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जानिए कैसी है चीन की रेल व्यवस्था

अनिल आज़ाद पांडेय, बीजिंग

वैसे तो चीन के बारे में कई ऐसी चीज़ें हैं जो बहुत प्रभावित करती हैं। जिनमें गगनचुंबी इमारतें, चौड़ी-चौड़ी सड़कें और दुनिया की सबसे तेज़ और सुरक्षित रेल व्यवस्था प्रमुख हैं। इसके साथ ही नागरिकों का देश के प्रति समर्पण और अनुशासन भी आधुनिक होते चीन की कहानी बयां करता है। पिछले चार दशक में चीन ने जो विकास किया है, ऐसा करने में तमाम देशों को सौ साल से भी अधिक का वक्त लगा। चीन में हुआ यह क्रांतिकारी बदलाव किसी एक सेक्टर या क्षेत्र में नहीं बल्कि सभी जगहों पर देखा जा सकता है। लेकिन मैं यहां रेल सिस्टम की चर्चा करूंगा। मुझे 2009 में चीन आने का मौका मिला, इसके बाद कई बार चीन की ट्रेनों में सफर करने का अवसर प्राप्त हुआ। एक ओर भारत में ट्रेनों के बारे में धारणा है कि वे अकसर लेट होती हैं, इसके साथ ही ट्रेनों में साफ-सफाई भी बहुत कम देखने को मिलती हैं। राजधानी और शताब्दी जैसी कुछ ट्रेनों को छोड़ दें तो इंडिया का विशाल रेलवे तंत्र निराश ही करता है। वहीं दूसरी तरफ चीन में ट्रेनें आधुनिकता और गति का प्रमाण हैं। ट्रेनों का संचालन और प्रबंधन इतना शानदार है कि ट्रेनों के समय में मिनटों की देरी भी नहीं होती है। 

इतिहास की ओर पीछे जाएं तो भारत 1947 में अंग्रेज़ों से चंगुल से मुक्त हुआ, वहीं नए चीन की स्थापना 1949 में हुई। यह भी जानना जरूरी है कि चीन में रेल सेवा की शुरूआत 19वीं सदी में भारत के बाद हुई। हालांकि नए चीन की स्थापना के बाद चीन में रेल सेवा के विकास ने गति पकड़ी। पर सत्तर के दशक तक भारत और चीन की रेल व्यवस्था लगभग एक जैसी थी। लेकिन 1979 में खुले द्वार की नीति लागू होने के बाद चीन ने हर क्षेत्र में जबरदस्त विकास किया, रेल सेवा भी इससे अछूती नहीं रही। 1978 में चीन के रेलमार्ग की कुल लंबाई 51 हजार किमी. थी। जबकि साल 2017 तक यह बढ़कर 1 लाख 27 हजार किमी. तक पहुंच गई। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि चार दशकों में चीनी रेल कहां से कहां पहुंच चुकी है। आज चीन में सामान्य ट्रेनों की चर्चा नहीं होती, बल्कि फर्राटा भरती तेज़ गति की रेलों ने चीन रेल व्यवस्था का कायाकल्प कर दिया है। 

हाई स्पीड ट्रेन जिसे मंदारिन(चीनी) में‘काव थिए’ कहा जाता है। इन आधुनिक ट्रेनों के संचालन के लिए रेल लाइनों के निर्माण का कार्य 2005 में शुरू हुआ। लेकिन चीन की सरज़मीं पर सबसे पहली हाई स्पीड ट्रेन का संचालन 1 अगस्त 2008 को शुरू दिया, उस दिन चीन की राजधानी बीजिंग से 117 किमी. दूर थ्येनचिन के लिए पहली हाई स्पीड ट्रेन चली। जिसकी अधिकतम गति 350 किमी. प्रतिघंटा थी। यहां बता दें कि इससे पहले ट्रेन के जरिए बीजिंग से थ्येनचिन पहुंचने में लगभग 70 मिनट का समय लगता था। मगर तेज गति की ट्रेन शुरू हो जाने से यह दूरी महज 30 मिनट में पूरी होने लगी। ध्यान रहे कि इसी दौरान 8 अगस्त से 24 अगस्त तक 2008 के बीजिंग ओलंपिक का आयोजन भी हुआ था। बीजिंग ओलंपिक की शानदार सफलता ने दुनिया के सामने चीन की साख मजबूत करने का काम किया। वर्तमान में उच्च गति की ये ट्रेनें बीजिंग, शंघाई, थ्येनचिन, शीआन, क्वांगचो, खुनमिंग, शनचन, हांगचो आदि कई बड़े शहरों को जोड़ती हैं।

