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अपनी बात

कैसा होगा भारतीय लोकतंत्र में प्रवासी मजदूरों का अर्थतंत्र

By G D Pandey

हमारा देश विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाता है। भारत एक कृषि प्रधान देश के साथ-साथ श्रमिक बाहुल्य देश भी है। यहां पर मेहनत मजदूरी करके जिन्दगी जीने वाले लोगों की संख्या सौ में सत्तर है। हमारा देश शारिरिक श्रम प्रधान देश है। शारिरिक श्रम के बूते पर उत्पादन की प्रमुख शक्ति है मजदूर वर्ग । भारत की डेमोक्रेसी में जनप्रतिनिधियों को सत्ता में आसीन करने के लिए मजदूर वर्ग को अन्य वर्गों की तरह ही वोट देने का अधिकार भी दिया गया है। चुनावों में मजदूर वर्ग का जमकर इस्तेमाल किया जाता है। प्रवासी मजदूरों के संबंध में स्थिति कुछ भिन्न है। उन्हें ट्रकों तथा चुनाव प्रचार के अन्य वाहनों में भरकर चुनावी रैलियों में भीड़ जुटाने के लिए खूब इस्तेमाल किया जाता है परन्तु जब उनके मूल राज्य में, जहां का उनके पास वोटर कार्ड है, चुनाव होता है और उन्हें वोट देने के लिए छुट्टी चाहिए तो उन प्रवासी मजदूरों को मलिक द्वारा छुट्टी नहीं दी जाती है क्योंकि मालिक अपने काम का हर्जा नहीं होने देता है और यह कहकर प्रवासी मजदूरों को दुतकार दिया जाता है कि अगर अपनी मर्जी से गांव जाओगे तो काम से निकाल दिए जाओगे। अत: वोट देने के मौलिक अधिकार का इस्तेमाल भी प्रवासी मजदूर अपने मालिक की सुविधा तथा इच्छा के अनुसार ही कर पाते हैं। चुनावों के दौरान कई बार इस तरह की खबरें मीडिया में आते रहती हैं।

वर्तमान दौर में तो प्रवासी मजदूरों की दुर्दशा के जो दृश्य सामने आये हैं वे भारतीय लोकतंत्र को शर्मसार करने वाले हैं। केन्द्र सरकार ने प्रधानमंत्री के माध्यम से ऐतिहासिक उपायों की विभिन्न घोषणाएं तो कर दी लेकिन लाॅकडाउन के कारण प्रवासी कामगारों की क्या दशा हो सकती है इस बात का न तो कोई स्वाभाविक पूर्वानुमान लगाया गया और ना ही किसी तरह की योजना के बारे में सोचा गया ।

मजदूर  लोकतंत्र की रीढ़ की हड्डी कथनी में परन्तु व्यवहार नहीं

जिनके पास घर थे उन्हें तो घर में ही रहने के बारे में सरकार तथा विशेषज्ञों के माध्यम से खूब प्रचार प्रसार किया गया। समाज के संपन्न तबके के लोगों ने, सेलिब्रिटीज ने, खिलाड़ियों ने, फिल्मी जगत की हस्तियों ने, विभिन्न अस्पतालों के अलग -अलग विभागों के विशेषज्ञ डाक्टरों ने घर में रहने की सलाह देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। मगर जिनके पास घर हैं ही नहीं, उन्हें अपने गांव वापस जाने की तथा अपने घरों में रहने की जरूरत को किसी भी स्तर पर गंभीरता से नहीं लिया गया, हां राजनैतिक पार्टियां तथा अनके कई कार्यकर्ताओं और कुछ बड़े दानदाताओं ने उनके प्रति दया भाव दिखाते हुए उन्हें भोजन के पैकेट बांटने तथा जगह -जगह पर खाना बनाकर खिलाने का काम तो कुछ समय तक उत्साह के साथ किया और खूब हाईलाइट भी हुए, परन्तु इस देश के नागरिक एवं श्रमशक्ति की हैसियत से उनको सरकारों की तरफ से तथा समाज के बड़े तबकों की ओर से कोई उपाय नहीं सुझाए गये कि वे जब अपने राज्य /गांव वापस जाना चाहते हैं तो समय रहते कैसे और किन साधनों से पहुंचेंगे। दो महीने में जब स्थिति ज्यादा विकट हो गई तो केन्द्र सरकार का गृह मंत्रालय कहता है हमने तो एडवाइजरी 27 मार्च 2020 को जारी कर दी थी और राज्य सरकारें अपना अलग -अलग राग अलापती हैं, कुल मिलाकर प्रवासी मजदूर भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ की हड्डी कथनी में तो हैं परन्तु व्यवहार में शासक वर्ग के गले की हड्डी हैं जिसे न निगला जा सकता है और न ही बाहर निकाला जा सकता है। मजदूर वर्ग समाज में शुरू से ही शोषित उत्पीड़ित तथा वंचित रहा है।

सवाल यह है कि कोरोना काल में बेरोजगारी की जो मार मजदूर वर्ग पर खासकर प्रवासी कामगारों पर पड़ी है वह अब और आगे पोस्ट कोरोना काल में किस अर्थतंत्र के तहत दो जून की रोटी जुटा पाएंगे? अद्र्ध सामती अद्र्ध औपनिवेशिक अर्थ व्यवस्था के डगमगा जाने तथा वैश्विक स्तर पर साम्राज्यवादी अर्थ व्यवस्था के बदलते आयामों के बीच भारत का मजदूर वर्ग शारीरिक श्रम शक्तियों को कितना और किस रूप में किस अर्थतंत्र के तहत उत्पादन की प्रमुख शक्ति बनेगा?

