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हिन्दी दिवस की महत्वता और राजभाषा के संवैधनिक प्रावधान

By G D Pandey

14, सितंबर, 1949 को संविधान सभा में सर्व सम्मत राय से हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया गया। हिन्दी के महत्व को बढ़ावा देने और उसके प्रचार-प्रसार के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अनुरोध पर भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 14 सितंबर 1953 को हिन्दी दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की थी तभी से प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाया जाता है। ज्ञातव्य है कि राष्ट्रभाषा प्रचार समिति महाराष्ट्र राज्य के वर्धा में स्थित एक हिन्दी सेवी संगठन है जिसकी स्थापना सन 1936 में हुई थी।

हिन्दी दिवस को हिन्दी के एक पर्व के रूप में आयोजित किया जाता है। इस दिन सरकारी कार्यालयों समेत सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों, बैंकों तथा हिन्दी विभागों में विशेष विचार गोष्ठियों का आयोजन करके इस संकल्प को दोहराया जाता है कि हिन्दी में अधिक से अधिक कार्य किया जाएगा। हिन्दी पत्रकारिता जगत में भी हिन्दी दिवस पर तकरीबन सभी हिन्दी समाचार पत्रों में संपादकीय और आलेख प्रकाशित करके हिन्दी के बारे में वैचारिक मंथन किया जाता है। इस तरह से हिन्दी दिवस के पर्व को मनाते और संकल्पों की पुनरावृत्ति करते हुए लगभग सात दशक बीत चुके हैं। इस समय पहले अंग्रेजी फिर हिन्दी की परम्परा सरकारी कार्यालयों की कार्यशैली का अभिन्न अंग बन चुकी है।

सभी सरकारी दस्तावेज मूल रूप में अंग्रेजी में तैयार किये जाते हैं और फिर उनका हिन्दी अनुवाद करवाया जाता है। मुख्यत: इस कार्य के लिए प्रत्येक कार्यालय में एक हिन्दी अनुभाग होता है जिसे अनुवाद का कार्य सौंप दिया जाता है। चंद छोटे-छोटे कार्यालयों को छोड़कर शेष सभी सरकारी कार्यालयों में हिन्दी को अनुवाद की वैशाखियों के सहारे चलाया जा रहा है। यह तो व्यावहारिक पहलू है लेकिन आंकड़े जो प्रस्तुत किये जाते हैं उनमें कम से कम 70 प्रतिशत से लेकर 98 प्रतिशत तक सारा काम हिन्दी में दर्शाया जाता है। यह स्थिति राज्य सरकार के कार्यालयों, विशेषतया हिन्दी भाषी राज्यों के संदर्भ में भिन्न हो सकती है। वर्तमान समय में हिन्दी दिवस की महत्वता एक औपचारिक आयोजन तथा इस मद पर मिलने वाले बजट का उपयोग करने तक सीमित रह गयी है।

इस हिन्दी दिवस के अवसर पर राजभाषा हिन्दी से संबंधित कुछ संवैधानिक प्रावधानों का अवलोकन करना भी प्रासंगिक होगा। राजभाषा के संवैधानिक प्रावधानों पर नजर डालने से पहले यह उल्लेख करना भी आवश्यक हो जाता है कि हमारा संविधान मूल रूप से संविधान सभा द्वारा अंग्रेजी में तैयार किया गया। जैसा कि हमारे संविधान की प्रस्तावना में लिखा गया है कि 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया, अधिनियमित और आत्मर्पित किया गया । उस समय यह अंग्रेजी में ही लिखा गया था। उसके बाद इसका आधिकारिक हिन्दी अनुवाद जो कि संविधान सभा के सभी सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित है और उसे सन् 1950 में संविधान सभा के अध्यक्ष डा. राजेन्द्र प्रसाद के अधिकार द्वारा प्रकाशित किया गया।

मूल संविधान का यह आधिकारिक हिन्दी अनुवाद भी संविधान सभा द्वारा हिन्दी संस्करण के रूप में प्रकाशित हुआ। कहने का अभिप्राय है कि वास्तविकता जो तथ्यों से सामने आती है, वह है कि हमारे देश का संविधान मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया और फिर उसे हिन्दी में अनुवादित किया गया। हमारा यह संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हो गया।