 बीजिंग से शंघाई की दूरी लगभग 1318 किमी है, और हाई स्पीड ट्रेन के जरिए इसे पूरा करने में लगभग 5 घंटे लगते हैं। उधर क्वांगचो और शंघाई एक-दूसरे से 1,790 किमी. दूर स्थित हैं। यह सफर हाईस्पीड ट्रेनें लगभग 7 घंटे में पूरा कर लेती हैं। 

चीन में 2008 में तेज गति की पहली रेल लाइन शुरू हुई और 2017 के अंत तक हाई स्पीड रेलमार्ग की कुल लंबाई 25 हज़ार किमी. पहुंच चुकी है। जिसे 2025 तक 38 हजार किमी. पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। समझा जा सकता है कि इन नौ वर्षों में चीन के हाई स्पीड रेलमार्ग के निर्माण पर कितना ज़ोर दिया।  

चीन में हाईस्पीड ट्रेनों का जाल किस तेज़ी से बिछ रहा है, इसका अंदाजा पिछले पाँच साल में हुए निर्माण से लग जाता है। साल 2013 से 2017 तक रेलवे निर्माण में 39 खरब युआन यानी 390 खरब रूपए खर्च किए गए। जबकि इस अवधि में 15,700 किमी. लंबे हाई स्पीड रेल मार्ग का निर्माण पूरा किया गया।

यह जानना भी दिलचस्प है कि दुनिया के कुल हाई स्पीड रेल मार्ग की लंबाई का 66.3 फीसदी हिस्सा चीन में मौजूद है। चीनी रेल निगम के मुताबिक साल 2017 में चीन में ट्रेन से सफर करने वाले यात्रियों की कुल संख्या 3 अरब से अधिक थी। 

यह जानकर भी आश्चर्य होगा कि चीन के शनचन में एशिया का सबसे बड़ा भूमिगत रेलवे स्टेशन भी मौजूद है। इसके साथ ही दक्षिण चीन के क्वांगचो से हांगकांग के बीच हाईस्पीड रेल भी चलने लगी है। जिससे क्वांगचो से हांगकांग पहुंचने में महज 47 मिनट लगते हैं। जबकि पहले यह दूरी दो घंटे में तय होती थी। यहां बता दें कि शनचन में हाईस्पीड रेलवे स्टेशन करीब एक लाख 47 हजार वर्ग मीटर में फैला है। जो फुटबॉल के 21 मैदानों के बराबर है। 

चीनी रेलवे का तेज विकास आने वाले समय में भी जारी रहेगा। 2015 से चीन न केवल अपने देश बल्कि दूसरे देशों में भी रेल लाइन और तकनीक उपलब्ध कराने का काम करने लगा। चीन इसे रेल रोड डिप्लोमेसी का नाम भी दे रहा है। अफ्रीका, यूरोप और एशिया में चीन की मदद से रेलवे की स्थिति सुधारी जा रही है। अफ्रीका में तो चीन ने आधुनिक रेल व्यवस्था का निर्माण कर दिया है, जिसमें केन्या से लेकर नाइजारिया, इथियोपिया और अंगोला तक शामिल हैं। 

चीन दुनिया के चुनिंदा देशों में शामिल है, जहां रेल का सफर सुरक्षित कहा जा सकता है, वह भी रफ्तार के साथ। चीन में तेज़ रफ्तार ट्रेनों के सुरक्षित आवागमन को देखकर कभी-कभी अचरज़ होता है। पिछले कई सालों में बस एक ट्रेन हादसा हुआ, वह भी जब हाईस्पीड ट्रेनों की स्पीड 350 किमी. प्रति घंटा के लगभग थी। इसके बाद सुरक्षा के लिहाज से गति कम कर दी गयी। वर्ष 2011 में राजधानी बीजिंग से दक्षिण-पूर्व चीन के फूच्यान प्रांत की राजधानी फूचोउ जा रही ट्रेन और हांगचो से फूचोउ जा रही ट्रेन के बीच वनचो शहर के पास आगे-पीछे की टक्कर हो गयी। जिसमें 40 लोगों की मौत हुई थी और 172 घायल हुए थे। हालांकि दुर्घटना के वक्त ट्रेनों की गति कम कर दी गयी थी। बताते हैं कि उक्त ट्रेनें 350 किमी. प्रति घंटे से अधिक की गति वाली थी। इस हादसे के बाद चीन ने ट्रेनों की गति को 300 से 320-325 किमी. प्रति घंटा अधिकतम गति पर कम किया। उसके बाद आज तक कोई रेल हादसा चीन में नहीं हुआ है। 

