lok kalakar Nanda
कला संस्कृति

नंदा देवी मेला: सब चौपट जै है गो हो महाराज !

लोक गायक ‘नन्दा’ का नन्दा देवी मेले बदलते स्वरूप पर छलका दर्द

दिग्विजय बिष्ट
अब ननदेबि कौतिक में ऊ रंग नी रै गे, जस पैली बै हु छी। न अब गौंक कौतिक्यार छन, न हुड़ुकैकि घम-घमाट छू। सब चैपट जै है गो, हो महाराज ! ये शब्द हैं कृष्ण मोहन सिंह बिष्ट ‘नन्दा के’। निवासी -ग्राम सभा फलसीमा, पट्टीखास प्रजा-अल्मोड़ा। आप के गीत दूरदर्शन के साथ आकाशवाणी से प्रसारित हुए है। नन्दा आॅल इंडिया रेडियो के ‘बी हाई’ ग्रेड गायक कलाकार हैं और साथ में जोरदार कौतिक्यार (रंगीला इंसान)। ‘नन्दा’ की आंखें नन्दा देवी के 65 से ज्यादा कौतिक की गवाह है। जब छोटे थे तो घर वालों के साथ मेला देखने आते थे।

साथियों के साथ लोकगीत प्रस्तुत करते नन्दा।
साथियों के साथ लोकगीत प्रस्तुत करते नन्दा।

जब छठी कक्षा में गए तो रैमजे इण्टर काॅलेज में प्रवेश लिया और यार दोस्तों के साथ मेले में आने लगे। बकौल नन्दा जब छोटे थे तो गांव के लोग हुड़का बजाते, झोड़ा-चांचरी गाते मेले में आते थे। तो हम लौंडे-मांैडे जो हाथ में मिला उसको बजाते मेले में जाते थे। कभी हमने कंटर बजाया तो कभी कोई डब्बा। हां एक बात जरूर थी कि गीत हमेशा सुर के पक्के होते थे। मेले में आकर जलेबी भसोरते(छककर खाना) थे। अब न जलेबी में वो स्वाद है, न लोगों में वो रंग।
कृष्ण मोहन सिंह बिष्ट अपने स्कूल के दिनों में डूबते हुए बताते हैं कि हमारे जमाने में सांस्कृतिक कार्यक्रम हमारे स्कूल रामजि (रैमजे इण्टर काॅलेज) में हुआ करते थे। नन्दा देवी में तब मंच नहीं बनता था मन्दिर का पूरा का पूरा आंगन ही मंच हुआ करता था। कहीं झोड़े, कहीं छपेली तो कहीं बैर गाते ग्रामीण अपने पूरे शबाब में होते थे। बाजार की महिलाएं मन्दिर की दीवारों में बैठ उनको देखा करती थी।

रात से सुबह चार-पांच बजे तक मन्दिर का जर्रा-जर्रा मानो झोड़े गाता था। अल्मोड़े की पटाल बाजार झोड़े, चांचरी गाने वालों की टोलियों से पटी रहती थी। कोई मल्ली बाजार को, तो कोई नन्देबी थान को रास्ता लगे रहते थे। जिन लोगों को बाजार में थोड़ी चैड़ी जगह दिख गई वो लोग झोड़े के फलैक वहीं मारते थे। हम लोग रैमजे स्कूल में अपने कार्यक्रम देते थे। मंच पर नाचने के साथ गीत भी गाते थे। यादों में खोते हुए नन्दा गाते हैं,‘‘ हिट यार बानू कौतिक जानू, कैहुणी झन कये बात ओ सुवा कैहुणी झन कये बात...’’। हमारे टैम में मंच में लड़के ही लड़की बनकर नाचते थे। घाघरा और पिछौड़ा हम अपने घर से चुराकर लाते थे।

कभी किसी का पिछौड़ा खराब हो गया या घाघरा फट गया तो घर में घुसना मुश्किल हो जाता था। उस रात को पड़ोस में रहना पड़ता था। अपने यारों को याद करते हुए चन्दन सिंह, कुन्दन सिंह, नाथू सिंह, दलीप सिंह आदि का जिक्र करते हैं, जिनके साथ उन्होेंने मंच का ककहरा सीखा। उस दौर में रैमजे के मंच में रात दो बजे तक स्थानीय कलाकारों का मजमा लगता था। नगर वाले 3-4बजे रात तक कलाकारों के साथ डटे रहते थे। उनके खाने-पीने का प्रबंध कमेटी वाले करते थे।

हम बच्चों को कार्यक्रम पेश करने के बाद मिठाई दी जाती थी। उस दौर में रूपये पैसे का चलन नहीं था। उधर नन्दा देवी मन्दिर में तो न किसी को खाने का होश ना किसी को सोने का ख्याल। रात ब्या जाती थी (सुबह होना। वहां गांव वाले तीन-चार दिन तक मन्दिर में डटे रहते थे। तब की बात ही कुछ और थी हो! आज तो बस भीड़ ही भीड़ है। मेले का मतबल सिर्फ भीड़ नहीं होता। मेला अपने आप में एक पूरा समाज समेटे होता है। जब उस में बिना किसी भेद-भाव के पूरे समाज का प्रतिभाग होता है तब कोई मेला ‘कौतिक’ बनता है।
‘‘आजक कौतिक म्यर समझ में नी ऊन, आज न उस मैस छन, ना ऊ टैमेक सैंणी। बस लोकलेक भीड़ छू हो, अब गौंक आदिम ले कम ऊनी कौतिक में। महाराज! अब खालि भीड़ भै हो, महाराज भीड़।’’  बातचीत का दौर उनके हताशा भरे इन शब्दों के साथ खत्म हुआ।

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