कला संस्कृति

गुड़ाई और धान रोपाई से गुम हो गई हुड़के की थाप और हुड़किया बौल ( hurkiya baul )

By Diwan karki

अल्मोड़ा। मानसून के आगमन के साथ ही पहाड़ी क्षेत्रों में खरीफ की फसल के लिए कृषि कार्य जोर पकड़ने लगा है। पहाड़ी क्षेत्रों में इन दिनों धान की रोपाई के साथ ही मडुवा, मादिरा की गुड़ाई का कार्य जोरों पर चल रहा है। इसके साथ ही खरीफ की फसल में बोई जाने वाली कई प्रकार की दालें भी बोई गई हैं जिनमें काले भट, सोयाबीन, राजमा, गहत, रैंस प्रमुख हैं। चारों ओर खेतों में हरियाली दिखने लगी है, लोग कृषि कार्य में जुट चुके हैं। मडुवा, मादिरा की जहां गुड़ाई चल रही है, वहीं पानी वाले क्षेत्रों में धान की रोपाई का कार्य चल रहा है। लेकिन इन कार्यों को सरलता और मनोरंजन के साथ करने की जो एक रीति ‘हुड़का बौल’ पहले खूब लोकप्रिय था वह आज बहुत कम जगहों पर देखने को मिलता है।

हुड़का बौल दो शब्दों से मिलकर बना है, जिसमें हुड़का (हुड़का एक वाद्य यंत्र है) बौल-भुजा अथवा बाहुबल से संबंधित है। यानी हुड़काबौल का शाब्दिक अर्थ कई हाथों का एक साथ कार्य करने के लिए किया गया है। हुड़का बौल का आयोजन तभी किया जाता है जब किसी किसान के पास ज्यादा जमीन हो।

हुड़किया बौल ( hurkiya baul )और गुड़ौल गीत जुड़े हैं कृषि कार्य से

हुड़का बौल कुमाऊं का लोकप्रिय कृषि गीत रह चुका है। इसका एक भाग गुड़ौल गीत भी है। हुड़का बौल और गुड़ौल गीत दोनों कृषि कार्य से जुड़े गीत हैं। गुड़ाई के समय गाए जाने वाले ये गीत पहले काफी लोकप्रिय थे। बुआई के कुछ समय बाद ही खेतों में उग रहे अनाज के साथ जब छोटी-छोटी घास भी उग आती है, तो उस घास को  कुदाल से सावधानी के साथ उखाड़ लिया जाता है इसे गुड़ाई कहते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि कार्य वाले खेत अब चुका है।  या तो इन खेतों का बंटवारा हो चुका है या फिर कई खेत बंजर पड़ चुके हैं। पहले जब लोगों के पास ज्यादा खेत हुआ करते थे तो गुड़ाई का कार्य अकेले संभव नहीं था। ऐसे में पास पड़ोस और गांव के लोग गुड़ाई के कार्य को मिलजुलकर किया करते थे और हुड़किया बौल लगाकर कृषि कार्य को और भी मनोरंजक और सरल बनाया जाता था।

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हुड़किया बौल काम करने में भरता था जोश

हुड़का बौल में गायक और गायिकी कार्यकर्ताओं में साहस बढ़ाने और कार्य में तीब्रता लाने के लिए हुड़किया अपनी बुलंद आवाज में वीर रस तथा हास्य रस के गीतों का बखान करते हैं। यह आवाज खेतों में कार्य करने वाले सभी लोगों के लिए एक एनर्जी बढ़ाने का काम करती है। वीर रस के अंतर्गत अजुवा बफौल, भागा महारानी, जुमला बौरानी तथा वात्सल्य रस के अंतर्गत राजुला मालूशाही, सिदु-बिदु का बखान किया जाता है। इस प्रकार कृषि कार्य को हॅंसी-ठठोली के साथ सरलता और मनोरंजन के साथ पूरा किया जाता था। अब जबकि लोगों के पास कृषि योग्य खेत बहुत कम हो गए हैं या फिर पलायन के चलते कई गांवों में खेत बंजर पड़े हैं तो ऐसे में कृषि कार्य के समय अपनाई जाने वाली यह रीति भी कहीं विलुप्त सी हो गई है।

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