चीन में दो तरह की ट्रेनें होती हैं, एक तेज गति वाली, जो आम तौर पर सुबह से देर शाम तक चलती है। सुरक्षा के लिहाज से रात 12 बजे से सुबह तक इन ट्रेनों का संचालन बंद रहता है। जबकि दूसरी लगभग 125-150 किमी. प्रति घंटा के बीच वाली ट्रेनें होती हैं, वे लंबी दूरी के साथ-साथ दिन-रात दोनों वक्त चलती हैं। 

मेरा अनुभव—

 यह कहने में कोई दोराय नहीं कि ट्रेन स्टेशनों की सुविधाएं और साफ-सफाई हवाई अड्डों को मुंह चिढ़ाती है। इस सबके पीछे चीन का अनुशासित सिस्टम है, जो मेहनत से काम कर रहा होता है। इतनी बड़ी आबादी के बावजूद, सब कुछ सही ढंग से होता है।

साल 2009 में बीजिंग पहुंचने के कुछ समय बाद मुझे ट्रेन के जरिए यात्रा करने का मौका मिला। उस वक्त मुझे चीनी भाषा में पढ़ने और बोलने आदि में बहुत मुश्किल आती थी। मैंने अपने घर से ट्रेन स्टेशन तक के लिए एक टैक्सी ली। लगभग आधे घंटे में जैसे ही मैं पहुंचने वाला था, मुझे लगा कि टैक्सी वाला मुझे गलत जगह पर ले आया है। उसने एयरपोर्ट की तरह आधुनिक बिल्डिंग के आगे रोककर बोला कि उतर जाओ। मुझे लगा कि यह मुझे एयरपोर्ट क्यों ले आया, शायद यह कुछ ग़लत समझ बैठा है। लेकिन टैक्सी से उतरने के बाद मैंने देखा कि यह रेलवे स्टेशन ही था, जो पूरी तरह आधुनिक बनाया गया था। स्टेशन के अंदर प्रवेश आदि के लिए एयरपोर्ट की तरह का सिस्टम था। साफ-सफाई होने के साथ-साथ हर लिहाज से वह स्टेशन आदर्श कहा जा सकता है। 

यह तो मेरा अनुभव था चीन के किसी ट्रेन स्टेशन में जाने का। लेकिन उसके बाद भी मैं कई स्टेशनों में जा चुका हूं। उनका रख-रखाव, साफ-सफाई व सुविधाएं देखने लायक होती हैं। ट्रेन स्टेशन में प्रवेश करने के लिए यात्री को टिकट के साथ अपना नेशनल आईडी कार्ड दिखाना होता है। उसके बाद सामान आदि की स्कैनिंग होती है। इसके पश्चात संबंधित यात्री वेटिंग रूम में जाते हैं। वेटिंग रूम में गेट के चेक-इन टाइम की घोषणा का इंतजार करना होता है। और प्लेटफॉर्म में प्रवेश सिर्फ 10 मिनट पहले ही किया जा सकता है। इसके लिए भी टिकट दिखाना जरूरी होता है। ट्रेन पहुंचने के बाद किसी को भी अपनी सीट पाने के लिए आपाधापी नहीं करनी होती है। क्योंकि निर्धारित व्यक्ति ही अपनी सीट पर बैठ सकता है। ट्रेन के डिब्बे में प्रवेश करते वक्त भी रेलवे कर्मी टिकट दिखाने के लिए कहते हैं। यानी बिना टिकट या ग़लत 

टिकट पर यात्रा करने की कोई गुंजाइश नहीं होती। बिना टिकट यात्रा करने वाले पर जुर्माना लगाया जाता है। 

डिब्बे में चढ़ने के कुछ ही मिनटों में ट्रेन के स्वचालित दरवाजे बंद हो जाते हैं और ट्रेन नियत समय पर चल पड़ती है। ट्रेनों के अंदर टॉयलेट आदि पूरी तरह साफ-सुथरे होते हैं, जबकि बार-बार सफाईकर्मी डिब्बे के अंदर डस्ट बिन और पोछे का कपड़ा लेकर आते रहते हैं। इस तरह गंदगी या कूड़ा कहीं पर भी नहीं मिल सकता। ट्रेनों के अंदर ही खाने-पीने की भी पूरी व्यवस्था होती है। ट्रेनों का अपना केटरिंग सिस्टम होता है। बाहर से कोई भी व्यक्ति सामान लाकर अंदर नहीं बेच सकता। 

सबसे बड़ी बात मैंने चीन में ट्रेन यात्रा के दौरान महसूस की, वह है समय की पाबंदी। ट्रेनें नियत समय पर चलती हैं और निर्धारित समय पर अपने गंतव्य स्थल पर पहुंचती हैं। इस तरह पूरी यात्रा बिना किसी मुश्किल के खत्म हो जाती है। ट्रेन से उतरने के बाद भी यात्रियों को स्टेशन से बाहर जाते समय अपना टिकट दिखाने की आवश्यकता होती है। 