हमारे संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएं वर्णित हैं। ये भाषाएं हैं – असमिया, बांग्ला, बोडा, डोगरी , गुजराती, हिन्दी, कन्नड़, कश्मीरी, कोकंणी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, मैथली, नेपाली, ओड़िया, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, संथाली, तमिल, तेलगू, उर्दू।

संविधान में मान्यता प्राप्त इन 22 भारतीय भाषााओं में से हिन्दी सबसे अधिक लिखी, बोली, व समझी जाने वाली भाषा होने के कारण इसे राजभाषा अर्थात भारत की आफिसियल लैंगवेज का दर्जा दिया गया। इसके लिए राजभाषा अधिनियम 1963 बनाया गया। हिन्दी को भारत की संपर्क भाषा के रूप में भी मान्यता मिली।

राजभाषा अधिनियम 1963 जो 26 जनवरी 1965 को शासकीय राजपत्र में प्रकाशित होकर लागू हुआ उसमें हिन्दी को संघ की राजभाषा के रूप में मान्यता मिली और अंग्रेजी को दूसरी आधिकारिक भाषा माना गया। स्वतंत्र भारत में अंग्रेजी और हिन्दी भाषा को लेकर बड़े-बड़े आंदोलन हुए जिनसे देश के विभाजन का खतरा पैदा हो गया। दक्षिण भारत में हिन्दी का विरोध और उत्तर भारत में अंग्रेजी का विरोध विभिन्न तर्कों के साथ होने लगा।

आम भारतियों के समझ में यह आंदोलन नहीं आया बल्कि कुछ स्वार्थवश इस तरह के आंदोलनों को जनता पर ऊपर से लादने की भर्सक कोशिश की गयी। वास्तविकता यह थी कि देश में कुल दो प्रतिशत लोग ही अंग्रेजी जानते थे जिसे ‘बाबू अंग्रेजी’ कहा जाता है। राजभाषा अधिनियम 1963 में भी हिन्दी के कार्यसाधक ज्ञान की ही बात थी। भारत के आम लोग न तो काम चलाऊ हिन्दी सीखकर प्रेमचंद बन सकते थे और ना ही साधारण अंग्रेजी सीखकर कोई शेक्सपियर । इसीलिए भाषाई आंदोलन से आम जनता का जुड़ाव नहीं रहा, लेकिन कुछ राजनैतिक अहंकार ने ऐसे आंदोलनों में लोगों को घसीटने की पुरजोर कोशिश की। अंततोगत्वा यह रास्ता निकाला गया कि हिन्दी भी चलेगी और अंग्रेजी भी चलेगी। व्यवहारिक स्थिति यह थी और अभी भी काफी हद तक मौजूद है कि प्रतीक के रूप में तो हिन्दी ऊपर अर्थात संघ की राजभाषा है और सरकारी कार्यालयों में फाइलवर्क ‘बाबू अंग्रेजी’ में ही चलता आया है।

हमारे संविधान के अनुच्छेद 343से लेकर 351 तक में राजभाषा का वर्णन किया गया है। अनुच्छेद 348 के अंतर्गत स्पष्ट तौर पर प्रावधान किया गया है कि सुप्रीम कोर्ट और देश की सभी हाई कोर्ट की लिखित प्रोसीडिंग और जजमेण्ट अंग्रेजी में ही होंगे। जजमेण्ट का हिन्दी अनुवाद होने की स्थिति में भी व्याख्या के संबंध में अंग्रेजी संस्करण ही अंतिम होगा।
राजभाषा अधिनियम 1963 की धारा 3 (3) के अंतर्गत 14 शासकीय दस्तावेज ऐसे हैं जिन्हें द्विभाषी रूप में जारी करना अनिवार्य है। अर्थात संघ सरकार के उक्त दस्तावेज अंग्रेजी और हिन्दी दोनों भाषाओं में जारी किये जाने आवश्यकीय है। देशभर के केन्द्रीय कार्यालयों में हिन्दी के प्रगामी प्रयोग को सुनिश्चित कराने, समीक्षा करने तथा आवश्यक निर्देश जारी करने हेतु छह(6) समितियां गठित हैं। ये हैं-
1. केन्द्रीय हिन्दी समिति जिसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं।
2. केन्द्रीय राजभाषा कार्यान्वयन समिति जिसके अध्यक्ष राजभाषा विभाग के सेकेट्री होते हैं।
3. संसदीय राजभाषा समिति जिसमें 30 सदस्य (20 लोकसभा सदस्य तथा 10 राज्य सभा सदस्य) होते हैं। इस समिति में सभी राजनैतिक पार्टियों का प्रतिनिधित्व होता है इसके अध्यक्ष गृह मंत्री होते हैं और मुख्य रूप में समिति के संचालन हेतु सत्ताधारी पार्टी के सदस्यों में से एक उपाध्यक्ष चुना जाता है।
4. हिन्दी सलाहकार समिति जिसमें अध्यक्ष प्रत्येक मंत्रालय के मंत्री होते हैं यह हर मंत्रालय स्तर पर होती है।
5. नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति (नाराकास) यह नगर स्तर पर होती है। इस समय लगभग देश के 350 नगरों में यह समिति है। इसके अध्यक्ष, सदस्य कार्यालयों में से किसी एक के विभागाध्यक्ष होते हैं ।
6. राजभाषा कार्यान्वयन समिति जो प्रत्येक विभाग में होती है इसके अध्यक्ष विभाग के हैड आफ डिपार्टमेंट होते हैं।