अर्थ केंद्रित व्यवस्था बनाम मानव केंद्रित व्यवस्था

भारत के प्रधानमंत्री अपने वाणीविलास में कुछ नये तथा भ्रामक शब्दों के माध्यम से संदेश दे चुके हैं कि दुनिया में  ‘अर्थ केंद्रित व्यवस्था बनाम मानव केंद्रित व्यवस्था’ पर बहस चल रही है और भारत वैश्विक लीडर बनने वाला है क्योंकि उनके अनुसार भारत के पास आत्म निर्भरता की नई थियोरी है। वह आगे यह भी बता चुके हैं कि आत्म निर्भरता की थियोरी के क्रियान्नवयन से भारतीय अर्थव्यवस्था में इन्क्रीमैंटल नहीं बल्कि क्वांटम जम्प आएगा अर्थात परिमाणात्मक वृद्धि नहीं बल्कि गुणात्मक एवं संख्यात्मक उछाल आएगा। इस थियोरी का मौखिक प्रतिपादन तो हो गया लेकिन इसका प्रयोग कौन सी प्रयोगशाला में होगा और अर्थव्यवस्था लोकल से ग्लोवल किस जादुई छड़ी से बनेगी? क्या यह भी उसी तरह का एक थोथा चना है जो 2014 के चुनावों से पहले भारत को ‘सोने की चिड़िया बनने’ तथा 2014 में सत्ता काविज होने के बाद भारत को ‘विश्व गुरु’ बनाने लिए बाजे घना था।

आत्म निर्भरता की थियोरी में पंच पिलरों का अर्थ

आत्म निर्भर अर्थव्यवस्था की नई थियोरी में यह भी दर्शाया गया है कि यह ‘टैेक्नोलाजी ड्रिश्म’
होगी, इस टैेक्नोलाजी का जो अभिप्राय समझ में आता है वह यह कि इस तथाकथित नई अर्थव्यवस्था को टैेक्नोलाजी द्वारा चलाया जायेगा । टैेक्नोलाजी का इस्तेमाल करने के लिए तकनीकी जानकारी रखने वाले तथा टैक्नोक्रेटस चाहिए । भारत की मैनपावर को ऐसी प्रस्तावित अर्थव्यस्था किस हद तक उत्पादन के साथ जोड़ पायेगी इसे तो नई आत्म निर्भरता की थियोरी में सिद्धांत तथा व्यवहार की कसौटी में नहीं कसा गया है। अशिक्षित अन्य शिक्षित तथा अप्रशिक्षित करोड़ों करोड़ प्रवासी कामगार जो अपने गृह राज्य में वापस आ गये हैं उनको टैेक्नोलाजी ड्रिवन अर्थव्यवस्था का पिलर बनाने के लिए सिद्धांतकारों के पास शाब्दिक मसाला भी नहीं है।
अब गांव में लोगों को आत्म निर्भरता की नई थियोरी के पांच पिलरों तथा उपलब्धियों की सूची संबंधी परचों को लेकर बीजेपी कार्यकर्ता रैलियां निकालते हुए गांवों तक पहुंचेंगे । इसके अलावा अन्य प्रचार माध्यमों से भी पंच पिलरों का अर्थ आम लोगों को समझाया जा रहा है। सवाल है कि क्या ग्रामीण जनता तथा प्रवासी कामगार जो अपने गांव पहुंचे हैं उन्हें पांच पिलरों के नाम गिनवाने तथा उनका शब्दार्थ बताने मात्र से प्रवासी कामगारों की आजीविका का संकट हल हो जायेगा? बढ़ती बेरोजगारी के मद्देनजर कुछ राज्य प्रवासी आयोग भी गठित कर रहे हैं। ये सभी औपचारिकताएं राजनैतिक दिखावे के अलावा और कुछ नहीं हैं। नया अर्थतंत्र प्रवासी मजदूरों के लिए रोजगारपरक हो, यह सुनिश्चित करने के लिए सबसे पहले ठोस परिस्थिति का ठोस विश्लेषण होना आवश्यक है।

लेखक भारत सरकार के आवासन एवं शहरी कार्य  मंत्रालय के प्रशासनिक अधिकारी पद से अवकाश प्राप्त हैं। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेखन और संपादन से जुड़े हैं।

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