण उपयोगकर्ताओं की बड़ी संख्या, क्षमतावान और अपरिपक्व बाजार है। यहां सभी बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों को अपने उत्पादों की खपत के लिए प्रबल संभावनाएं दिखती हैं। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि भारतीय कंपनियों को भारतीय मार्केट में अपने उत्पादों की जगह बनाने के लिए किसी और देश के उत्पादों को रोकना बिल्कुल ही गलत होगा। ऐसा करने से काला बाजारी करने के मौके बढ़ जाएंगे और फिर भी भारतीय कंपनियों को जगह बनाना आसान नहीं होगा। बाजार में फेयर और हेल्दी माहौल बना रहे इसके लिए जरूरी है कि सभी उत्पादों के लिए द्वार खुले रहें। वैसे सरकार के पास एन्टीडंपिंग का विकल्प हमेशा रहता है जो कि बाजार को नियंत्रित रखने में मददगार साबित होता है। किसी भी देश के उत्पादों का बहिष्कार ना ही भारतीय बाजारों में कोई परिवर्तन ला पाएगा और ना ही ऐसा करने से मुख्य समस्या का समाधान होगा। भारतीय उत्पादों को भारत में और ग्लोबल बाजार में जगह बनाने के लिए बहुत बारीकी से अपनी आर्थिक नीतियों को सुधारना पड़ेगा। निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा के माहौल में ही भारतीय उत्पाद अपनी जगह बना सकेंगे।

लेखक एक चीनी कंपनी में डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हैं

4 Replies to “चीनी उत्पादों का बहिष्कार करने से क्या चीन सच में हिल जाएगा? जानिए सारे फैक्ट्स..

  1. उत्कृष्ट लेखन है, किंतु एक बात मैं जोड़ना चाहूंगा कि भारत के लिए यह पुनर्जागरण का वक्त जैसा है। इस परिवेश में कोई भी कदम उठाने के वक्त कोई असमंजस नहीं होना चाहिए, बल्कि विश्व पटल पर स्थायी सीट की दावेदारी के लिए यह जरूरी है कि आप चीन से उठकर यूरोप और अमेरिका की तरह रुझान करें। इसमें कोई दो राय नहीं है कि इससे वर्तमान में नुकसान झेलना पड़ सकता है किन्तु एशिया की महाशक्ति बनने और हर भारतीय को अभिव्यक्ति की आजादी के लिए यह जरूरी है। आने वाले समय में इससे भी कड़े कदम और फैसले लेने पड़े तो भारत सरकार को देश हित के लिए जरूर लेना चाहिए।
    नमस्कार
    जय हिन्द
    सर

    1. बिल्कुल भारत को सही दिशा में सोचना चाहिए। सिर्फ राजनीतिक फायदे के लिए बहिष्कार करने से कोई लाभ नहीं होगा। वास्तव में स्थिति क्या है, यह आने वाले समय में पता चलेगा।

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