चीन की ट्रेनों में यात्रियों को होने वाली परेशानी का खास ध्यान रखा जाता है। मेरे एक दोस्त हैं, आनंद कुमार, जो पूर्वी चीन में बिजनेस करते हैं। वह कहते हैं कि एक बार उनके साथ एक वाकया हुआ, वह हांगचो से शांगयू जा रहे थे। लेकिन उन्हें नींद आ गयी और वे ग़लती से निंगबो स्टेशन जा पहुंचे। विदेश में अनजानी जगह पर आप गलत स्टेशन पर पहुंच जाएं तो परेशान होना लाजमी है। लेकिन आनंद कहते हैं कि जब वे निंगबो स्टेशन पर ट्रेन से उतरे तो अपनी समस्या स्टेशन स्टाफ को बतायी। उन्हें लगा कि शायद कुछ जुर्माना लगेगा या वापस जाने में परेशानी होगी। लेकिन उम्मीद के उलट स्टेशन कर्मी ने उनकी पूरी मदद की और उनके हाथ में एक पर्चा थमाया, साथ ही उनके स्टेशन से वापस जाने की व्यवस्था भी की। पूरा काम बिना किसी दिक्कत या शुल्क के हुआ। इस बात से आनंद चीनी ट्रेनों और रेलवे कर्मियों से बहुत प्रभावित हुए। एक बार साक्षात्कार में उन्होंने यह घटना इस लेखक को बतायी। आनंद के साथ हुआ यह वाकया यह बताने के लिए काफी है कि चीन की रेल व्यवस्था का कितना विकास हो चुका है। 

मैंने भी कई बार ट्रेनों से यात्रा की है। जिनमें, हाई स्पीड ट्रेनों से लेकर मध्यम गति की ट्रेनें भी शामिल हैं। सभी ट्रेनों के सारे कोच वातानुकूलित(एसी युक्त) होते हैं। 

अगर किराए की बात करें तो चीन की ट्रेनों का किराया भारत की अपेक्षा कई गुना अधिक होता है। उदाहरण के लिए बीजिंग से थ्येनचिन की दूरी 117 किमी. है। एक तरफ का ट्रेन का किराया लगभग 55 युआन(550 रुपए) है। जबकि भारत में इतनी दूरी तय करने में बहुत कम किराया लगता है। 

चीनी तकनीक 

चीन की तकनीक जापान और यूरोपीय देशों के मुकाबले सस्ती बताई जाती है, यही वजह है कि कई देश चीन के प्रति रुचि दिखा रहे हैं। विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक, चीन द्वारा तैयार की जाने वाली सबसे तेज ट्रेन की कीमत लगभग 17-21 मिलयन डॉलर प्रति किमी. होती है। जबकि यूरोप में इसके लिए 2-39 मिलयन डॉलर खर्च करने होते हैं, वहीं कैलीफोर्निया में यह दर 52 मिलयन डॉलर प्रति किमी तक होती है। विश्लेषकों के मुताबिक अब चीन रेलवे कंस्ट्रक्शन और इक्विपमेंट के मामले में कीमत और तकनीक के लिहाज से विश्व में प्रतिस्पर्धी बन चुका है। चीन की प्रमुख रेल कंपनी चायना रेलवे कंसट्र्क्शन कॉरपोरेशन (सीआरसीसी) ने विदेशों में रेल अनुबंध के लिए भारी निवेश किया है, और विदेशी प्रबंधन और ऑपरेशन्स के समन्वय के लिए यूनिटें स्थापित की है। इससे स्पष्ट तौर पर जाहिर होता है कि चीन इस दिशा में किस गति से काम कर रहा है।

इसके साथ ही चीन मलेशिया, थाइलैंड आदि देशों में रेल लाइनों और बेहतर तकनीक मुहैया कराने के लिए काफी निवेश कर चुका है। वहीं चीन ने यूरोप और एशिया को जोड़ने वाले देशों में इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए 40 अरब डॉलर के सिल्क रूट फंड का ऐलान किया है। चीन इसलिए भी विदेशों में निवेश के लिए उत्सुक है, क्योंकि उसके पास लगभग तीन खबर डॉलर से अधिक का फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व है। जो कि जापान से तीन गुना और अमेरिका से आठ गुना अधिक है। 

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, भारत के प्रमुख राष्ट्रीय अख़बारों में काम करने का अनुभव है औरहैलो चीन’ पुस्तक के लेखक भी हैं। वर्तमान में चाइना रेडियो इंटरनेशनल, बीजिंग में कार्यरत हैं। 

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