हिन्दी दिवस के अवसर पर यह एक गंभीर चिन्तन का विषय हो सकता है कि इतने संवैधानिक प्रावधानों और समितियों के क्रियाशील होने के बावजूद भी राजभाषा हिन्दी केन्द्र सरकार के कार्यालयों में अंग्रेजी के अनुवाद की परिधि में ही छटपटा रही है। जबकि अंग्रेजी बिना समितियों के ही भारत की दूसरी आफिसियल लैंग्वेज के दर्जें के ऊपर भारत के पहले नंबर की राजभाषा के रूप में व्यवहार में पूर्ववत चलतीआ रही है। इसके अलावा समाज में अंग्रेजी तथाकथित स्मार्टनैस की प्रतीक बनी हुई है और प्राईवेट तथा काॅरपोरेट सैक्टरों में नौकरी प्राप्त करने के लिए अनिवार्य योग्यता का आधार बनी हुई है। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में तो हमारी सरकार ने 8 विदेशी भाषाओं को स्थान दिया है।

हिन्दी और अंग्रजी की ऐसी स्थितियां कोई गलत अथवा आश्चर्यजनक नहीं लगती हैं । यहां पर हिन्दी से विशेष प्रेम करने और अंग्रेजी से घृणा करने तथा अंग्रेजी का विरोध करने का प्रश्न नहीं है। ऐसा इसलिए कि इंफाॅरमेशन टेक्नोलाॅजी, बायो टेक्नोलाॅजी, नैनो टेक्नोलाॅजी के क्षेत्रों में आयी क्रांति ने इंटरनेट आफ थिग्स, आर्टीफिसियल इंटैलिजैन्स तथा रोवोटिक्स के युग को जन्म दे दिया है और इस युग में जीवित रहने तथा जीविकोपार्जन के लिए काम करने हेतु जो साधन और संशाधन देश दुनिया में उपलब्ध होंगे और उनकी जो भाषा होगी अर्थात जिस और जिन भाषाओं में उन्हें समझा जाएगा और उनमें रोजगार मिलेगा, वही भाषा और भाषाएं सीखनी लाजमी होंगी। इसलिए दुनिया में अब बहुभाषावाद को अपनाया जा रहा है।2 सितंबर 2020 को भारत सरकार ने केन्द्र शासित प्रदेश जम्मू कश्मीर में पांच राज भाषाओं – अंग्रेजी, उर्दू, हिंदी, कश्मीरी तथा डोगरी को लागू करने की मंजूरी दे दी है।

जहां तक भाषाओं को सीखने उन्हें समझने का प्रश्न है उनमें व्यवहारिक बात यह है कि भाषा कोई भी कठिन या सरल नहीं होती। सरल या कठिन का पैमाना यह है कि हम उससे कितने परिचित हैं। कोरोना काल में हमारे देश के अशिक्षित लोग भी लाॅकडाउन, मास्क, सेनिटाइजर, क्वारन्टीन, कंटेनमेंट जोन तथा कोरोना वाइरस जैसे अनेकों अंग्रेजी शब्दों से परिचित हो चुके हैं। उन्हें ये शब्द हिन्दी से भी सहज और सरल लगने लगे हैं।

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