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फांसी का तख्ता देखते ही जल्लाद को आया सदमा

कोलंबो। क्या आपने कभी सुना है कि किसी कैदी को फांसी पर लटकाया जा रहा हो और जल्लाद ऐसा करने से मना कर दे। या फांसी का तख्ता देखकर ही जल्लाद को सदमा आ जाय। आपने सुना नहीं होगा, लेकिन ऐसा वाकया हुआ था पड़ोसी देश श्रीलंका में। बताया जाता है कि कुछ साल पहले तस्करी के एक मामले में एक कैदी को फांसी की सज़ा सुनाई गयी थी। और कैदी को सज़ा दिए जाने वाली जगह पर ले जाया गया, लेकिन फांसी के फंदे और तख्ते को देखकर जल्लाद सदमे में चला गया। इस घटना से उक्त जल्लाद इतना व्यथित हुआ कि उसे साल 2014 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया। तब से इस पद पर कोई व्यक्ति काम नहीं कर रहा था। हालांकि एक अन्य कर्मचारी को पिछले साल यह जिम्मेदारी सौंपी गयी थी, लेकिन उसने कभी भी अपने काम पर आने की हिम्मत नहीं की।

इस तरह अब वहां के संबंधित विभाग ने वेकेंसी निकाली है। जल्लाद के दो पदों के लिए सौ अभ्यर्थियों ने आवेदन किए हैं। रोचक बात यह है कि इसके लिए एक अमेरिकी नागरिक ने भी आवेदन किया है। अब यह तो वक्त ही बताएगा कि सौ आवेदकों में से किन दो लोगों की किस्मत जल्लाद बनने के लिए खुलती है।

यहां बता दें कि श्रीलंका सरकार मादक पदार्थों की तस्करी में लिप्त आरोपियों को फांसी देने में देरी नहीं करना चाहती है। वहां के न्याय एवं कारागार सुधार मंत्रालय ने ऐलान किया है कि सुरक्षा कारणों के चलते चुने गए लोगों के नाम और साक्षात्कारों की तारीख का खुलासा नहीं किया जाएगा। आवदेन करने की अंतिम तिथि 25 फरवरी थी।

गौरतलब है कि श्रीलंका में फांसी देना कानूनी रूप से वैध है। लेकिन साल 1976 से अब तक किसी भी दोषी को फांसी के फंदे पर नहीं लटकाया गया है। दरअसल पूर्व में तैनात जल्लाद द्वारा पाँच साल पहले इस्तीफा देने के बाद यहां कोई स्थायी जल्लाद नहीं है। श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाल सिरिसेना ने फरवरी महीने के शुरू में कहा था कि वह अगले दो महीनों में मादक पदार्थों की तस्करी में लिप्त दोषियों को फांसी पर लटका देंगे।


वहीं श्रीलंका के न्याय मंत्रालय के मुताबिक मादक पदार्थों की तस्करी में लिप्त 48 लोगों को फांसी की सजा दी गई थी। इनमें से 30 ने जान बख्शने के लिए अपील दायर की  है। ऐसे में अन्य 18 दोषियों को फांसी पर चढ़ाया जाना है।  

श्रीलंका में 2004 से बलात्कार, मादक पदार्थों की तस्करी और हत्या को बड़ा अपराध माना जाता है, मगर आरोपियों को अधिकतम सिर्फ आजीवन कारावास की सज़ा ही दी गयी हैं।

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